योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २७ द्वितीयदशारमाह- द्विदशारस्फुरद्रूपं क्रोधीशादिदशार्णकम् ॥१६॥ द्वितीयदशारं द्विदशारम् । १'रूप्यन्त इति रूपा इन्द्रियार्था दश, शब्दादयो वचनादयश्च, द्वितीयदशारतया स्फुरन्तो रूपा यस्य तत् तथाविधम्। क्रोधीशः ककारः। ककारादिदशवर्णवत्। कोऽर्थः ? बैन्दवत्रिकोणाष्टकोणचक्रेषु मध्य- स्थितप्रकाशविमर्शमयदीपद्वयदीपितेषु तद्दशकप्रभाच्छायादशकद्वयमययकारादि- पृथिव्यादिककारादिशब्दादिशकद्वयात्मकं दशार(२चक्रद्वयं जातमित्यर्थः । तदुक्तं कामकलाविलासे- नवकोणमध्यमञ्चास्मिंश्चिद्दीपदीपिते दशके । तच्छायाद्वितयमिदं) चक्रद्वयात्मना दृष्टम् ॥ (श्लो० २९-३०) इति । ननु-"भूततन्मात्रदशकप्रकाशाल्म्बनत्वतः" (१।१६) इत्यत्रैव शब्दादीना- मुक्तत्वात् पुनः "द्विदशारस्फुरद्रूपम्" (१।१६) इत्यत्रापि रूपशब्देनापि कथं अब द्वितीय दशार चक्र का वर्णन करते हैं- द्वितीय दशार चक्र इन्द्रियों के १० रूपों (विषयों) को स्फुटित करता है। इसमें ककार प्रभृति १० वर्णों का विन्यास किया जाता है ॥१६॥ द्वितीय दशार को ही यहाँ द्विदशार कहा गया है। रूप शब्द से इन्द्रियों के १० विषयों का ग्रहण होता है। शब्द आदि बुद्धीन्द्रियों के और वचन आदि कर्मेन्द्रियों के विषयों का स्फुरण करने वाला है यह द्वितीय दशार चक्र। क्रोधीश शब्द से ककार का ग्रहण होता है। यह चक्र ककार आदि १० वर्ण वाला है। इस श्लोक का अभिप्राय यह है कि बैन्दव, त्रिकोण और अष्टकोण चक्र मध्य में स्थित प्रकाशविमर्शमय दो दीपों से आलोकित हैं। इनकी दस प्रभाओं के प्रतिबिम्ब से प्रथम दशार चक्र और द्वितीय दशार चक्र की निष्पत्ति होती है। इसी के साथ यकार प्रभृति दस वर्ण, पृथिवी प्रभृति दस तत्त्व प्रथम दशार में और ककार प्रभृति दस वर्ण, शब्द प्रभृति दस विषय द्वितीय दशार में अभिव्यक्त होते हैं। यह विषय कामकलाविलास में भी वर्णित है- नवयोनि चक्र और मध्यत्रिकोण चक्र के मध्य में स्थित मञ्च, अर्थात् सदाशिवासन स्थानीय बिन्दुचक्र में विराजमान प्रकाशविमर्शमय ज्ञानदीपक की प्रभा की दस किरणों के द्विविध प्रतिबिम्ब से दो प्रकार के दशार चक्रों की निष्पत्ति देखी गई है ॥ यहाँ प्रश्न उठता है कि "भूततन्मात्र" प्रभृति श्लोक में ही शब्द प्रभृति विषयों का वर्णन हो चुका है, फिर "द्विदशार" प्रभृति श्लोक में पुनः रूप शब्द से उन्हीं का ग्रहण १. 'रूप्यन्त' 'वचनादयश्च' नास्ति-ग. घ. ने. ज. झ. उ.। २. कोष्ठान्तर्गतः पाठः कपुस्तकं विहाय क्वापि न दृश्यते ।