योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३१ पुनरस्यैव चक्रस्य वासनान्तरमाह— चिदंशान्तस्त्रिकोणं च शान्त्यतीताष्टकोणकम् ॥१९॥ शान्त्यंशाद्विदशारं च तथैव भुवनारकम् । विद्याकलाप्रभोरूपदलाष्टकसमावृतम् ॥२०॥ प्रतिष्ठावपुषा स्पष्टस्फुरद्द्व्यष्टदलाम्बुजम् । निवृत्त्याकारविलसच्चतुष्कोणविराजितम् ॥२१॥ चिदंशः चित्कला, तन्मयमन्तस्त्रिकोणम् । शान्त्यतीता२-शान्ति-विद्या-प्रतिष्ठा- निवृत्तयो गगनादिपञ्चभूतकलाः । तन्मयमेतच्चक्रमित्यर्थः । अवयवार्थस्तु स्पष्ट एव ॥१९-२१॥ अस्यैव चक्रस्य संहारक्रमेण वासनान्तरमाह "त्रैलोक्यमोहनाद्ये तु" इत्यादि ‘क्रिया शेषम्’ इत्यन्तेन (श्लो० २२-२४)— पुनः इसी चक्र की भावना का दूसरा प्रकार बताते हैं— इस श्रीचक्र का बिन्दु और त्रिकोण चित्कलामय, अष्टकोण शान्त्यतीत- कलामय, प्रथम और द्वितीय दशार एवं चतुर्दशार शान्तिकलामय, अष्टदल विद्या- कला-प्रभामय, षोडशदल प्रतिष्ठाकलामय और चतुरस्र चक्र निवृत्तिकला का विलास है ॥१९-२१॥ चिदंश का अर्थ है चित्कला । अन्तस्त्रिकोण अर्थात् मध्यत्रिकोण चक्र और उसके मध्य में विराजमान बिन्दुचक्र दोनों चित्कला के विस्फार ( विस्तार ) से स्फुरित होते हैं । शान्त्यतीत, शान्ति, विद्या, प्रतिष्ठा, और निवृत्ति ये पाँच क्रमशः आकाश आदि पञ्च महाभूतों की कलाएँ हैं । अवशिष्ट चक्र इन पाँच कलाओं से ही उन्मीलित हुआ है । बाकी शब्दों का अर्थ स्पष्ट है ॥ १९-२१ ॥ श्रीचक्र की ऊपर बताई गई द्विविध वासना सृष्टि क्रम¹ के अनुसार है, अब २२ वें से लेकर २४ वें श्लोक तक संहार क्रम से भावना बताई जा रही है— १. प्रथा-उ. । २. तीत-घ. ने. ज. झ. उ. ।
- बिन्दु से चतुरस्र पर्यन्त क्रम सृष्टि तथा चतुरस्र से बिन्दु पर्यन्त क्रम संहार कहलाता है । यहीं आगे ( १।७७-७८ ) इस बात को दिखाया गया है । दोनों ही पद्धतियों से श्रीचक्र की पूजा विहित है । भावना भी उसी पद्धति से की जाती है । योगिनीहृदय में आगे ( १।५४ ) सृष्टि क्रम से वासना वर्णित है । अपनी व्याख्या में इसी क्रम को प्रधानता देने के अभिप्राय से अमृतानन्द ने सुभगोदयवासना के श्लोकों का क्रम बदल दिया है । वस्तुतः वहाँ संहार क्रम से श्रीचक्र की वासना वर्णित है ।