भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३३ निरंशा^१ शान्ता शक्तिः, शान्ताया निरंशत्वं चिद्रूपत्वात् । तेन निरंशौ नाद- बिन्दू द्वावपि शान्ताशक्तिमयौ । नादबिन्दुरूपं चतुरस्रषोडशदलात्मकं चक्रद्वयं शान्ताशक्तिमयमित्यर्थः । कला चेच्छास्वरूपकम् इच्छायाः स्वरूपं कलारूपम्, अष्टदलपद्ममिच्छाशक्तिमयमित्यर्थः । ज्येष्ठा ज्ञानं ज्ञानशक्तिरेव ज्येष्ठारूपम्, चतुर्दशारं ज्ञानशक्तिमयमित्यर्थः । क्रिया शेषं रौद्री-वामा-विषघ्नो-दूतरी-सर्वा^२- नन्दाख्यशक्तिपञ्चकरूपं द्विद्शाराष्टकोणत्रिकोणबैन्दवाख्यचक्रपञ्चकं क्रिया- शक्तिमयमित्यर्थः ॥२३॥ पूर्वं चक्रस्य “शून्याकारात्” (१।१०) इत्यारभ्य कामकलारूपतां प्रतिपाद्ये- दानीमुपसंहरति— इत्येवं त्रितयात्मकम् । चक्रं कामकलारूपं प्रसारपरमार्थतः ॥२४॥ ^३एवम् उक्तप्रकारेण त्रितयात्मकं वामादिमातृशक्तित्रयमयं चक्रं बिन्दु- त्रितयमयं कामकलाक्षररूपम् । प्रसारपरमार्थतः । यद् यस्मात् प्रसृतं तत् तस्य शान्ता शक्ति निरंश है । इसको निरंश इसलिये कहते हैं कि यह चित्स्वरूपाणी है । ऊपर गिनाई गई नौ शक्तियों में से प्रथम दो—नाद और बिन्दु—शान्ता शक्ति- स्वरूप हैं । इसका अभिप्राय यह हुआ कि नाद और बिन्दुममय चतुरस्र और षोडश दलात्मक दो चक्र शान्ता शक्तिमय हैं । कलास्वरूप अष्टदल पद्म इच्छाशक्तिमय और ज्येष्ठारूप चतुर्दशार ज्ञानशक्तिमय है । रौद्री, वामा, विषघ्नी, दूतरी, सर्वानन्दा नामक शक्तियों से क्रमशः संयुक्त द्विद्शार (बहिर्दशार और अन्तर्दशार), अष्टकोण, त्रिकोण और बैन्दव नामक पाँच चक्र क्रियाशक्तिमय हैं ॥२३॥ यहाँ दसवें श्लोक से कामकला के स्वरूप के प्रतिपादक प्रकरण का उपक्रम हुआ था, अब उसका उपसंहार किया जा रहा है— इस तरह से शक्तित्रयमय यह चक्र कामकलास्वरूप है, क्योंकि यह वास्तव में कामकला का ही विस्तार है ॥२४॥ ऊपर बताई गई पद्धति से प्रकाशात्मक प्रमाता की वामा प्रभृति तीन शक्तियों से संवलित यह श्रीचक्र तीन बिन्दुओं से बने कामकलाक्षर का ही विस्तार होने से तन्मय है । जो पदार्थ जिससे बनता है, उसमें उसी की वास्तविक सत्ता मानी जाती है और वह तत्स्वरूप ही होता है । जैसे कि मिट्टी घट का परमार्थ है, क्योंकि घड़ा मृण्मय ही है । १. निरंशः—ख. ने. ज. ड. । २. नन्देति—ख. घ. ने. झ. ड. । ३. ‘एवम्’...‘पर- मार्थतः’ नास्ति—ख. ग. घ. ने. ज. झ. ड. । ३