योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २९ इन्द्रियदशकं श्रोत्रादिकं वागादिकं च, मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तानि चतुर्दश, तदात्मना ॥१७॥ खेचरी टकारः, जया भकारः, टकारादिभकारान्ताश्चतुर्दश वर्णाः, तेषां परमार्थप्रथा कारणभूता प्रथा विमर्शस्तन्मयम् । कोऽर्थः ? मध्यचक्रमेव त्रिकोणाष्ट- कोणद्विदशकोणक्रमेण १श्रोत्रादिज्ञानेन्द्रियवागादिकर्मेन्द्रियमनोबुद्ध्यहङ्कारचित्ता- त्मककरणचतुर्दशक - टकारादिभकारान्तवर्णचतुर्दशक२प्रकाशविमर्शमयचतुर्दशार- रूपेण परिण३तमित्यर्थः । त्रिकोणचक्रस्य—“अम्बिकारूपमेवेदमष्टारस्थं स्वरावृतम्” (१।१४) इत्य- त्राम्बिकारूपतामुक्त्वेदानीमष्टारादिचतुर्दशारपर्यन्तस्य श्रीचक्रस्य रौद्रीरूपता- माह— एवं शक्त्यनलाकारस्फुरद्रौद्रीप्रभामयम् ॥१८॥ एवमुक्तप्रकारेण शक्त्यनलाकारेण पञ्चशक्तिचतुर्वह्निरूपेण स्फुरच्चक्रं द्विचत्वारिंशद्योन्यात्मकं रौद्रीप्र४भामयं रौद्रीशक्तिविस्फारविजृम्भितमित्यर्थः ॥१८॥ पाँच ज्ञानेन्द्रियमय, वाक्प्रभृति पाँच कर्मेन्द्रियमय और मन, बुद्धि, अहंकार तथा चित्त नामक अन्तःकरण चतुष्टयमय है ॥१७॥ खेचरी से टकार का और जया से भकार का ग्रहण होता है । टकार से लेकर भकार पर्यन्त १४ वर्णों की परमार्थ प्रभा, अर्थात् इन वर्णों की कारणभूत विमर्शशक्ति इनमें विराजमान है । इसका अभिप्राय यह है कि मध्यचक्र ही, अर्थात् मध्यचक्र में विराजमान विमर्शशक्ति ही त्रिकोण, अष्टकोण, प्रथम दशार और द्वितीय दशार के क्रम से श्रोत्र प्रभृति ज्ञानेन्द्रिय, वाक् प्रभृति कर्मेन्द्रिय और मन, बुद्धि, अहंकार तथा चित्तात्मक अन्तःकरण चतुष्टय को मिलाकर चौदह करणों एवं टकार से लेकर भकार पर्यन्त १४- वर्णों के रूप में परिणत होती है । इस तरह से प्रकाशविमर्शमय तत्त्वात्मक और वर्णा- त्मक चतुर्दशार चक्र निष्पन्न होता है । त्रिकोण चक्र को पहले (१।१४) अम्बिकाशक्तिमय बताया गया है । अब यहाँ अष्टार से लेकर चतुर्दशार पर्यन्त चक्रों की रौद्रीमयता का प्रतिपादन किया जा रहा है— इस तरह से शक्तिचक्रों और वह्निचक्रों के संयोग से बने चक्र रौद्री शक्ति की प्रभा से स्फुरित हैं ॥१८॥ इस तरह से ऊपर बताई गई पद्धति से पाँच शक्तिचक्रों और चार वह्निचक्रों के स्फुरण से निष्पन्न ४२ योनिमय यह चक्रसमूह रौद्री शक्ति का ही अनोखा विस्तार है ॥१८॥ १. 'श्रोत्रादि''''भकारान्तवर्णं' नास्ति-ख. । २. दशकं-ख. ने. । ३. णमत इ-ख. ग. घ. ने. ज. ड. । ४. प्रथा-ने. ज. झ. ।