योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
२४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः तदनलरूपं१ सकलवर्णाद्यभूतमनुत्तरं प्रकाशात्मकं संवर्तानलः । चिदेव कला चित्कला विमर्शात्मिका सर्व२वर्णान्त्यभूतहार्थकलारूपा । तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्— अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः । हकारोऽन्त्यः कलारूपो विमर्शाख्यः प्रकीर्तितः ॥ इति । बैन्दवासनसंरूढे संवर्तानलचित्कले यस्मिन् तत्, तथैवं त्रिकोणं शिवशक्ति- सामरस्यरूपमहाबिन्दुमं३यमध्यचक्रोत्पन्नत्वादम्बिकारूपम् । अष्टारस्थं त्रिकोण- ४स्पन्दत्रयसमुत्पन्नत्वादष्टकोणस्य ५तत इदं त्रिकोणमष्टारस्थम् । स्वरावृतम् अकारादिबिन्द्वन्तपञ्चदशस्वरैस्त्रिधा विभक्तैराकलितरेखात्रयम्, अःस्वराक्रान्त- मध्यम् । तदुक्तमभियुक्तैः—"विभाव्य च महात्र्यस्रं समरेखं स्वरोदरम्" (सु० ४१) इति । अयमर्थः—इदमेव त्रिकोणचक्रं नवचक्रात्मना परिणतं त्रिपुरादिनवचक्रेश्वरो- अकार में ही उस समय लीन हो जाता है । सभी वर्णों के अन्त में स्थित विमर्शात्मक हार्धकला को ही यहाँ चित्कला कहा गया है । संकेतपद्धति में भी यह विषय वर्णित है— सभी वर्णों का आदिभूत अकार प्रकाशात्मक परम शिव है । अन्तिम वर्ण हकार विम- र्शात्मक चित्कला का स्वरूप है ॥ त्रिकोण चक्र के मध्य में स्थित महाबिन्दु में ही संवर्तानल और चित्कला का स्थान है, यही अम्बिका रूप भी है, किन्तु शिव-शक्ति सामरस्य स्वरूप महाबिन्दुमयं मध्यचक्र से ही त्रिकोण चक्र की उत्पत्ति होती है, अतः त्रिकोण चक्र को भी यहाँ अम्बिका रूप मान लिया गया है । यही त्रिकोणचक्र अष्टारचक्र में भी स्थित है, क्योंकि अष्टकोण नवयोनि चक्र त्रिकोण के तीन स्पन्दनों से बनता है । यह षोडश स्वरों से आवृत है । अकार से लेकर बिन्दुपर्यन्त १५ स्वरों को तीन हिस्सों में बाँटकर त्रिकोण चक्र की एक- एक रेखा में पाँच-पाँच स्वरों को और त्रिकोण के मध्य में १६वें स्वर अः को लिखा जाता है । सुभगोदयकार१ शिवानन्द ने भी कहा है— महात्र्यस्र, अर्थात् प्रथम मूल त्रिकोण की समान रेखाओं के मध्य में सभी स्वरों की भावना करनी चाहिए ॥ ऊपर की तीन पंक्तियों का अभिप्राय यह है—यह त्रिकोण चक्र ही अन्ततः नौ चक्रों का रूप धारण कर लेता है तथा त्रिपुरा प्रभृति नौ चक्रेश्वरी देवियों और उनके कर- १. चक्रं-घ. झ., चक्रं पररूपं-ग. ज. ने झ. उ. । २. वर्णानामन्तिमा-क., वर्णाभ्यन्तर-ग. झ. उ. । ३. 'मयमध्य' नास्ति-ख. ग. घ. उ. । ४. स्यन्द-ख. घ. ने. । ५. ततोऽष्टारस्थम्-ख. ग. ज. झ. उ. । १. महार्थमंजरीकार महेश्वरानन्द के परमगुरु नित्याषोडशिकार्णव की टीका (ऋजु- विमर्शिनी) के रचयिता शिवानन्द मुनि का यह ग्रन्थ नित्याषोडशिकार्णव के काशी संस्करण (पृ० ३८४-३९६) में प्रकाशित हो चुका है।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २५ करशुद्ध्यादितत्तन्मन्त्रनवककलितमष्टकोणमध्यगतं१ षोडशस्वरावृतम् अम्बि- काशान्तासामरस्यरूपमहाबिन्दुमयसदाशिवासना रूढप्रकाशविमर्शात्मककामेश्वर- कामेश्वर्यधिष्ठितमिति ॥१४॥ उपरितनचक्रं सवासनमुत्पादयति-- नवत्रिकोणस्फुरितप्रभारूपदशारकम् । शक्त्यादिनवपर्यन्तदशार्णस्फूर्तिकारकम्२ ॥१५॥ भूततन्मात्रदशकप्रकाशालम्बनत्वतः । नव च त्रिकोणं३ च नवत्रिकोणानि । त्रिकोणशब्देन त्रिकोणमध्य४गतं बैन्दवं लक्ष्यते । नवत्रिकोणानां बैन्दवस्य च ५परितः स्फुरिताः प्रतीयमानाः प्रभा दश, तद्रूपं दशारं यत्र । यद्यथा परिणमते तत् तथाविधम् । शक्तिः रेफः । तदुक्तं६मुद्गा-
शुद्धि प्रभृति नौ मन्त्रों से संयुक्त हो जाता है। यही त्रिकोण चक्र जब अष्टकोण (नव- योनिचक्र) के मध्य में स्थित रहता है, तो १६ स्वरों से आवृत हो जाता है। इसी के मध्य में स्थित अम्बिका और शान्ता शक्ति के सामरस्य स्वरूप महाबिन्दु में सदाशिव रूपी आसन पर बैठे हुए प्रकाशविमर्शात्मक कामेश्वर और कामेश्वरी के युगल स्वरूप का निवास है ॥१४॥ भावनापद्धति के साथ अब आगे के चक्रों की निष्पत्ति बताते हैं— नवयोनि और त्रिकोण मध्यगत महाबिन्दु की प्रभा से दशार चक्र की निष्पत्ति होती है। इसमें यकार से लेकर क्षकार पर्यन्त दस वर्णों का स्फुरण होता है। यह दशार चक्र पांच महाभूत और पांच तन्मात्राओं के प्रकाश का आलम्बन है ॥१५॥ नवत्रिकोण शब्द में द्वन्द्व समास होने से नवयोनि और त्रिकोण का ग्रहण होता है। त्रिकोण शब्द से यहाँ त्रिकोण के मध्य में स्थित बिन्दु का ग्रहण किया जाता है। नवयोनि (अष्टार) चक्र और बैन्दव चक्र से चारों तरफ फैली प्रकाश की किरणें ही दशार चक्र का रूप धारण कर लेती हैं। जो जिससे परिणत होता है, वह वैसा ही हो जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि नवयोनि और बैन्दव चक्र के परिणाम से निष्पन्न यह चक्र दशार का रूप धारण कर लेता है। शक्ति शब्द से रेफ का ग्रहण किया जाता है।
१. 'मध्य' नास्ति-घ. ने. ज. झ. उक., कोणान्तः-उग. । २. णम्-ग. घ. ने. ज. झ. उ. । ३. णानि-च. झ. । ४. मध्यं-ख. ने. ज. उ. । ५. 'परितः' नास्ति-ख. ग. घृ. ज. झ. उ. । ६. मध्याहारो-ग. घ. ब. उ. ।
२६ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः रोर्ध्वतन्त्रे १रमाशक्तिबीजोद्धारे—"चन्द्रः२ शक्तिर्महाशक्तिर्ब्रह्माणी कालिकादि- कम्" इति। शक्ते रेफस्यादिर्यकारः, शक्त्यादिकारमारभ्य नवानां ३वर्णानां पर्यन्तः क्षकारः, तेषां दशानां स्फूर्तिकारकम्। स्फूर्तिर्विमर्शः। यकारादिक्षका- रान्तदशवर्णविमर्शकमित्यर्थः ॥१५॥ भूतानि पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशाः, तन्मात्राः पञ्च गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः, तेषां दशानां प्रकाशा दश, तेषामालम्बनत्वात्४। शिवात्मकत्वात् पृथिव्याद्यर्था- नाम्, शक्त्यात्मकत्वाद् यकारादिवर्णानाम्। तदुभयप्रकाशविमर्शमयदशकोणावृत- मिदं चक्रमित्यर्थः। पृथिव्यादिक्षकारान्तवर्णदशकमयताकथनेन प्रथमदशारादि- चक्रत्रयस्य स्थितिरूपता द्योत्यते। रमा शक्ति के बीज का उद्धार करते समय उद्धारोर्ध्वतन्त्र में बताया गया है—"चन्द्र, शक्ति, महाशक्ति, ब्रह्माणी, कालिका आदि शब्द (इस बीज के वाचक हैं)"। शक्ति अर्थात् रेफ का आदि यकार है। १यकार से लेकर ळकार सहित नौ वर्णों के अन्त में क्षकार है। यह चक्र इन दस वर्णों की स्फूर्ति करता है। स्फूर्ति का अर्थ यहाँ विमर्श है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि यकार से लेकर क्षकार पर्यन्त १० वर्णों का यहाँ विन्यास करना चाहिये ॥