भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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३२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः त्रैलोक्यमोहनाद्ये तु नवचक्रे सुरेश्वरि । नादो बिन्दुः कला ज्येष्ठा रौद्री वामा तथा पुनः ॥२२॥ विषघ्नी दूतरी चैव सर्वानन्दा क्रमात् स्थिताः । अत्र तुशब्दः पूर्वोक्तकामकलारूपत्वप्रतिपादनप्रसङ्गपरिसमाप्तौ । त्रैलोक्य- मोहनाद्ये तु इत्यत्र आद्यशब्देन¹ सर्वाशापरिपूरकादिचक्राण्युच्यन्ते । तेषां नामा- न्युत्तरत्र वक्ष्यति । त्रैलोक्यमोहनाद्ये नवचक्रे, जातावेकवचनम्, त्रैलोक्यमोह- नाद्येषु² नवचक्रेष्वित्यर्थः । नादादिसर्वानन्दान्ता नव शक्तयस्त्रैलोक्यमोहनादि- बैन्दवान्तनवचक्रेषु क्रमेणाधिवसन्तीत्यर्थः । पदार्थः स्पष्ट एव ॥२२-२३॥ पूर्वम् “अम्बिकारूपमेवेदम्” (१।१४) इत्यादिना प्रकाशांशानामम्बिकादीनां चतुर्णां त्रिकोणादिचतुरस्रान्तवासनामयतामुक्तेवेदानीं विमर्शांशानां शान्तादीनां चतुर्णां चतुरस्रादिबैन्दवान्त³क्रममयतावासनामाह— निरंशौ नादबिन्दू च कला चेच्छास्वरूपकम् ॥२३॥ ज्येष्ठा ज्ञानं क्रिया शेषम् हे सुरेश्वरि ! त्रैलोक्यमोहन (चतुरस्र) प्रभृति नौ चक्रों में क्रमशः नाद, बिन्दु, कला, ज्येष्ठा, रौद्री, वामा, विषघ्नी, दूतरी और सर्वानन्दा ये नौ शक्तियां निवास करती हैं ॥ २-२३ ॥ श्लोक में आये ‘तु’ शब्द का अभिप्राय यह है कि अब तक चला आ रहा कामकला का प्रसंग यहाँ समाप्त हो जाता है । आद्य शब्द से त्रैलोक्यमोहन चक्र के साथ सर्वाशा- परिपूरक आदि चक्रों संग्रह होता है। इनके नाम आगे ( १।८२-८४ ) बताये जायेंगे । त्रैलोक्यमोहनाद्ये नवचक्रे—यहाँ एकवचन समस्त चक्रजाति का वाचक है, उसका अर्थ होगा त्रैलोक्यमोहन आदि नौ चक्रों में । नाद से लेकर सर्वानन्दा पर्यन्त नौ शक्तियाँ त्रैलोक्यमोहन से लेकर बैन्दव पर्यन्त नौ चक्रों में क्रमशः निवास करती हैं । बाकी शब्दों का अर्थ स्पष्ट है ॥ २२-२३ ॥ पहले ( १।१४ ) प्रकाश की अंशभूत अम्बिका प्रभृति चार शक्तियों की त्रिकोण से चतुरस्र पर्यन्त भावना का प्रकार बताया गया है, अब यहाँ विमर्श की अंशभूत शान्ता प्रभृति चार शक्तियों की चतुरस्र से लेकर बैन्दवचक्र पर्यन्त भावना का प्रकार बताते हैं— नाद और बिन्दु निरंश हैं, अर्थात् शान्ताशक्तिमय हैं । कला इच्छा- शक्तिमय, ज्येष्ठा ज्ञानशक्तिमय तथा बची पाँच शक्तियां क्रियाशक्तिमय हैं ॥२३॥ १. शब्दात्—ख. ग. घ. ने. ज. झ. उ. । २. षेष्वित्यर्थः—ख. ग, घ. ने. ज. झ. उ. । ३. ष्टचक्र—ग. घ. वास्तचक्रनवकवा—ख. ज. ।