भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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विषय-सूची

उपोद्घात योगिनीहृदय और दीपिका-१, मातृकाओं का परिचय-१, प्रस्तुत संस्करण-३, परापंचाशिका की मातृकाएँ-४, परापंचाशिका का परिचय-५, श्रीकुल (त्रिपुरा) का साहित्य-६, योगिनीहृदय और वामकेश्वर तन्त्र-९, योगिनीहृदय की टीकाएं-१०, मूल और टीका में स्मृत ग्रन्थ-ग्रन्थकार-११, त्रिपुरा सम्प्रदाय की प्रवृत्ति-१३, चक्रसंकेत-१६, मन्त्रसंकेत (भावार्थ, सम्प्रदायार्थ, निगर्भार्थ, कौलिकार्थ, सर्व- रहस्यार्थ और महातत्त्वार्थ)-२१, पूजासंकेत (त्रिविध पूजा)-२९, जप-३१, पचास या इक्यावन पीठ-३३, नौ आधार-३४, वर्णों और तत्त्वों की उत्पत्ति-३६, कामकला-४०, छः अथवा आठ धातु-४१, व्याकुलाक्षर-४१, क्रम-व्युत्क्रम-४२, दीपिका की कुछ विसंगतियां-५३, आभार प्रदर्शन-४४

१. चक्रसंकेत दीपिकाकार का मंगलाचरण १-३ शास्त्र की अवतारणा ४-६ शास्त्र की गोपनीयता और परम्परा ६-८ शास्त्र के अनधिकारी ८-१० शास्त्र के अधिकारी एवं शास्त्रज्ञान का फल १०-११ संकेतत्रय का उद्देश १२ संकेतत्रय के ज्ञान का फल और अनुबन्ध-चतुष्टय १३ चक्रसंकेत का उपक्रम १४ चक्र का अवतार क्रम १४-१६ बैन्दव और त्रिकोण चक्र १६-२० कामकला का स्वरूप १७-२१ नवयोनि अथवा अष्टार चक्र, उसकी अम्बिकारूपता २१-२५ अन्तर्दशार चक्र २५-२६ बहिर्दशार चक्र २७-२८ चतुर्दशार चक्र, चक्रत्रय की रौद्रीरूपता २८-२९ अवशिष्ट चक्रत्रय और उनकी वामा-ज्येष्ठतारूपता ३० शान्त्यतीता आदि पांच शक्तियों (कलाओं) की श्रीचक्रमय वासना ३१ नौ चक्रों में स्थित शक्तियां और उनका स्वरूप (वासनान्तर) ३१-३३