योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
DevanagariHindipublished485 पृष्ठ
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प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २५ करशुद्ध्यादितत्तन्मन्त्रनवककलितमष्टकोणमध्यगतं१ षोडशस्वरावृतम् अम्बि- काशान्तासामरस्यरूपमहाबिन्दुमयसदाशिवासना रूढप्रकाशविमर्शात्मककामेश्वर- कामेश्वर्यधिष्ठितमिति ॥१४॥ उपरितनचक्रं सवासनमुत्पादयति-- नवत्रिकोणस्फुरितप्रभारूपदशारकम् । शक्त्यादिनवपर्यन्तदशार्णस्फूर्तिकारकम्२ ॥१५॥ भूततन्मात्रदशकप्रकाशालम्बनत्वतः । नव च त्रिकोणं३ च नवत्रिकोणानि । त्रिकोणशब्देन त्रिकोणमध्य४गतं बैन्दवं लक्ष्यते । नवत्रिकोणानां बैन्दवस्य च ५परितः स्फुरिताः प्रतीयमानाः प्रभा दश, तद्रूपं दशारं यत्र । यद्यथा परिणमते तत् तथाविधम् । शक्तिः रेफः । तदुक्तं६मुद्गा-
शुद्धि प्रभृति नौ मन्त्रों से संयुक्त हो जाता है। यही त्रिकोण चक्र जब अष्टकोण (नव- योनिचक्र) के मध्य में स्थित रहता है, तो १६ स्वरों से आवृत हो जाता है। इसी के मध्य में स्थित अम्बिका और शान्ता शक्ति के सामरस्य स्वरूप महाबिन्दु में सदाशिव रूपी आसन पर बैठे हुए प्रकाशविमर्शात्मक कामेश्वर और कामेश्वरी के युगल स्वरूप का निवास है ॥१४॥ भावनापद्धति के साथ अब आगे के चक्रों की निष्पत्ति बताते हैं— नवयोनि और त्रिकोण मध्यगत महाबिन्दु की प्रभा से दशार चक्र की निष्पत्ति होती है। इसमें यकार से लेकर क्षकार पर्यन्त दस वर्णों का स्फुरण होता है। यह दशार चक्र पांच महाभूत और पांच तन्मात्राओं के प्रकाश का आलम्बन है ॥१५॥ नवत्रिकोण शब्द में द्वन्द्व समास होने से नवयोनि और त्रिकोण का ग्रहण होता है। त्रिकोण शब्द से यहाँ त्रिकोण के मध्य में स्थित बिन्दु का ग्रहण किया जाता है। नवयोनि (अष्टार) चक्र और बैन्दव चक्र से चारों तरफ फैली प्रकाश की किरणें ही दशार चक्र का रूप धारण कर लेती हैं। जो जिससे परिणत होता है, वह वैसा ही हो जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि नवयोनि और बैन्दव चक्र के परिणाम से निष्पन्न यह चक्र दशार का रूप धारण कर लेता है। शक्ति शब्द से रेफ का ग्रहण किया जाता है।
१. 'मध्य' नास्ति-घ. ने. ज. झ. उक., कोणान्तः-उग. । २. णम्-ग. घ. ने. ज. झ. उ. । ३. णानि-च. झ. । ४. मध्यं-ख. ने. ज. उ. । ५. 'परितः' नास्ति-ख. ग. घृ. ज. झ. उ. । ६. मध्याहारो-ग. घ. ब. उ. ।