योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः रोर्ध्वतन्त्रे १रमाशक्तिबीजोद्धारे—"चन्द्रः२ शक्तिर्महाशक्तिर्ब्रह्माणी कालिकादि- कम्" इति। शक्ते रेफस्यादिर्यकारः, शक्त्यादिकारमारभ्य नवानां ३वर्णानां पर्यन्तः क्षकारः, तेषां दशानां स्फूर्तिकारकम्। स्फूर्तिर्विमर्शः। यकारादिक्षका- रान्तदशवर्णविमर्शकमित्यर्थः ॥१५॥ भूतानि पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशाः, तन्मात्राः पञ्च गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः, तेषां दशानां प्रकाशा दश, तेषामालम्बनत्वात्४। शिवात्मकत्वात् पृथिव्याद्यर्था- नाम्, शक्त्यात्मकत्वाद् यकारादिवर्णानाम्। तदुभयप्रकाशविमर्शमयदशकोणावृत- मिदं चक्रमित्यर्थः। पृथिव्यादिक्षकारान्तवर्णदशकमयताकथनेन प्रथमदशारादि- चक्रत्रयस्य स्थितिरूपता द्योत्यते। रमा शक्ति के बीज का उद्धार करते समय उद्धारोर्ध्वतन्त्र में बताया गया है—"चन्द्र, शक्ति, महाशक्ति, ब्रह्माणी, कालिका आदि शब्द (इस बीज के वाचक हैं)"। शक्ति अर्थात् रेफ का आदि यकार है। १यकार से लेकर ळकार सहित नौ वर्णों के अन्त में क्षकार है। यह चक्र इन दस वर्णों की स्फूर्ति करता है। स्फूर्ति का अर्थ यहाँ विमर्श है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि यकार से लेकर क्षकार पर्यन्त १० वर्णों का यहाँ विन्यास करना चाहिये ॥१५॥ पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश—भूत कहलाते हैं। गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द—ये हैं पांच तन्मात्राएँ। इन दस तत्त्वों के प्रकाश का आलम्बन यह दशार चक्र है। पृथिवी आदि दस तत्त्व शिवात्मक और यकार आदि दस वर्ण शक्त्यात्मक हैं। यह दशार चक्र भी प्रकाशविमर्शमय शिव-शक्ति के प्रकाश से घिरा हुआ है। पृथिवी आदि दस तत्त्व और यकारादि क्षकारान्त दस वर्णों से संयुक्त होने से प्रथम दशार आदि तीन चक्रों की स्थितिरूपता जानी जाती है। १. परा—उ. । २. चन्द्र—उ. । ३. 'वर्णानां' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. । ४. कत्वात्— ख. ग. ने. ज. झ. ।
- भास्करराय ने यहाँ 'शक्त्यादि' शब्द से मकार का ग्रहण किया है। उनके मत से इन दस वर्णों में ळकार की गणना नहीं की जाती और इस तरह से त्रिकोण से चतुर्दशार पर्यन्त चक्रों में सभी (पचास) वैखरी वर्णों का विन्यास पूर्ण हो जाता है। अमृतानन्द ५१ वैखरी वर्णों के पक्षधर लगते हैं। आगे मूल ग्रन्थ में (३।१००-१०१) भी इसी पद्धति से वैखरी वर्णों का विन्यास बताया गया है, किन्तु इस क्रम में मकार का विन्यास कहीं नहीं होने पाता। बीजाक्षरों में बिन्दु अनिवार्य तत्त्व है। मकार को बिन्दु का प्रतीक मानकर और इस तरह से प्रत्येक वर्ण में इसकी सत्ता समझ कर मूल ग्रन्थ और अमृतानन्द की व्याख्या की संगति बैठाई जा सकती है।