१५॥ पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश—भूत कहलाते हैं। गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द—ये हैं पांच तन्मात्राएँ। इन दस तत्त्वों के प्रकाश का आलम्बन यह दशार चक्र है। पृथिवी आदि दस तत्त्व शिवात्मक और यकार आदि दस वर्ण शक्त्यात्मक हैं। यह दशार चक्र भी प्रकाशविमर्शमय शिव-शक्ति के प्रकाश से घिरा हुआ है। पृथिवी आदि दस तत्त्व और यकारादि क्षकारान्त दस वर्णों से संयुक्त होने से प्रथम दशार आदि तीन चक्रों की स्थितिरूपता जानी जाती है। १. परा—उ. । २. चन्द्र—उ. । ३. 'वर्णानां' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. । ४. कत्वात्— ख. ग. ने. ज. झ. ।
- भास्करराय ने यहाँ 'शक्त्यादि' शब्द से मकार का ग्रहण किया है। उनके मत से इन दस वर्णों में ळकार की गणना नहीं की जाती और इस तरह से त्रिकोण से चतुर्दशार पर्यन्त चक्रों में सभी (पचास) वैखरी वर्णों का विन्यास पूर्ण हो जाता है। अमृतानन्द ५१ वैखरी वर्णों के पक्षधर लगते हैं। आगे मूल ग्रन्थ में (३।१००-१०१) भी इसी पद्धति से वैखरी वर्णों का विन्यास बताया गया है, किन्तु इस क्रम में मकार का विन्यास कहीं नहीं होने पाता। बीजाक्षरों में बिन्दु अनिवार्य तत्त्व है। मकार को बिन्दु का प्रतीक मानकर और इस तरह से प्रत्येक वर्ण में इसकी सत्ता समझ कर मूल ग्रन्थ और अमृतानन्द की व्याख्या की संगति बैठाई जा सकती है।
प्रथम ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २७ द्वितीयदशारमाह- द्विदशारस्फुरद्रूपं क्रोधीशादिदशार्णकम् ॥१६॥ द्वितीयदशारं द्विदशारम् । १'रूप्यन्त इति रूपा इन्द्रियार्था दश, शब्दादयो वचनादयश्च, द्वितीयदशारतया स्फुरन्तो रूपा यस्य तत् तथाविधम्। क्रोधीशः ककारः। ककारादिदशवर्णवत्। कोऽर्थः ? बैन्दवत्रिकोणाष्टकोणचक्रेषु मध्य- स्थितप्रकाशविमर्शमयदीपद्वयदीपितेषु तद्दशकप्रभाच्छायादशकद्वयमययकारादि- पृथिव्यादिककारादिशब्दादिशकद्वयात्मकं दशार(२चक्रद्वयं जातमित्यर्थः । तदुक्तं कामकलाविलासे- नवकोणमध्यमञ्चास्मिंश्चिद्दीपदीपिते दशके । तच्छायाद्वितयमिदं) चक्रद्वयात्मना दृष्टम् ॥ (श्लो० २९-३०) इति । ननु-"भूततन्मात्रदशकप्रकाशाल्म्बनत्वतः" (१।१६) इत्यत्रैव शब्दादीना- मुक्तत्वात् पुनः "द्विदशारस्फुरद्रूपम्" (१।१६) इत्यत्रापि रूपशब्देनापि कथं अब द्वितीय दशार चक्र का वर्णन करते हैं- द्वितीय दशार चक्र इन्द्रियों के १० रूपों (विषयों) को स्फुटित करता है। इसमें ककार प्रभृति १० वर्णों का विन्यास किया जाता है ॥१६॥ द्वितीय दशार को ही यहाँ द्विदशार कहा गया है। रूप शब्द से इन्द्रियों के १० विषयों का ग्रहण होता है। शब्द आदि बुद्धीन्द्रियों के और वचन आदि कर्मेन्द्रियों के विषयों का स्फुरण करने वाला है यह द्वितीय दशार चक्र। क्रोधीश शब्द से ककार का ग्रहण होता है। यह चक्र ककार आदि १० वर्ण वाला है। इस श्लोक का अभिप्राय यह है कि बैन्दव, त्रिकोण और अष्टकोण चक्र मध्य में स्थित प्रकाशविमर्शमय दो दीपों से आलोकित हैं। इनकी दस प्रभाओं के प्रतिबिम्ब से प्रथम दशार चक्र और द्वितीय दशार चक्र की निष्पत्ति होती है। इसी के साथ यकार प्रभृति दस वर्ण, पृथिवी प्रभृति दस तत्त्व प्रथम दशार में और ककार प्रभृति दस वर्ण, शब्द प्रभृति दस विषय द्वितीय दशार में अभिव्यक्त होते हैं। यह विषय कामकलाविलास में भी वर्णित है- नवयोनि चक्र और मध्यत्रिकोण चक्र के मध्य में स्थित मञ्च, अर्थात् सदाशिवासन स्थानीय बिन्दुचक्र में विराजमान प्रकाशविमर्शमय ज्ञानदीपक की प्रभा की दस किरणों के द्विविध प्रतिबिम्ब से दो प्रकार के दशार चक्रों की निष्पत्ति देखी गई है ॥ यहाँ प्रश्न उठता है कि "भूततन्मात्र" प्रभृति श्लोक में ही शब्द प्रभृति विषयों का वर्णन हो चुका है, फिर "द्विदशार" प्रभृति श्लोक में पुनः रूप शब्द से उन्हीं का ग्रहण १. 'रूप्यन्त' 'वचनादयश्च' नास्ति-ग. घ. ने. ज. झ. उ.। २. कोष्ठान्तर्गतः पाठः कपुस्तकं विहाय क्वापि न दृश्यते ।
२८ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः गृह्यन्ते ? मैवम्, तन्मात्रपदेन भूतसूक्ष्माणामनिन्द्रियगोचराणां ग्रहणम्, रूपशब्देन तु भूतगुणाः शब्दादयः श्रोत्रादिग्राह्या गृह्यन्ते, अतो न विरोधः ॥१६॥ चतुर्दशारमाह— चतुश्चक्रप्रभारूपसंयुक्तपरिणामतः । चतुर्दशाररूपेण संवित्तिकरणात्मना ॥१७॥ खेचर्यादिजयन्तार्णपरसार्थप्रथामयम् । चत्वारि चक्राणि बैन्दवत्रिकोणाष्टकोणप्रथमदशाररूपाणि, तेषां प्रभाश्चतस्रः । विप्रकृष्टत्वात् प्रभामात्रमेव गम्यते । यथा बहवो वृक्षा वनमिति नावयवभेदः, तथा१ । तच्चक्रप्रभाचतुष्टयसंयुक्तस्य द्वितीयदशारस्य सन्निकृष्टत्वादवयवप्रतीति- स्तत्प्रभाचतुष्टयसम्२वेतद्वितीयदशा३रावयवदशकपरिणामत्वात् । चतुर्दशाररूपेण संवित्तिकरणात्मना । संवित्तिः ज्ञानम् । संवित्तिशब्देन क्रियापि लक्ष्यते । करणानि कैसे हो सकता है ? इसका समाधान यह है कि तन्मात्र शब्द से शब्दतन्मात्रा प्रभृति सूक्ष्म भूतों का ग्रहण होता है, जो कि इन्द्रियगोचर नहीं है । रूप शब्द से शब्द प्रभृति भूत गुणों का ग्रहण किया जाता है, जो कि श्रोत्र प्रभृति इन्द्रियों से गृहीत होते हैं। इस तरह से यहाँ कोई विरोध नहीं है ॥१६॥ चतुर्दशार चक्र की भावना इस तरह से की जाती है— चार चक्रों की प्रभा के साथ संयुक्त द्वितीय दशार की प्रभा से चतुर्दशार चक्र निष्पन्न होता है। यह चतुर्दश करणों का प्रतिनिधि है। टकार से लेकर भकार पर्यन्त १४ वर्णों का इसमें विन्यास किया जाता है ॥१७-१८॥ चार चक्र हैं बैन्दव, त्रिकोण, अष्टकोण और प्रथम दशार । इनसे चार प्रभाएँ छिटकती हैं । चतुर्दशार चक्र के इनसे दूर होने से वहाँ इनकी प्रभामात्र का दर्शन होता है । जैसे कि दूरी के कारण वन में वृक्षों की अलग-अलग पहचान नहीं होती, उसी तरह से चतुर्दशार चक्र में इनकी प्रभा की ही प्रतीति होती है, उनके अवयवों की नहीं । इन चार चक्रों की चार प्रभाओं के साथ चतुर्दशार चक्र में द्वितीय दशार के दस अव- यवों का स्पष्ट दर्शन होता है, क्योंकि द्वितीय दशार चक्र की स्थिति उसके पास में ही है । इस तरह से चार चक्रों की चार प्रभाओं और द्वितीय दशार चक्र के दस अवयवों से मिलकर यह चक्र बनता है । इसका यह चतुर्दशार रूप संवित्तिकरणात्मक है । संवित्ति ज्ञान को कहते हैं। इस ज्ञान के साथ क्रिया भी जुड़ी हुई है । इसका यह अभिप्राय हुआ कि यह ज्ञान और क्रिया शक्ति के स्फुरण से आविर्भूत चतुर्दशार चक्र श्रोत्र प्रभृति १. तथा तच्चक्रभेदः—ख. ने. ज. । २. समेत—ख. ग. ज. झ. उ. । ३. दशा- रावयववत् । चतु—ख. ग. घ. ज. झ. ।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २९ इन्द्रियदशकं श्रोत्रादिकं वागादिकं च, मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तानि चतुर्दश, तदात्मना ॥१७॥ खेचरी टकारः, जया भकारः, टकारादिभकारान्ताश्चतुर्दश वर्णाः, तेषां परमार्थप्रथा कारणभूता प्रथा विमर्शस्तन्मयम् । कोऽर्थः ? मध्यचक्रमेव त्रिकोणाष्ट- कोणद्विदशकोणक्रमेण १श्रोत्रादिज्ञानेन्द्रियवागादिकर्मेन्द्रियमनोबुद्ध्यहङ्कारचित्ता- त्मककरणचतुर्दशक - टकारादिभकारान्तवर्णचतुर्दशक२प्रकाशविमर्शमयचतुर्दशार- रूपेण परिण३तमित्यर्थः । त्रिकोणचक्रस्य—“अम्बिकारूपमेवेदमष्टारस्थं स्वरावृतम्” (१।१४) इत्य- त्राम्बिकारूपतामुक्त्वेदानीमष्टारादिचतुर्दशारपर्यन्तस्य श्रीचक्रस्य रौद्रीरूपता- माह— एवं शक्त्यनलाकारस्फुरद्रौद्रीप्रभामयम् ॥१८॥ एवमुक्तप्रकारेण शक्त्यनलाकारेण पञ्चशक्तिचतुर्वह्निरूपेण स्फुरच्चक्रं द्विचत्वारिंशद्योन्यात्मकं रौद्रीप्र४भामयं रौद्रीशक्तिविस्फारविजृम्भितमित्यर्थः ॥१८॥ पाँच ज्ञानेन्द्रियमय, वाक्प्रभृति पाँच कर्मेन्द्रियमय और मन, बुद्धि, अहंकार तथा चित्त नामक अन्तःकरण चतुष्टयमय है ॥१७॥ खेचरी से टकार का और जया से भकार का ग्रहण होता है । टकार से लेकर भकार पर्यन्त १४ वर्णों की परमार्थ प्रभा, अर्थात् इन वर्णों की कारणभूत विमर्शशक्ति इनमें विराजमान है । इसका अभिप्राय यह है कि मध्यचक्र ही, अर्थात् मध्यचक्र में विराजमान विमर्शशक्ति ही त्रिकोण, अष्टकोण, प्रथम दशार और द्वितीय दशार के क्रम से श्रोत्र प्रभृति ज्ञानेन्द्रिय, वाक् प्रभृति कर्मेन्द्रिय और मन, बुद्धि, अहंकार तथा चित्तात्मक अन्तःकरण चतुष्टय को मिलाकर चौदह करणों एवं टकार से लेकर भकार पर्यन्त १४- वर्णों के रूप में परिणत होती है । इस तरह से प्रकाशविमर्शमय तत्त्वात्मक और वर्णा- त्मक चतुर्दशार चक्र निष्पन्न होता है । त्रिकोण चक्र को पहले (१।१४) अम्बिकाशक्तिमय बताया गया है । अब यहाँ अष्टार से लेकर चतुर्दशार पर्यन्त चक्रों की रौद्रीमयता का प्रतिपादन किया जा रहा है— इस तरह से शक्तिचक्रों और वह्निचक्रों के संयोग से बने चक्र रौद्री शक्ति की प्रभा से स्फुरित हैं ॥१८॥ इस तरह से ऊपर बताई गई पद्धति से पाँच शक्तिचक्रों और चार वह्निचक्रों के स्फुरण से निष्पन्न ४२ योनिमय यह चक्रसमूह रौद्री शक्ति का ही अनोखा विस्तार है ॥१८॥ १. 'श्रोत्रादि''''भकारान्तवर्णं' नास्ति-ख. । २. दशकं-ख. ने. । ३. णमत इ-ख. ग. घ. ने. ज. ड. । ४. प्रथा-ने. ज. झ. ।
३० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः शिष्टं चक्रमाह— ज्येष्ठारूपचतुष्कोणं वामारूपभ्रमित्रयम् । ज्येष्ठाशक्तिरूपाणि चतुष्कोणानि १चतुरस्राणि २त्रीणि यस्य तज्ज्येष्ठारूप- चतुष्कोणम् । वामाशक्तिरूपं भ्रमित्रयं वृत्तत्रयं यस्य तत् । भ्रमित्रयशब्देन तदन्तरालस्थितपद्मद्वयमपि लक्ष्यते । अत्र वक्ष्यति३—‘‘पद्मद्वयेन चान्यः स्याद् भूगृहत्रितयेन च’’ (१।७४) इति । अत्र वामारूपभ्रमित्रयं ज्येष्ठारूप- चतुष्कोणमिति पाठे युक्तेऽप्यम्बिकादिशक्तिपाठक्रमा४ज्ज्येष्ठारूपचतुष्कोणं वामा- रूपभ्रमित्रयमित्युक्तं देवेन । अब बचा हुआ चक्र इस प्रकार उपदिष्ट है— इस श्रीचक्र का चतुष्कोण ज्येष्ठाशक्तिमय और वृत्तत्रय वामाशक्तिमय है । इस श्रीचक्र के तीन चतुरस्र ज्येष्ठा शक्ति के विस्फार से और वृत्तत्रय वामा शक्ति के विस्फार से प्रकट होते हैं। भ्रमित्रय (वृत्तत्रय) शब्द से उनके बीच में विद्यमान अष्टदल और षोडशदल पद्मों का भी ग्रहण किया जाता है। १आगे (१।७४) इस विषय को स्पष्ट किया जायगा । श्रीचक्र में भ्रमित्रय की पहले तथा चतुरस्र की बाद में स्थिति है, किन्तु यहाँ चतुरस्र का पहले तथा भ्रमित्रय का बाद में वर्णन है । इसका कारण यह है कि यहाँ पर अम्बिका प्रभृति चार शक्तियों की श्रीचक्र में स्थिति बताई२ गई है। उन शक्तियों के क्रम में ज्येष्ठा की पहले और वामा की बाद में स्थिति होने से उनके अनुसार चक्रों के क्रम को बदल दिया गया है। १. चतुरस्ररूपाणि यस्य–ख. ग. ने. ज. । २. 'त्रीणि' नास्ति–झ. उ. । ३. वक्ष्यते च–ख. ग. घ. ने. झ. उ. । ४. क्रमायाततया–ख झ. ।
- आगे (१।७३-७५) परिपूर्ण महाचक्र की त्रिविध भावना का वर्णन करते हुए वृत्तत्रय के अन्तरालवर्ती अष्टदल और षोडशदल पद्मों का उल्लेख किया गया है ।
- श्रीचक्र की अम्बिकारूपता का १४वें श्लोक में, रौद्रीरूपता का १८वें और ज्येष्ठा एवं वामारूपता का वर्णन १९वें श्लोक में है। यहाँ अम्बिका, रौद्री, ज्येष्ठा और वामा नामक चार शक्तियों के क्रम के आधार पर श्रीचक्र के क्रम में परिवर्तन कर दिया गया है, अर्थात् श्रीचक्र के विस्तार के क्रम में वृत्तत्रय की पहले तथा चतुष्कोण की स्थिति बाद में है, किन्तु शक्तिक्रम में रौद्री शक्ति की प्राथमिकता के आधार पर चतु- रस्र का उल्लेख यहाँ पहले कर दिया गया है ।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३१ पुनरस्यैव चक्रस्य वासनान्तरमाह— चिदंशान्तस्त्रिकोणं च शान्त्यतीताष्टकोणकम् ॥१९॥ शान्त्यंशाद्विदशारं च तथैव भुवनारकम् । विद्याकलाप्रभोरूपदलाष्टकसमावृतम् ॥२०॥ प्रतिष्ठावपुषा स्पष्टस्फुरद्द्व्यष्टदलाम्बुजम् । निवृत्त्याकारविलसच्चतुष्कोणविराजितम् ॥२१॥ चिदंशः चित्कला, तन्मयमन्तस्त्रिकोणम् । शान्त्यतीता२-शान्ति-विद्या-प्रतिष्ठा- निवृत्तयो गगनादिपञ्चभूतकलाः । तन्मयमेतच्चक्रमित्यर्थः । अवयवार्थस्तु स्पष्ट एव ॥