भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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२४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः तदनलरूपं१ सकलवर्णाद्यभूतमनुत्तरं प्रकाशात्मकं संवर्तानलः । चिदेव कला चित्कला विमर्शात्मिका सर्व२वर्णान्त्यभूतहार्थकलारूपा । तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्— अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः । हकारोऽन्त्यः कलारूपो विमर्शाख्यः प्रकीर्तितः ॥ इति । बैन्दवासनसंरूढे संवर्तानलचित्कले यस्मिन् तत्, तथैवं त्रिकोणं शिवशक्ति- सामरस्यरूपमहाबिन्दुमं३यमध्यचक्रोत्पन्नत्वादम्बिकारूपम् । अष्टारस्थं त्रिकोण- ४स्पन्दत्रयसमुत्पन्नत्वादष्टकोणस्य ५तत इदं त्रिकोणमष्टारस्थम् । स्वरावृतम् अकारादिबिन्द्वन्तपञ्चदशस्वरैस्त्रिधा विभक्तैराकलितरेखात्रयम्, अःस्वराक्रान्त- मध्यम् । तदुक्तमभियुक्तैः—"विभाव्य च महात्र्यस्रं समरेखं स्वरोदरम्" (सु० ४१) इति । अयमर्थः—इदमेव त्रिकोणचक्रं नवचक्रात्मना परिणतं त्रिपुरादिनवचक्रेश्वरो- अकार में ही उस समय लीन हो जाता है । सभी वर्णों के अन्त में स्थित विमर्शात्मक हार्धकला को ही यहाँ चित्कला कहा गया है । संकेतपद्धति में भी यह विषय वर्णित है— सभी वर्णों का आदिभूत अकार प्रकाशात्मक परम शिव है । अन्तिम वर्ण हकार विम- र्शात्मक चित्कला का स्वरूप है ॥ त्रिकोण चक्र के मध्य में स्थित महाबिन्दु में ही संवर्तानल और चित्कला का स्थान है, यही अम्बिका रूप भी है, किन्तु शिव-शक्ति सामरस्य स्वरूप महाबिन्दुमयं मध्यचक्र से ही त्रिकोण चक्र की उत्पत्ति होती है, अतः त्रिकोण चक्र को भी यहाँ अम्बिका रूप मान लिया गया है । यही त्रिकोणचक्र अष्टारचक्र में भी स्थित है, क्योंकि अष्टकोण नवयोनि चक्र त्रिकोण के तीन स्पन्दनों से बनता है । यह षोडश स्वरों से आवृत है । अकार से लेकर बिन्दुपर्यन्त १५ स्वरों को तीन हिस्सों में बाँटकर त्रिकोण चक्र की एक- एक रेखा में पाँच-पाँच स्वरों को और त्रिकोण के मध्य में १६वें स्वर अः को लिखा जाता है । सुभगोदयकार१ शिवानन्द ने भी कहा है— महात्र्यस्र, अर्थात् प्रथम मूल त्रिकोण की समान रेखाओं के मध्य में सभी स्वरों की भावना करनी चाहिए ॥ ऊपर की तीन पंक्तियों का अभिप्राय यह है—यह त्रिकोण चक्र ही अन्ततः नौ चक्रों का रूप धारण कर लेता है तथा त्रिपुरा प्रभृति नौ चक्रेश्वरी देवियों और उनके कर- १. चक्रं-घ. झ., चक्रं पररूपं-ग. ज. ने झ. उ. । २. वर्णानामन्तिमा-क., वर्णाभ्यन्तर-ग. झ. उ. । ३. 'मयमध्य' नास्ति-ख. ग. घ. उ. । ४. स्यन्द-ख. घ. ने. । ५. ततोऽष्टारस्थम्-ख. ग. ज. झ. उ. । १. महार्थमंजरीकार महेश्वरानन्द के परमगुरु नित्याषोडशिकार्णव की टीका (ऋजु- विमर्शिनी) के रचयिता शिवानन्द मुनि का यह ग्रन्थ नित्याषोडशिकार्णव के काशी संस्करण (पृ० ३८४-३९६) में प्रकाशित हो चुका है।