योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः परमार्थस्तद्रूपं च तत् । यथा मृद् घटस्य १मृद्रूपश्च घटः, तन्तवः पटस्य तन्तुरूपश्च पटः। एवं कामकलाक्षरात् प्रसृतस्य २श्रीचक्रस्य कामकलाक्षरं परमार्थः, तद्रूपं ३बैन्दवं चक्रमित्यर्थः ॥२४॥ पुनरस्यैव चक्रस्य प्रकारान्तरेण वासनान्तरमाह "अकुले विषुसंज्ञे च" इत्यादिना "परानन्दविघूर्णितम्" इत्यन्तेन (श्लो० २५-३५)— अकुले विषुसंज्ञे च शाक्ते वह्नौ तथा पुनः । नाभावनाहते शुद्धे लम्बिकाग्रे भ्रुवोऽन्तरे ॥२५॥ इन्दौ तदर्धे रोधिन्यां नादे नादान्त एव च । शक्तौ पुनर्व्यापिकायां समनोन्मनिगोचरे ॥२६॥ महाबिन्दौ ४अकुले, कुलादन्यदकुलम्, सुषुम्नामूल५संस्थितारुणसहस्रदलकमलमकुलं६ नाम । तदुपर्यष्टदल७पद्मोर्ध्वस्थितं षड्दलं कुलपद्मम् । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— तन्तु पट का परमार्थ है, क्योंकि कपड़ा तन्तु (सूत) से ही बना है । इसी तरह से काम- कलाक्षर से प्रसृत (विस्तृत) श्रीचक्र का परमार्थ कामकला ही है । इसका अभिप्राय यह है कि जैसे बैन्दव चक्र कामकलामय है, उसी तरह से बिन्दु और त्रिकोण चक्र के विस्तार से बना यह पूरा श्रीचक्र (श्रीयन्त्र) भी कामकलामय ही है ॥२४॥ फिर इसी चक्र की भावना का दूसरा प्रकार आगे के (२५-३५) श्लोकों में बताया जाता है— विषु१ संज्ञक अकुल चक्र में, शाक्त, वह्नि, नाभि, अनाहत, (वि)शुद्ध, लम्बि- काग्र और भ्रूमध्य चक्र में; बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना में तथा महाबिन्दु में ॥२५-२६॥ अकुल चक्र कुल चक्र से भिन्न है । यह चक्र सुषुम्ना के मूल में स्थित है और इसमें लाल वर्ण का सहस्रदल कमल विराजमान है । इसके ऊपर अष्टदल पद्म और उसके ऊपर जो षड्दल कमल है, उसको कुलपद्म कहते हैं । इस विषय का विस्तार स्वच्छन्दसंग्रह में किया गया है— १. मृण्मयश्च-ख. । २. 'श्री' नास्ति-घ. ने. ज. झ. उ. । ३. चेदं-ख. ग. ज. झ. उ. । ४. 'अकुले' नास्ति-ख. ग. घ. झ. उ. । ५. स्थितसहस्र-ख. ग. ज. झ. । ६. 'अकुलं' नास्ति-ख. ग. ज. झ. उ. । ७. दलोर्ध्व-ख. ग. घ. झ. । १. अकुल और विषु संज्ञक चक्रों की भिन्नता के विषय में अभी आगे विचार किया जायेगा।