१९-२१॥ अस्यैव चक्रस्य संहारक्रमेण वासनान्तरमाह "त्रैलोक्यमोहनाद्ये तु" इत्यादि ‘क्रिया शेषम्’ इत्यन्तेन (श्लो० २२-२४)— पुनः इसी चक्र की भावना का दूसरा प्रकार बताते हैं— इस श्रीचक्र का बिन्दु और त्रिकोण चित्कलामय, अष्टकोण शान्त्यतीत- कलामय, प्रथम और द्वितीय दशार एवं चतुर्दशार शान्तिकलामय, अष्टदल विद्या- कला-प्रभामय, षोडशदल प्रतिष्ठाकलामय और चतुरस्र चक्र निवृत्तिकला का विलास है ॥१९-२१॥ चिदंश का अर्थ है चित्कला । अन्तस्त्रिकोण अर्थात् मध्यत्रिकोण चक्र और उसके मध्य में विराजमान बिन्दुचक्र दोनों चित्कला के विस्फार ( विस्तार ) से स्फुरित होते हैं । शान्त्यतीत, शान्ति, विद्या, प्रतिष्ठा, और निवृत्ति ये पाँच क्रमशः आकाश आदि पञ्च महाभूतों की कलाएँ हैं । अवशिष्ट चक्र इन पाँच कलाओं से ही उन्मीलित हुआ है । बाकी शब्दों का अर्थ स्पष्ट है ॥ १९-२१ ॥ श्रीचक्र की ऊपर बताई गई द्विविध वासना सृष्टि क्रम¹ के अनुसार है, अब २२ वें से लेकर २४ वें श्लोक तक संहार क्रम से भावना बताई जा रही है— १. प्रथा-उ. । २. तीत-घ. ने. ज. झ. उ. ।
- बिन्दु से चतुरस्र पर्यन्त क्रम सृष्टि तथा चतुरस्र से बिन्दु पर्यन्त क्रम संहार कहलाता है । यहीं आगे ( १।७७-७८ ) इस बात को दिखाया गया है । दोनों ही पद्धतियों से श्रीचक्र की पूजा विहित है । भावना भी उसी पद्धति से की जाती है । योगिनीहृदय में आगे ( १।५४ ) सृष्टि क्रम से वासना वर्णित है । अपनी व्याख्या में इसी क्रम को प्रधानता देने के अभिप्राय से अमृतानन्द ने सुभगोदयवासना के श्लोकों का क्रम बदल दिया है । वस्तुतः वहाँ संहार क्रम से श्रीचक्र की वासना वर्णित है ।
३२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः त्रैलोक्यमोहनाद्ये तु नवचक्रे सुरेश्वरि । नादो बिन्दुः कला ज्येष्ठा रौद्री वामा तथा पुनः ॥२२॥ विषघ्नी दूतरी चैव सर्वानन्दा क्रमात् स्थिताः । अत्र तुशब्दः पूर्वोक्तकामकलारूपत्वप्रतिपादनप्रसङ्गपरिसमाप्तौ । त्रैलोक्य- मोहनाद्ये तु इत्यत्र आद्यशब्देन¹ सर्वाशापरिपूरकादिचक्राण्युच्यन्ते । तेषां नामा- न्युत्तरत्र वक्ष्यति । त्रैलोक्यमोहनाद्ये नवचक्रे, जातावेकवचनम्, त्रैलोक्यमोह- नाद्येषु² नवचक्रेष्वित्यर्थः । नादादिसर्वानन्दान्ता नव शक्तयस्त्रैलोक्यमोहनादि- बैन्दवान्तनवचक्रेषु क्रमेणाधिवसन्तीत्यर्थः । पदार्थः स्पष्ट एव ॥२२-२३॥ पूर्वम् “अम्बिकारूपमेवेदम्” (१।१४) इत्यादिना प्रकाशांशानामम्बिकादीनां चतुर्णां त्रिकोणादिचतुरस्रान्तवासनामयतामुक्तेवेदानीं विमर्शांशानां शान्तादीनां चतुर्णां चतुरस्रादिबैन्दवान्त³क्रममयतावासनामाह— निरंशौ नादबिन्दू च कला चेच्छास्वरूपकम् ॥२३॥ ज्येष्ठा ज्ञानं क्रिया शेषम् हे सुरेश्वरि ! त्रैलोक्यमोहन (चतुरस्र) प्रभृति नौ चक्रों में क्रमशः नाद, बिन्दु, कला, ज्येष्ठा, रौद्री, वामा, विषघ्नी, दूतरी और सर्वानन्दा ये नौ शक्तियां निवास करती हैं ॥ २-२३ ॥ श्लोक में आये ‘तु’ शब्द का अभिप्राय यह है कि अब तक चला आ रहा कामकला का प्रसंग यहाँ समाप्त हो जाता है । आद्य शब्द से त्रैलोक्यमोहन चक्र के साथ सर्वाशा- परिपूरक आदि चक्रों संग्रह होता है। इनके नाम आगे ( १।८२-८४ ) बताये जायेंगे । त्रैलोक्यमोहनाद्ये नवचक्रे—यहाँ एकवचन समस्त चक्रजाति का वाचक है, उसका अर्थ होगा त्रैलोक्यमोहन आदि नौ चक्रों में । नाद से लेकर सर्वानन्दा पर्यन्त नौ शक्तियाँ त्रैलोक्यमोहन से लेकर बैन्दव पर्यन्त नौ चक्रों में क्रमशः निवास करती हैं । बाकी शब्दों का अर्थ स्पष्ट है ॥ २२-२३ ॥ पहले ( १।१४ ) प्रकाश की अंशभूत अम्बिका प्रभृति चार शक्तियों की त्रिकोण से चतुरस्र पर्यन्त भावना का प्रकार बताया गया है, अब यहाँ विमर्श की अंशभूत शान्ता प्रभृति चार शक्तियों की चतुरस्र से लेकर बैन्दवचक्र पर्यन्त भावना का प्रकार बताते हैं— नाद और बिन्दु निरंश हैं, अर्थात् शान्ताशक्तिमय हैं । कला इच्छा- शक्तिमय, ज्येष्ठा ज्ञानशक्तिमय तथा बची पाँच शक्तियां क्रियाशक्तिमय हैं ॥२३॥ १. शब्दात्—ख. ग. घ. ने. ज. झ. उ. । २. षेष्वित्यर्थः—ख. ग, घ. ने. ज. झ. उ. । ३. ष्टचक्र—ग. घ. वास्तचक्रनवकवा—ख. ज. ।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३३ निरंशा^१ शान्ता शक्तिः, शान्ताया निरंशत्वं चिद्रूपत्वात् । तेन निरंशौ नाद- बिन्दू द्वावपि शान्ताशक्तिमयौ । नादबिन्दुरूपं चतुरस्रषोडशदलात्मकं चक्रद्वयं शान्ताशक्तिमयमित्यर्थः । कला चेच्छास्वरूपकम् इच्छायाः स्वरूपं कलारूपम्, अष्टदलपद्ममिच्छाशक्तिमयमित्यर्थः । ज्येष्ठा ज्ञानं ज्ञानशक्तिरेव ज्येष्ठारूपम्, चतुर्दशारं ज्ञानशक्तिमयमित्यर्थः । क्रिया शेषं रौद्री-वामा-विषघ्नो-दूतरी-सर्वा^२- नन्दाख्यशक्तिपञ्चकरूपं द्विद्शाराष्टकोणत्रिकोणबैन्दवाख्यचक्रपञ्चकं क्रिया- शक्तिमयमित्यर्थः ॥२३॥ पूर्वं चक्रस्य “शून्याकारात्” (१।१०) इत्यारभ्य कामकलारूपतां प्रतिपाद्ये- दानीमुपसंहरति— इत्येवं त्रितयात्मकम् । चक्रं कामकलारूपं प्रसारपरमार्थतः ॥२४॥ ^३एवम् उक्तप्रकारेण त्रितयात्मकं वामादिमातृशक्तित्रयमयं चक्रं बिन्दु- त्रितयमयं कामकलाक्षररूपम् । प्रसारपरमार्थतः । यद् यस्मात् प्रसृतं तत् तस्य शान्ता शक्ति निरंश है । इसको निरंश इसलिये कहते हैं कि यह चित्स्वरूपाणी है । ऊपर गिनाई गई नौ शक्तियों में से प्रथम दो—नाद और बिन्दु—शान्ता शक्ति- स्वरूप हैं । इसका अभिप्राय यह हुआ कि नाद और बिन्दुममय चतुरस्र और षोडश दलात्मक दो चक्र शान्ता शक्तिमय हैं । कलास्वरूप अष्टदल पद्म इच्छाशक्तिमय और ज्येष्ठारूप चतुर्दशार ज्ञानशक्तिमय है । रौद्री, वामा, विषघ्नी, दूतरी, सर्वानन्दा नामक शक्तियों से क्रमशः संयुक्त द्विद्शार (बहिर्दशार और अन्तर्दशार), अष्टकोण, त्रिकोण और बैन्दव नामक पाँच चक्र क्रियाशक्तिमय हैं ॥२३॥ यहाँ दसवें श्लोक से कामकला के स्वरूप के प्रतिपादक प्रकरण का उपक्रम हुआ था, अब उसका उपसंहार किया जा रहा है— इस तरह से शक्तित्रयमय यह चक्र कामकलास्वरूप है, क्योंकि यह वास्तव में कामकला का ही विस्तार है ॥२४॥ ऊपर बताई गई पद्धति से प्रकाशात्मक प्रमाता की वामा प्रभृति तीन शक्तियों से संवलित यह श्रीचक्र तीन बिन्दुओं से बने कामकलाक्षर का ही विस्तार होने से तन्मय है । जो पदार्थ जिससे बनता है, उसमें उसी की वास्तविक सत्ता मानी जाती है और वह तत्स्वरूप ही होता है । जैसे कि मिट्टी घट का परमार्थ है, क्योंकि घड़ा मृण्मय ही है । १. निरंशः—ख. ने. ज. ड. । २. नन्देति—ख. घ. ने. झ. ड. । ३. ‘एवम्’...‘पर- मार्थतः’ नास्ति—ख. ग. घ. ने. ज. झ. ड. । ३
