योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः तदनलरूपं१ सकलवर्णाद्यभूतमनुत्तरं प्रकाशात्मकं संवर्तानलः । चिदेव कला चित्कला विमर्शात्मिका सर्व२वर्णान्त्यभूतहार्थकलारूपा । तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्— अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः । हकारोऽन्त्यः कलारूपो विमर्शाख्यः प्रकीर्तितः ॥ इति । बैन्दवासनसंरूढे संवर्तानलचित्कले यस्मिन् तत्, तथैवं त्रिकोणं शिवशक्ति- सामरस्यरूपमहाबिन्दुमं३यमध्यचक्रोत्पन्नत्वादम्बिकारूपम् । अष्टारस्थं त्रिकोण- ४स्पन्दत्रयसमुत्पन्नत्वादष्टकोणस्य ५तत इदं त्रिकोणमष्टारस्थम् । स्वरावृतम् अकारादिबिन्द्वन्तपञ्चदशस्वरैस्त्रिधा विभक्तैराकलितरेखात्रयम्, अःस्वराक्रान्त- मध्यम् । तदुक्तमभियुक्तैः—"विभाव्य च महात्र्यस्रं समरेखं स्वरोदरम्" (सु० ४१) इति । अयमर्थः—इदमेव त्रिकोणचक्रं नवचक्रात्मना परिणतं त्रिपुरादिनवचक्रेश्वरो- अकार में ही उस समय लीन हो जाता है । सभी वर्णों के अन्त में स्थित विमर्शात्मक हार्धकला को ही यहाँ चित्कला कहा गया है । संकेतपद्धति में भी यह विषय वर्णित है— सभी वर्णों का आदिभूत अकार प्रकाशात्मक परम शिव है । अन्तिम वर्ण हकार विम- र्शात्मक चित्कला का स्वरूप है ॥ त्रिकोण चक्र के मध्य में स्थित महाबिन्दु में ही संवर्तानल और चित्कला का स्थान है, यही अम्बिका रूप भी है, किन्तु शिव-शक्ति सामरस्य स्वरूप महाबिन्दुमयं मध्यचक्र से ही त्रिकोण चक्र की उत्पत्ति होती है, अतः त्रिकोण चक्र को भी यहाँ अम्बिका रूप मान लिया गया है । यही त्रिकोणचक्र अष्टारचक्र में भी स्थित है, क्योंकि अष्टकोण नवयोनि चक्र त्रिकोण के तीन स्पन्दनों से बनता है । यह षोडश स्वरों से आवृत है । अकार से लेकर बिन्दुपर्यन्त १५ स्वरों को तीन हिस्सों में बाँटकर त्रिकोण चक्र की एक- एक रेखा में पाँच-पाँच स्वरों को और त्रिकोण के मध्य में १६वें स्वर अः को लिखा जाता है । सुभगोदयकार१ शिवानन्द ने भी कहा है— महात्र्यस्र, अर्थात् प्रथम मूल त्रिकोण की समान रेखाओं के मध्य में सभी स्वरों की भावना करनी चाहिए ॥ ऊपर की तीन पंक्तियों का अभिप्राय यह है—यह त्रिकोण चक्र ही अन्ततः नौ चक्रों का रूप धारण कर लेता है तथा त्रिपुरा प्रभृति नौ चक्रेश्वरी देवियों और उनके कर- १. चक्रं-घ. झ., चक्रं पररूपं-ग. ज. ने झ. उ. । २. वर्णानामन्तिमा-क., वर्णाभ्यन्तर-ग. झ. उ. । ३. 'मयमध्य' नास्ति-ख. ग. घ. उ. । ४. स्यन्द-ख. घ. ने. । ५. ततोऽष्टारस्थम्-ख. ग. ज. झ. उ. । १. महार्थमंजरीकार महेश्वरानन्द के परमगुरु नित्याषोडशिकार्णव की टीका (ऋजु- विमर्शिनी) के रचयिता शिवानन्द मुनि का यह ग्रन्थ नित्याषोडशिकार्णव के काशी संस्करण (पृ० ३८४-३९६) में प्रकाशित हो चुका है।