भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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दीपिकोद्धृतवचनानुक्रमणी ४२९ मूलप्रकृतिर्विश्वस्य १८६ स्व. सं. | यादिक्षान्तानि वर्णानि २८७ स्व. सं. मूलमन्त्रत्रिशूलेन ३७१ शै. त. | या नित्यताऽस्य शक्ति १४७ सौ. सु. मूलं स्वात्मनि चिद्रूपे ७४ सु. वा. ६८ | १.३८ मूलोद्भवं शक्तिचक्रं ७४, ३८४ सु. ६७ | या मात्रा त्रपुषीलता ३६१ ल. स्तु. २ मेयमातृमितिलक्षणं ११२ चि. च. ७२ | यावदूर्ध्वाकुलं पद्मं २२५ स्व. सं. मेयराशिवमयं हव्यं २९४ प. क्र. | या शक्तिः कारणत्वेन ४९, २०८ स्व. सं. मेयसंविदि समर्पणं ११० चि. स्त. २० | यास्य स्वतन्त्रताख्या १४८ सौ. सु. १.३९ यत् षोडशकलाकारं ३२४ स्व. सं. | युगलमिदं तार्तीयं १२० सौ. सु. २.५ यज्जीवशिवयोरैक्यं ३८५ अमृ. | ये पक्वमलकर्माण १८१ स्व. सं. यतो वाचो निवर्तन्ते ५०, ३६८ तै. उ. | ये मनः प्रणिदधु १६७ चि. च. ९ २.४ | यैरेव पूज्यते द्रव्यै २७५ वि. भै. १५० यत्तदूर्ध्वशिखरं ११ चि. च. ३२ | यैः स भासयति २८१ चि. स्त. ५ यत्र निर्विषयबोध २१६ चि. स्त. १० | योजयित्वा क्रमेणैव २९१ स्व. सं. यत्र यत्र मनस्तुष्टि ३५४, ३८६ | रक्तं श्वेतं च ३५ स्व. सं. वि. भै. ७३ | रक्तं सुकर्णिकोपेतं ३६ स्व. सं. यत्र यत्र मनो याति २३१, ३३९, ३९२ | रक्तां लम्बोष्ठिकां चैव २३९ स्व. सं. वि. भै. ११३ | रक्तो बिन्दुः शक्तिः १२२ सौ. सु. २.१४ यत्र यत्र मिलिता २११, ३३३, ३८७ | रमते सेयमव्यक्ता २०२ नि. षो. ४.१६ प्रा. व. (स्तोत्रा.) | रमा मेघा तथा कान्तिः २३३ ग्रन्था. यत्र यत्राक्षमार्गेण २२१, २९५, ३३९- | रविरिव सन्ध्यारक्तः १४६ सौ. सु. ३४० ३७६ वि. भै. ११४ | १.३३ यत्सदाशिवपर्यन्तं १६९ स्व. सं. | रसतन्मात्रतो १५६ म. स्व. सं. यथोर्णनाभिः सृजते ११२ मु. उ. १.१.७ | रसतन्मात्रसंज्ञं १५६ म. स्व. सं. यद्यमनुत्तरमूर्ति १४६ सौ. सु. १.२८ | रुद्रकोट्यर्बुदानीकं ३०४ स्व. सं. यदोल्लसति शृङ्गाट २०१, ३२४, ३३९ | रुद्राक्षरसंपर्का १२१ सौ. सु. २.१२ नि. षो. ४.१२ | रुद्रोऽधिपतिः शक्तो १२१ सौ. सु. | २.११ यद्यदाह्यं वक्ष्यमाणं २७६ अमृ. | रुन्धिनी रोधिनी रोधा ४४ स्व. सं. यया विशुद्धः शिष्योऽपि १७७ | रूपतन्मात्रकार्यं १५६ म. स्व. सं. यवर्गः क्षाणंसंयुक्तो २४० | रूपतन्मात्रमित्युक्तं १५६ म. स्व. सं. यश्चैव पूजकः सर्वः २७५ वि. भै. १५० | रूपं बिन्दुरिति ५९ स्व. सं. यस्य विज्ञानमात्रेण २१० स्व. सं. | रूपातीते च ये मुक्ता ३२२ ज्ञा. का. या चेयं समना २०८ स्व. सं. | १.५

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