३४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः परमार्थस्तद्रूपं च तत् । यथा मृद् घटस्य १मृद्रूपश्च घटः, तन्तवः पटस्य तन्तुरूपश्च पटः। एवं कामकलाक्षरात् प्रसृतस्य २श्रीचक्रस्य कामकलाक्षरं परमार्थः, तद्रूपं ३बैन्दवं चक्रमित्यर्थः ॥२४॥ पुनरस्यैव चक्रस्य प्रकारान्तरेण वासनान्तरमाह "अकुले विषुसंज्ञे च" इत्यादिना "परानन्दविघूर्णितम्" इत्यन्तेन (श्लो० २५-३५)— अकुले विषुसंज्ञे च शाक्ते वह्नौ तथा पुनः । नाभावनाहते शुद्धे लम्बिकाग्रे भ्रुवोऽन्तरे ॥२५॥ इन्दौ तदर्धे रोधिन्यां नादे नादान्त एव च । शक्तौ पुनर्व्यापिकायां समनोन्मनिगोचरे ॥२६॥ महाबिन्दौ ४अकुले, कुलादन्यदकुलम्, सुषुम्नामूल५संस्थितारुणसहस्रदलकमलमकुलं६ नाम । तदुपर्यष्टदल७पद्मोर्ध्वस्थितं षड्दलं कुलपद्मम् । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— तन्तु पट का परमार्थ है, क्योंकि कपड़ा तन्तु (सूत) से ही बना है । इसी तरह से काम- कलाक्षर से प्रसृत (विस्तृत) श्रीचक्र का परमार्थ कामकला ही है । इसका अभिप्राय यह है कि जैसे बैन्दव चक्र कामकलामय है, उसी तरह से बिन्दु और त्रिकोण चक्र के विस्तार से बना यह पूरा श्रीचक्र (श्रीयन्त्र) भी कामकलामय ही है ॥२४॥ फिर इसी चक्र की भावना का दूसरा प्रकार आगे के (२५-३५) श्लोकों में बताया जाता है— विषु१ संज्ञक अकुल चक्र में, शाक्त, वह्नि, नाभि, अनाहत, (वि)शुद्ध, लम्बि- काग्र और भ्रूमध्य चक्र में; बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना में तथा महाबिन्दु में ॥२५-२६॥ अकुल चक्र कुल चक्र से भिन्न है । यह चक्र सुषुम्ना के मूल में स्थित है और इसमें लाल वर्ण का सहस्रदल कमल विराजमान है । इसके ऊपर अष्टदल पद्म और उसके ऊपर जो षड्दल कमल है, उसको कुलपद्म कहते हैं । इस विषय का विस्तार स्वच्छन्दसंग्रह में किया गया है— १. मृण्मयश्च-ख. । २. 'श्री' नास्ति-घ. ने. ज. झ. उ. । ३. चेदं-ख. ग. ज. झ. उ. । ४. 'अकुले' नास्ति-ख. ग. घ. झ. उ. । ५. स्थितसहस्र-ख. ग. ज. झ. । ६. 'अकुलं' नास्ति-ख. ग. ज. झ. उ. । ७. दलोर्ध्व-ख. ग. घ. झ. । १. अकुल और विषु संज्ञक चक्रों की भिन्नता के विषय में अभी आगे विचार किया जायेगा।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३५ अधश्चोर्ध्वं सुषुम्नायाः सहस्रदलसंयुक्तम् । रक्तं श्वेतं च साहस्रदलस्थं शक्तिभिर्वृतम् ॥ ऊर्ध्वाधोमुखमीशानि कर्णिकाकेसरान्वितम् । शक्तिरूपं महादेवि २कुलाकुलमयं शुभम् ॥ पङ्कजद्वयमीशानि स्थितं शाश्वतमव्ययम् । तयोर्मध्ये सुषुम्नान्तस्त्रिंशदाधारपङ्कजम् ॥ शक्तिरूपं शिवाकारं शर्वाण्याः सन्निजालयम् । तेषां रूपं क्रियां चैव ४क्रमाद् वक्ष्येऽधुना शृणु ॥ गुदमेढ्रान्तरं देवि पञ्चाङ्गुलसमुच्छ्रितम्५ । ६कन्दमेकाङ्गुलं मध्ये द्वयाङ्गुलविसारणम् ॥ तस्य ७मध्ये महायोनिस्त्रिकोणाकाररूपिणी । सुषुम्ना योनिमध्यस्था तस्या मूले महेश्वरि ॥ अधःपद्मं सहस्रारं कर्णिकाकेसरान्वितम् । तैजसं ८रत्नसंदोप्तं तद्दलस्थितशक्तिभिः ॥ सुषुम्ना के नीचे और ऊपर सहस्रदल से संयुक्त रक्त और श्वेत वर्ण के दो पद्म हैं। हे ईशानि ! रक्तदल पद्म का मुँह ऊपर की तरफ तथा श्वेतदल पद्म का मुख नीचे की ओर है। ये दोनों पद्म शक्तिसमूह से आवृत हैं, कर्णिका और केसर से संयुक्त हैं। हे महादेवि ! शक्तिस्वरूप कुलाकुलमय ये शुभ पंकज शाश्वत और अव्यय हैं। इनकी यही स्थिति सदा बनी रहती है, अपनी इस स्थिति से ये कभी च्युत नहीं होते। इन दोनों पद्मों के बीच में सुषुम्ना के भीतर ३० आधार पंकज माने गये हैं। ये शिवशक्तिस्वरूप हैं और इनमें भगवती शर्वाणी (पार्वती) निवास करती हैं। इन आधार पंकजों के स्वरूप और कार्य को अब मैं बताता हूँ, तुम सुनो। हे देवि ! गुदा और मेढ्र (लिंग) के बीच में पाँच अंगुल की ऊँची जगह है। इसके बीच में एक अंगुल के ऊँचे और दो अंगुल विस्तार वाले स्थान को कन्द कहते हैं। इस कन्द स्थान के मध्य में त्रिकोण सदृश आकार वाली महायोनि विराजमान है। इस योनि के मध्य में सुषुम्ना नाडी अवस्थित है। हे महेश्वरि इसी सुषुम्ना नाडी के मूल में कर्णिका और केसर से संयुक्त नीचे वाला रक्तदल सहस्रार पद्म विराजमान है। यह तेजोमय पंकज रत्नों की प्रभा के समान उज्ज्वल है। हे प्रिये ! १. इतः परम्—'पर्वाङ्गुलसमुच्छ्रयम् । गुदमेकाङ्गुलं मध्ये' इत्यधिकं—ने. ज. उ. । २. द्वयाङ्गुलकुलाकुलम्—ज. । ३. सर्वेभ्यो मत्प्रियालयम्—क., सर्वाभ्यासनिजालयम्—ख. ने. झ. । ४. क्रमं—ख. ग. ने. ज. झ. । ५. द्वयम्—ने. ज. उ. । ६. गुद—ख. ग. घ. ने. ज. झ. उ. । ७. मले—ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ८. रक्तवह्नीप्तं—घ. ने. ज. झ. उ. ।
प्रतिकिञ्जल्कसंस्थाभिः शक्तिभिः संवृतं प्रिये । कर्णिकामध्यतो देवि कुलदेवी च संस्थिता ॥ तत्पद्मोर्ध्वं सुषुम्नाया मध्ये त्वेकाङ्गुलोपरि ॥ पद्ममष्टदलेर्युक्तमष्टग्रन्थिसमन्वितम् ॥ रक्तं सुकर्णिकोपेतं रक्तकिञ्जल्कशोभितम् । ग्रन्थ्यग्रस्थत्रिशृङ्गं¹ च ब्रह्माण्याद्यष्टभैरवैः ॥ अष्टपत्रस्थितग्रन्थिस्थित²वामादिशक्तिभिः । तदन्यशक्तिभिश्चैव शृङ्गस्थाभिः समावृतम् ॥ तन्मध्ये कौलशक्त्या तु सेवितं च स्मरेत् ततः । एकाङ्गुलप्रमाणोर्ध्वं षड्दलं कुलपङ्कजम् ॥ इति । ननु कुलादन्यदकुलमिति चेदर्थस्तर्हि तदन्तरालस्थिताऽष्टदलपद्मस्याप्यकुलत्वं किं न स्यादित्यत आह—विषुसंज्ञे चेति । "विषॢ व्याप्तौ" (१०९५ जु०) । यत् पंकज के प्रत्येक दल और केसर में विभिन्न शक्तियों का निवास है और हे देवि ! कर्णिका के मध्य में कुलदेवी विराजमान हैं ॥ इस पद्म के एक अंगुल ऊपर सुषुम्ना नाडी के मध्य में आठ दल और आठ ग्रन्थियों से युक्त लाल वर्ण का पद्म है । इसकी कर्णिका सुन्दर है और यह लाल वर्ण की केसर से सुशोभित है । प्रत्येक ग्रन्थि के अग्र भाग में त्रिकोण है और उनमें ¹आठ भैरवों के साथ आठ ब्रह्माणी प्रभृति देवियाँ विराजमान हैं । आठ दलों की ग्रन्थियों में वामा प्रभृति आठ शक्तियाँ विराजमान हैं और शृंग (केसर) में भी अनेक शक्तियों का निवास है । इन सबके बीच का स्थान कौल शक्ति से सेवित है, अर्थात् इस कमल की कर्णिका में कौल शक्ति निवास करती है । इस अष्टदल कमल से एक अंगुल ऊपर छः दल वाला कुल पंकज अवस्थित है ॥ यहाँ प्रश्न होता है कि ऊपर कुलचक्र से भिन्न चक्र को अकुल कहा गया है, इसके अनुसार दोनों के बीच में विद्यमान अष्टदल पद्म की भी अकुल संज्ञा हो जायगी । इसका समाधान यह है कि इसी आशंका की निवृत्ति के लिये 'अकुले' पद का 'विषुसंज्ञे'² १. शृङ्गाग्रे-घ., शूलं च-उ. । २. वर्गादि-ख, ग, घ, ज, झ, ।
