योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४४ ] अतः उनके मत में इन्द्रियों की प्राप्यकारिता उचित है । इसके विपरीत सांख्यदर्शन में इन्द्रियों की आहंकारिकता मानी जाती है । यहां इन्द्रियों की प्राप्यकारिता का सिद्धान्त मान्य नहीं है । दीपिकाकार सर्वत्र शैवागम संमत सांख्य दृष्टि का अनुवर्तन करते हैं । अतः यहाँ प्रदर्शित इन्द्रियों की प्राप्यकारिता परपक्ष प्रदर्शन मात्र माना जायगा । इसको दीपिकाकार का सिद्धान्त नहीं माना जा सकता । इसीलिये उन्होंने 'योग' पद का अर्थ संयोग न कर समवाय किया है । आभार प्रदर्शन सितम्बर, ८२ से अगस्त, ८५ तक हमने भारत सरकार की शास्त्रचूडामणि योजना में कार्य किया । इससे पहले ही योगिनीहृदय के द्वितीय संस्करण की निजी प्रति को हमने योगिनीहृदय और दीपिका की सरस्वती भवन, वाराणसी स्थित ख. और ग. मातृकाओं के आधार पर परिष्कृत कर लिया था । इस ग्रन्थ-युगल का भाषानुवाद करने से पहले अन्य उपलब्ध मातृकाओं की सहायता से इनका पूर्णतया संशोधन कर लेना हमें उचित प्रतीत हुआ और इस कार्य को हमने दो वर्षों ( सन् ८२-८३) में पूरा किया । दिनांक २८-१२-८३ से २४-१-८४ तक ग्रन्थ के परिष्कृत स्वरूप का लेखन कार्य सम्पन्न हुआ तथा सन् ८४ के अन्त तक अनुवाद का कार्य चलता रहा । दि० ५-१२-८४ से २७-१२-८४ की अवधि में पाठ निर्धारण का कार्य भी पूरा हो गया । अब केवल प्रकाशन की प्रतीक्षा थी । एक अथवा दूसरे कारणों से इसमें विलम्ब होता रहा और अन्ततः मोतीलाल बनारसी दास ने इस ग्रन्थ के प्रकाशन का निर्णय लिया । इस प्रसंग में हम शिक्षा मन्त्रालय, डॉ० आन्द्रे पादु और मोतीलाल बनारसीदास प्रकाशन संस्था को विशेष रूप से स्मरण करना चाहते हैं। सुहृद्वर पण्डित श्री जनार्दन शास्त्री पाण्डेय जी के प्रयत्न से ही विज्ञानभैरव भाषानुवाद का प्रकाशन हो सका था । इस ग्रन्थ के प्रकाशन में भी उनकी प्रेरणा ही प्रधान रही है। इस ग्रन्थ को सुपरिष्कृत रूप देने में उनके सुझाव बहुत उपयोगी रहे हैं । हम उनके प्रति भी आभार प्रदर्शित करते हैं । सरस्वती भवन पुस्तकालय, वाराणसी; गायकवाड़ शोधसंस्थान, बड़ोदरा; राजस्थान पुरातत्त्व मन्दिर, जोधपुर तथा उसकी उदयपुर शाखा के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को भी हम कृतज्ञता के साथ स्मरण करना चाहते हैं । परापंचाशिका की मातृकाएँ हमें चार स्थानों से मिलीं, जिनकी चर्चा हम यथास्थान कर चुके हैं । इन संस्थाओं के प्रति भी हम अपना आभार व्यक्त करते हैं । परिशिष्टों के निर्माण में चि० तरुणकुमार द्विवेदी, बी० ए० ने सहायता की । हम उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं । मकर संक्रान्ति, संवत् २०४४ व्रजवल्लभ द्विवेदी वाराणसी, १५-१-८८ शास्त्रचूडामणि विद्वान्