योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः गृह्यन्ते ? मैवम्, तन्मात्रपदेन भूतसूक्ष्माणामनिन्द्रियगोचराणां ग्रहणम्, रूपशब्देन तु भूतगुणाः शब्दादयः श्रोत्रादिग्राह्या गृह्यन्ते, अतो न विरोधः ॥१६॥ चतुर्दशारमाह— चतुश्चक्रप्रभारूपसंयुक्तपरिणामतः । चतुर्दशाररूपेण संवित्तिकरणात्मना ॥१७॥ खेचर्यादिजयन्तार्णपरसार्थप्रथामयम् । चत्वारि चक्राणि बैन्दवत्रिकोणाष्टकोणप्रथमदशाररूपाणि, तेषां प्रभाश्चतस्रः । विप्रकृष्टत्वात् प्रभामात्रमेव गम्यते । यथा बहवो वृक्षा वनमिति नावयवभेदः, तथा१ । तच्चक्रप्रभाचतुष्टयसंयुक्तस्य द्वितीयदशारस्य सन्निकृष्टत्वादवयवप्रतीति- स्तत्प्रभाचतुष्टयसम्२वेतद्वितीयदशा३रावयवदशकपरिणामत्वात् । चतुर्दशाररूपेण संवित्तिकरणात्मना । संवित्तिः ज्ञानम् । संवित्तिशब्देन क्रियापि लक्ष्यते । करणानि कैसे हो सकता है ? इसका समाधान यह है कि तन्मात्र शब्द से शब्दतन्मात्रा प्रभृति सूक्ष्म भूतों का ग्रहण होता है, जो कि इन्द्रियगोचर नहीं है । रूप शब्द से शब्द प्रभृति भूत गुणों का ग्रहण किया जाता है, जो कि श्रोत्र प्रभृति इन्द्रियों से गृहीत होते हैं। इस तरह से यहाँ कोई विरोध नहीं है ॥१६॥ चतुर्दशार चक्र की भावना इस तरह से की जाती है— चार चक्रों की प्रभा के साथ संयुक्त द्वितीय दशार की प्रभा से चतुर्दशार चक्र निष्पन्न होता है। यह चतुर्दश करणों का प्रतिनिधि है। टकार से लेकर भकार पर्यन्त १४ वर्णों का इसमें विन्यास किया जाता है ॥१७-१८॥ चार चक्र हैं बैन्दव, त्रिकोण, अष्टकोण और प्रथम दशार । इनसे चार प्रभाएँ छिटकती हैं । चतुर्दशार चक्र के इनसे दूर होने से वहाँ इनकी प्रभामात्र का दर्शन होता है । जैसे कि दूरी के कारण वन में वृक्षों की अलग-अलग पहचान नहीं होती, उसी तरह से चतुर्दशार चक्र में इनकी प्रभा की ही प्रतीति होती है, उनके अवयवों की नहीं । इन चार चक्रों की चार प्रभाओं के साथ चतुर्दशार चक्र में द्वितीय दशार के दस अव- यवों का स्पष्ट दर्शन होता है, क्योंकि द्वितीय दशार चक्र की स्थिति उसके पास में ही है । इस तरह से चार चक्रों की चार प्रभाओं और द्वितीय दशार चक्र के दस अवयवों से मिलकर यह चक्र बनता है । इसका यह चतुर्दशार रूप संवित्तिकरणात्मक है । संवित्ति ज्ञान को कहते हैं। इस ज्ञान के साथ क्रिया भी जुड़ी हुई है । इसका यह अभिप्राय हुआ कि यह ज्ञान और क्रिया शक्ति के स्फुरण से आविर्भूत चतुर्दशार चक्र श्रोत्र प्रभृति १. तथा तच्चक्रभेदः—ख. ने. ज. । २. समेत—ख. ग. ज. झ. उ. । ३. दशा- रावयववत् । चतु—ख. ग. घ. ज. झ. ।