- असिताङ्ग, रुरु, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण और संहार नामक आठ भैरव तथा ब्रह्माणी, माहेशी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा और महालक्ष्मी नामक आठ देवियाँ मानी जाती हैं। वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, कलविकरणी, बलविकरणी, बलप्रमथिनी, सर्वभूतदमनी और मनोन्मनी—ये आठ वामा प्रभृति शक्तियाँ हैं।
- अमृतानन्द ने यहाँ आठ ही स्थान माने हैं, जब कि भास्करराय को नौ स्थान अभिप्रेत हैं। इसीलिये वे अकुल से विषु चक्र की स्थिति भिन्न मानते हैं। उनका अनुमान है कि स्वच्छन्दसंग्रह में निर्दिष्ट अष्टदल और षड्दल कमलों में से कोई एक प्राचीन तन्त्रों
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३७ सुषुम्नां तदन्तर्गतत्रिंशत्पङ्कजानि च व्याप्नोति, तत्सहस्रदलकमलं विषुवम्¹, ²तस्य सर्वाधारत्वात्। ततो नाष्टदलकमलमकुलमित्यर्थः। शाक्ते वह्नाविति। अत्र वह्नौ शाक्त इति व्यत्ययेन पठितव्यम्। वह्निर्मूला- धारः, वह्निबिम्बाधारत्वात्। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— आधारपङ्कजं पीतं चतुष्पत्रं सुकेसरम्। अधोमुखं च तन्मध्ये कुण्डली परमेश्वरी³ ॥ स्वयम्भुमध्यगा चिन्त्या वरदादिभिरावृता⁴। पार्थिवं पङ्कजं ह्येतत् तस्योर्ध्वं⁵ पङ्कजं परम्॥ यह विशेषण दिया गया है। 'विष्लृ' धातु का अर्थ व्याप्ति होता है। जो चक्र सुषुम्ना नाडी और उसके मध्य में विद्यमान ३० पंकजों में व्याप्त है, वह सहस्रदल कमल विषुव कहलाता है, क्योंकि वही इन सबका आधार है। अष्टदल कमल इन सबमें व्याप्त नहीं है, अतः इसको अकुल (विषुव) नहीं कहा जायगा। 'शाक्ते वह्नौ' इसको 'वह्नौ शाक्ते' इस क्रम से पढ़ना चाहिये। वह्नि शब्द से मूला- धार चक्र गृहीत होता है, क्योंकि यही वह्निबिम्ब का आधार है, जैसा कि स्वच्छन्दसंग्रह में वर्णित है— आधार पंकज पीत वर्ण का चार दल वाला और सुन्दर केसर से संयुक्त है। यह चक्र अधोमुख है। इस चक्र के मध्य में स्वयम्भू लिंग विराजमान है। उस स्वयम्भू लिंग के बीच में ²वरदा प्रभृति शक्तियों से घिरी हुई भगवती कुण्डलिनी का ध्यान १. विषुवत्-ने.। २. 'तस्य' नास्ति-ग. ने. ज. झ. उ.। ३. इतः परम्-'तदुक्तं गोरक्षसंहितायाम्-योनिमध्ये महालिङ्गं पश्चिमाभिमुखं त्वधः। मस्तके मणिवद् भिन्नं यो जानाति स योगवित्॥' इत्याधिकः पाठः-ग. उ.। ४. इतः परम्-'पृथिवीमण्डलं पीतं चतुरस्रं सुशोभनम्। तप्तचामीकराभासं तडिल्लेखेव विस्फुरत्॥ चतुरस्रं पुरं वह्नेरधो मैत्रादवस्थितम्। इति गोरक्षे' इत्याधिकः पाठः-ग. उ.। ५. तस्याधः-घ. ने. ज. झ. उ.। में विषु नाम से जाना जाता था। उनका यह अनुमान सही लगता है। दीपिकाकार ने अष्टदल पद्म का विशेष वर्णन किया है, षड्दल का केवल संक्षेप में उल्लेख कर दिया है। अतः अष्टदल पद्म की ही विषु संज्ञा होनी चाहिये। इस विषय पर उपोद्घात में विशेष चर्चा की जायगी। सकलनिष्कल भावना जैसे बिन्दु से उन्मना पर्यन्त नौ कलाओं में की जाती है, उसी तरह से सकल भावना के भी नौ ही स्थान होने चाहिये। आगे (३।१४२- १४४) स्वयं दीपिकाकार ने स्वच्छन्दसंग्रह के एक वचन को उद्धृत किया है, जिसमें नवाधार तथा षट्चक्रों का स्पष्ट उल्लेख है। छः चक्रों का उल्लेख मूलग्रन्थ (३।३०) में भी मिलता है। १. व श ष स इन चार अक्षरों की अधिष्ठात्री वरदा, श्री, षण्ढा और सरस्वती नाम्नी चार शक्तियों का ध्यान यहाँ विहित किया गया है।
३८ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः तैजसं परमेशानि तन्मध्य^१स्थितशक्तयः । निष्कलाः परमेशानि विद्युत्पुञ्जनिभाः स्मरेत् ॥ तदूर्ध्वे कर्णिकामध्ये वह्निबिम्बं तदूर्ध्वगम् । पूर्णपीठं च ^२तन्मध्ये शाकिनी संस्थिता शिवे ॥ इति । शाक्ते, शक्तिः हृल्लेखा, तदूर्ध्वस्थितत्वाच्छाक्तं^३ स्वाधिष्ठानं ^४षडस्र- कमलम् । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— आधारपङ्कजस्योर्ध्वे सार्धद्वयङ्गुलकोपरि । तैजसं साष्टपत्रं च पीतकर्णिकया युतम् ॥ हृल्लेखाकर्णिकामध्ये स्थितानङ्गादिसेविते^५ । एतस्माद् द्व्यङ्गुलादूर्ध्वं स्वाधिष्ठानं षडस्रकम् ॥ आप्यं च ^६बन्दिनीशक्तिपूर्वाभिः शक्तिभिर्वृतम्^७ । काकिनीमभिसंचिन्त्य ... .... ॥ इति । किया जाता है। यह पंकज पृथ्वी तत्त्व का प्रतिनिधि है। इसके ऊपर दूसरा तैजस पंकज विद्यमान है। हे परमेश्वरि ! इस चक्र में विद्युत्पुंज के समान देदीप्यमान निष्कल शक्तियों का ध्यान करना चाहिये । इस चक्र पर कर्णिका के मध्य में वह्निबिम्ब विद्यमान है और इसके ऊपर पूर्णगिरि पीठ है । हे शिवे ! यहाँ शाकिनी देवी निवास करती हैं। शक्ति हृल्लेखा को कहते हैं। ऊपर वर्णित वह्निचक्र के ऊपर विद्यमान शाक्त षड्- दल कमल स्वाधिष्ठान के नाम से प्रसिद्ध है। स्वच्छन्दसंग्रह में यह इस तरह से वर्णित है— आधार पंकज से ढाई अंगुल के ऊपर तैजस कमल विद्यमान है। यह आठ दल वाला और पीतवर्ण की कर्णिका से युक्त है। इसकी कर्णिका में हृल्लेखा विद्यमान है और उसमें ^१अनङ्गा प्रभृति शक्तियाँ निवास करती हैं। इस अष्टदल चक्र से दो अंगुल ऊपर षड्दल स्वाधिष्ठान चक्र स्थित है। यह जल तत्त्व का प्रतिनिधि है। इसमें ^२बन्दिनी प्रभृति शक्तियों से घिरी हुई काकिनी देवी का ध्यान किया जाता है। १. मध्ये सित-ग. घ. ने. ज. झ. उ. । २. तस्योर्ध्वे-ख. ग. घ. ने. झ. उ. । ३. शाक्तस्याधिष्ठानं-ग. ने. । ४. 'षडस्रकमलम्' नास्ति-ख. ग. घ. ने. ज. उ. । ५. देवता-ख. । ६. वशिनी-ग. घ. ने. उ. । ७. वृतम्-ग. घ. ज. उ. । १. नित्याषोडशिकार्णव (१।१७७-१७८) में वर्णित अनङ्गकुसुमा आदि आठ देवियों को यहाँ स्मरण किया गया लगता है। २. ब भ म य र ल इन छः अक्षरों की अधिष्ठात्री बन्दिनो, भद्रकाली, महामाया, यशस्विनी, रक्ता और लम्बौष्ठिका नामक देवियों का ध्यान यहाँ किया जाता है।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३९ नाभौ १दशदलकमले मणिपूरके। तदुक्तं तत्रैव— नाभि२स्त्र्यर्धाङ्गुलोपरि। तत्पद्मं मणिपूरं च दशपत्रं सुशोभनम्३ ॥ लाकिनीमध्यगं तच्च डामर्यादिभिरावृतम्। इति। अनाहते हृदयस्थाने द्वादशदलकमले। तदुक्तं तत्रैव— चतुर्दशाङ्गुलादूर्ध्वं४ मणिपूराख्यपङ्कजात्। पङ्कजं राकिनीमध्यं द्वादशारमनाहतम्॥ तत्रस्थकालरात्र्यादिशक्तिभिश्च समावृतम्। तत्रस्थसूर्यबिम्बं५ तु ६नादोड्ड्यानाख्यपीठकम्॥ इति। शुद्धे कण्ठस्थितषोडशदलकमले। तदुक्तं तत्रैव— तस्मादेकाङ्गुलादूर्ध्वं विशुद्धं षोडशारकम्। मध्यगा डाकिनी बाह्यपत्रेषु परमेश्वरि७ ॥ अमृताद्यक्षरान्त८स्थाश्चन्द्रबिम्बं तदूर्ध्वतः। इति। नाभि शब्द से दस दल वाले मणिपूर चक्र का ग्रहण होता है। इस चक्र का भी स्वच्छन्दसंग्रह में ही इस तरह से वर्णन है— स्वाधिष्ठान चक्र से साढ़े तीन अंगुल ऊपर नाभिपद्म है। दस दल वाला यह सुन्दर पद्म मणिपूर कहलाता है। इसमें १डामरी प्रभृति शक्तियों से घिरी हुई लाकिनी देवी का ध्यान किया जाता है॥ बारह दल वाला हृदय स्थित कमल अनाहत कहलाता है। स्वच्छन्दसंग्रह में इसका भी वर्णन किया गया है— मणिपूर पंकज से १४ अंगुल ऊपर विद्यमान द्वादश दल कमल अनाहत कहलाता है। इसमें २कालरात्रि आदि शक्तियों से घिरी हुई राकिनी देवी का ध्यान किया जाता है। इसी चक्र में सूर्यबिम्ब के प्रतिनिधि नादमय उ(ओ)ड्ड्यान पीठ की स्थिति मानी जाती है॥ कण्ठस्थित षोडश दल कमल शुद्ध अर्थात् विशुद्धि चक्र के नाम से प्रसिद्ध है। इसका भी वर्णन वहाँ इस तरह से किया गया है— इससे एक अंगुल ऊपर षोडश दल वाला विशुद्ध चक्र है। इस चक्र के मध्य में १. दशार-क. घ. ज. झ.। २. नाभेरष्टा-ग. घ. ज. झ. उ.। ३. भितम्-ग. घ. ने. ज. झ. उ.। ४. दूर्ध्वं-ग. ज. उ.। ५. बिम्बे-ख. झ. उ.। ६. ओडीयाना-ग.। ७. श्वरी-क. ग. ने.। ८. रान्ताश्च-क. ने । १. ड से फ पर्यन्त दस अक्षरों की अधिष्ठात्री डामरी आदि फट्कारी पर्यन्त देवियों का ध्यान यहाँ निहित है। २. क से ठ पर्यन्त बारह अक्षरों की अधिष्ठात्री कालरात्रि आदि ठंकारी पर्यन्त शक्तियों का ध्यान यहाँ करना चाहिये।
४० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः लम्बिकाग्रे अष्टदलकमले। तदुक्तं तत्रैव— कण्ठोर्ध्वं परमेशानि लम्बिका चतुरङ्गुले। तस्यामष्टदलं पद्मं १वशिन्यादिभिरावृतम्॥ इति। भ्रुवोऽन्तरे आज्ञायां द्विदलकमले। तदुक्तं तत्रैव— आज्ञाधारं द्विपत्राब्जं हक्षद्विदलसंयुतम्। हंसवतीक्षमापार्श्वं२ तयोर्मध्ये तु हाकिनी॥ इति। भ्रुव इत्येकवचनं भ्रूद्वयोपलक्षणम्। भ्रुवोरन्तर इत्यर्थः। इन्दौ बिन्दौ। बिन्दुत्तदर्धरोधिनीनादनादान्तशक्तिव्यापिकासमनोन्मनीनामुपर्य्युपरि रूपाण्युच्चा- रणकालं च वक्ष्यति। ३महाबिन्दौ परसादाख्ये४ देशकालरूपवर्जिते५। डाकिनी देवी और बाह्य दलों में हे परमेश्वरि! सोलह स्वरों की अधिष्ठात्री १अमृता आदि शक्तियाँ विराजमान हैं। इन सबके ऊपर चन्द्रबिम्ब है॥ लम्बिकाग्र शब्द से अष्टदल कमल का ग्रहण होता है। इसका भी वर्णन वहाँ इस तरह से मिलता है— हे परमेशानि! कण्ठ से चार अंगुल ऊपर लम्बिका स्थित है। इसमें २वशिनी आदि- देवियों से आवृत अष्टदल पद्म है॥ 'भ्रुवोऽन्तरे' शब्द का अर्थ दो दल वाला आज्ञा चक्र है। इसका भी वर्णन वहीं किया गया है— आज्ञाधार अर्थात् आज्ञा चक्र दो दल वाला है। ये दोनों दल ह और क्ष अक्षरों से सुशोभित हैं। इस चक्र में हाकिनी देवी का निवास है तथा हंसवती और क्षमा३ नामक शक्तियाँ इसके दोनों तरफ विद्यमान हैं॥ 'भ्रुवोऽन्तरे' यहाँ एकवचन होते हुए भी वह द्विवचन का बोध कराता है। वास्तव में 'भ्रुवोरन्तरे' ऐसा पाठ होना चाहिए। यहाँ छन्द की दृष्टि से 'भ्रुवोऽन्तरे' यह पाठ कर दिया गया है। इन्दु शब्द से बिन्दु का ग्रहण होता है। बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना की एक से दूसरे के ऊपर स्थिति, स्वरूप और उनके उच्चारण का काल अभी आगे (१।२८-३४) बताया १. वशिका-ने. ज. उ.। २. पार्श्वद्वयं-ख. ने. ज. झ. उ.। ३. 'महाबिन्दौ' नास्ति- घ. ने. ज. उ.। ४. सादाख्यो-ख. ज.। ५. विवर्जितः-ख. ने. ज. उ.। १. सोलह स्वरों की अधिष्ठात्री अमृता आदि सोलह शक्तियों के नाम स्वच्छन्द- संग्रह के प्रमाण से योगिनीहृदयदीपिका (३।३४) में देखे जा सकते हैं। अनङ्गा आदि आठ देवियों को छोड़कर वरदा आदि देवियों के नाम भी यहाँ स्वच्छन्दसंग्रह के उक्त वचन के प्रमाण पर ही दिये गये हैं। २. नित्याषाडशिकार्णव (१।७७-७९) में वर्णित वशिनी आदि आठ देवियों का यहाँ स्मरण किया गया लगता है। ये नाम यहाँ दीपिका (३।६३) में भी देखे जा सकते हैं। दीपिका (३।२९) के उक्त उद्धरण में इन देवियों के भी नाम हैं।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ४१ बिन्द्वाद्युन्मन्यन्ता भागाः सूक्ष्माः सूक्ष्मतराः स्वदेहचक्रविद्यानां साधारणाः । १कोऽर्थः ? अत्र त्रैलोक्यमोहना२दिबिन्द्वन्तान् स्थूलसूक्ष्मसूक्ष्मतरान् चक्रभागान्- कुलाद्युन्मन्यन्तेषु स्थूलसूक्ष्मसूक्ष्मतरेषु भागेषु महाबिन्दौ च विभावये- दित्यर्थः ॥२५-२६॥ पुनरपि त्रैविध्यमाह— पुनश्चैवं त्रिधा चक्रं तु भावयेत् । एवमुक्तप्रकारेण विभावितं चक्रं पुनस्त्रिधा ३भावयेत् । त्रैविध्यमाह— आज्ञान्तं सकलं प्रोक्तं ततः सकलनिष्कलम् ॥२७॥ उन्मन्यन्तं परे स्थाने निष्कलं च त्रिधा स्थितम् । आज्ञान्तम् अकुलाद्याज्ञापर्यन्तं चतुरस्रादित्रिकोणान्तं चक्राष्टकं स्थूलं भाव- येत् । तद्भावनं सकलम् । ततो बिन्दुमारभ्य उन्मन्यन्तं ४चक्रसूक्ष्मसूक्ष्मतरभागान् जायगा । महाबिन्दु से देश, काल और रूप से रहित परसादाख्य तत्त्व का ग्रहण होता है । बिन्दु से लेकर उन्मना पर्यन्त भाग सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होते जाते हैं और इनकी स्थिति साधक के शरीर में, श्रीचक्र में और श्रीविद्या में भी एक जैसी है। इसका अभिप्राय यह है कि त्रैलोक्यमोहन चक्र से लेकर बिन्दु पर्यन्त चक्रों के स्थूल, सूक्ष्म और सूक्ष्मतर भागों की अकुल से लेकर उन्मनी पर्यन्त सूक्ष्म और सूक्ष्मतर भागों में तथा महाबिन्दु में भावना करनी चाहिये ॥२५-२६॥ इस चक्र की पुनः त्रिविध भावना का उपदेश करते हैं— इस चक्र की पुनः त्रिविध भावना करनी चाहिये । उक्त (१।२५-२६) प्रकार से विभावित चक्र को पुनः तीन तरह से भावना करनी चाहिये । इस त्रिविधता का ही वर्णन आगे किया जाता है— आज्ञा पर्यन्त चक्र की सकल रूप में, उन्मनी पर्यन्त चक्र की सकल-निष्कल रूप में और परस्थान (महाबिन्दु) की निष्कल रूप में, इस तरह से इस श्रीचक्र की पुनः त्रिविध भावना करनी चाहिये ॥२७॥ अकुल से आज्ञा पर्यन्त १आठ स्थानों में चतुरस्र से त्रिकोण पर्यन्त आठ चक्रों की स्थूल रूप में भावना करनी चाहिये । इसको सकल उपासना कहते हैं । तब बिन्दु से १. 'कोऽर्थः' नास्ति-ख. ग. घ. ज. झ. उ. । २. नाद्युन्मन्यन्तान्—ख. ग. ने. ज. डा. उ. । ३. विभाव-क. झ. उ. । ४. सूक्ष्मसूक्ष्मतरचक्रभागान्-क. ग. । १. पृ० ३६ की टिप्पणी २ देखिये । तदनुसार अकुल से आज्ञा पर्यन्त नौ चक्रों में चतुरस्र से बिन्दु पर्यन्त नौ चक्रों की भावना करनी चाहिये ।
४२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः भावयेत् । तद्भावनं सकलनिष्कलम् । १परे स्थाने महाबिन्दौ शुद्धशून्यसंविदं भाव- येत् । तद्भावनं निष्कलम् । २एवं त्रिधा स्थितम् । अकुलाद्याज्ञान्तास्तन्त्रान्तरेषु विस्तरेणोक्ताः, अतो नात्रोक्ताः ॥२७॥ बैन्दवाद्युन्मन्यन्तानां स्वरूप३मुच्चारणकालं स्थानं चाह "दीपाकारः" इत्या- दिना "मनोन्मनी" इत्यन्तेन (श्लो० २८-३४)— दीपाकारोऽर्धमात्रश्च ललाटे वृत्त इष्यते ॥२८॥ दीपाकारः, दीपस्य यादृशं भासनं तादृशमस्येत्यर्थः । अर्धमात्रः । ह्रस्वस्यो- च्चारणकालो मात्रेत्युच्यते । मात्राया अर्धमुच्चारणकालो यस्य सोऽर्धमात्रः । ललाटे वृत्त इष्यते । वर्त्तुलसंनिवेशो ललाटे भ्रुवोरुपरिभागे । दीपाकारोऽर्धमात्रो- लेकर उन्मना पर्यन्त स्थानों में चक्र के सूक्ष्म से सूक्ष्मतर भागों की भावना करनी चाहिये । यह भावना सकल-निष्कल कहलाती है । परम स्थान महाबिन्दु में शुद्ध शून्य संवित्ति की भावना करनी चाहिये । इस भावना को निष्कल कहते हैं । इस तरह से इन तीन भावनाओं के आधार पर चक्र की त्रिविध स्थिति मानी जाती है । अकुल से आज्ञा पर्यन्त चक्रों का अन्य तन्त्रों में १विस्तार से वर्णन मिलता है, अतः यहाँ (योगिनीहृदय में) उनका वर्णन नहीं किया गया है ॥२७॥ अब बिन्दु से उन्मना पर्यन्त नाद कलाओं का स्वरूप, उच्चारण काल तथा स्थान का वर्णन २८ से ३४ पर्यन्त श्लोकों में किया जा रहा है— बिन्दु का स्वरूप दीपक सदृश भासमान वृत्ताकार है । उच्चारण का काल अर्धमात्रा और स्थान इसका ललाट है ॥२८॥ दीपाकार का अर्थ है दीपक के सदृश भासमान । ह्रस्व स्वर के उच्चारण में जो समय लगता है, उसको मात्रा कहते हैं । इस बिन्दु के उच्चारण का काल उसका आधा है । दोनों भौंहों के ऊपर ललाट के बीच में गोल आकार वाला यह बिन्दु स्थित है । इसका आशय यह हुआ कि यह बिन्दु दीपक के सदृश उज्ज्वल तथा गोल आकार वाला है, १. तत्रानुत्पन्ना निष्पन्दा वाक् शून्यसंविदुत्पत्त्यवस्था सूक्ष्मा मूलाधारात् प्रथममुदिते परापरे स्थाने—ग. ज. झ. उ. । २. 'एवं' नास्ति—ख. ग. । ३. मुच्चारकालं चाह—ख. ग. घ. उ. ।
- योगिनीहृदयदीपिका में उद्धृत स्वच्छन्दसंग्रह के वचनों में यह विषय विस्तार से वर्णित है । दीपिकाकार ने योगिनीहृदय वर्णित नौ चक्रों से संबद्ध वचन ही प्रायः उद्धृत किये हैं । दीपिका में उद्धृत उक्त ग्रन्थ के उद्धरणों के अनुसार उसमें कुल और अकुल नामक दो सहस्रदल कमलों के बीच में ३० आधार पद्मों का वर्णन किया गया है । यह वर्णन अन्यत्र देखने को नहीं मिलता । यह महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ आज अनुपलब्ध है । इसकी खोज होनी चाहिये ।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ४३ च्चारणकालो वृत्तसंनिवेशो बिन्दुरित्यर्थः । बिन्द्रादीनां तु विस्तारः स्वच्छन्दसंग्रहे प्रपञ्चितः । तत्र बिन्दोर्यथा— बिन्द्रावरणमूर्ध्वतः । सूर्यकोटिप्रतीकाशमतिदीप्तं महद्गुणम् ॥ तन्मध्ये दशकोटीनां संख्यायोजनपङ्कजम् । तत्कर्णिकायामासीनः शान्त्यतीतेश्वरः प्रभुः ॥ पञ्चवक्त्रो दशभुजो विद्युत्पुञ्जनिभाकृतिः । निवृत्तिश्च प्रतिष्ठा च विद्या शान्तिरनुक्रमात् ॥ परिवार्य स्थिताश्चैताः शान्त्यतीतस्य सुन्दरि । वामभागे समासीना शान्त्यतीता मनोन्मनी ॥ पञ्चवक्त्रधराः सर्वा दशबाह्विन्दुभूषणाः । बिन्दुतत्त्वं समाख्यातं कोट्यर्बुदशतैर्वृतम् ॥इति ॥२८॥ अर्धचन्द्रस्तथाकारः पादमात्रस्तदूर्ध्वके । ज्योत्स्नाकारा तदष्टांशा रोधिनी त्र्यस्रविग्रहा ॥२९॥ इसके उच्चारण में मात्रा के उच्चारण का आधा समय लगता है और इसकी स्थिति ललाट में है । स्वच्छन्दसंग्रह में बिन्दु प्रभृति का विस्तार से वर्णन किया गया है । वहाँ बिन्दु का वर्णन इस तरह से किया गया है— इसके ऊपर बिन्दु का आवरण है । यह करोड़ों सूर्यों के समान अत्यन्त उज्ज्वल बहुत बड़ा स्थान है । इसके बीच में दस करोड़ योजन विस्तार वाला पंकज है । इस पद्म की कर्णिका में भगवान् शान्त्यतीतेश्वर विराजमान हैं । इनके पाँच मुँह और दस भुजाएँ हैं । इनका स्वरूप विद्युत्पुंज के समान है । निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या और शान्ति नाम की चार शक्तियाँ इनको घेर कर बैठी हुई हैं और इनके वामभाग में मन की अगोचर शान्त्यतीता शक्ति विराजमान है । ये सभी शक्तियाँ पाँच मुँह और दस भुजाओं वाली हैं और इनके ललाट पर चन्द्रकला शोभित है । इस तरह से करोड़ों-अरबों योजन विस्तार वाला यह बिन्दु नाम का आवरण स्थित है । इसी को बिन्दु तत्त्व कहा जाता है ॥२८॥ अर्धचन्द्र भी दीपक के समान उज्ज्वल आकृति वाला है । मात्रा का चौथा भाग इसके उच्चारण का काल है । बिन्दु के ऊपर इसका स्थान है । रोधिनी का आकार त्रिकोणमय है और चांदनी के समान चमकता है । इसका उच्चारण काल मात्रा का आठवां भाग है ॥ २९ ॥