योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३५ अधश्चोर्ध्वं सुषुम्नायाः सहस्रदलसंयुक्तम् । रक्तं श्वेतं च साहस्रदलस्थं शक्तिभिर्वृतम् ॥ ऊर्ध्वाधोमुखमीशानि कर्णिकाकेसरान्वितम् । शक्तिरूपं महादेवि २कुलाकुलमयं शुभम् ॥ पङ्कजद्वयमीशानि स्थितं शाश्वतमव्ययम् । तयोर्मध्ये सुषुम्नान्तस्त्रिंशदाधारपङ्कजम् ॥ शक्तिरूपं शिवाकारं शर्वाण्याः सन्निजालयम् । तेषां रूपं क्रियां चैव ४क्रमाद् वक्ष्येऽधुना शृणु ॥ गुदमेढ्रान्तरं देवि पञ्चाङ्गुलसमुच्छ्रितम्५ । ६कन्दमेकाङ्गुलं मध्ये द्वयाङ्गुलविसारणम् ॥ तस्य ७मध्ये महायोनिस्त्रिकोणाकाररूपिणी । सुषुम्ना योनिमध्यस्था तस्या मूले महेश्वरि ॥ अधःपद्मं सहस्रारं कर्णिकाकेसरान्वितम् । तैजसं ८रत्नसंदोप्तं तद्दलस्थितशक्तिभिः ॥ सुषुम्ना के नीचे और ऊपर सहस्रदल से संयुक्त रक्त और श्वेत वर्ण के दो पद्म हैं। हे ईशानि ! रक्तदल पद्म का मुँह ऊपर की तरफ तथा श्वेतदल पद्म का मुख नीचे की ओर है। ये दोनों पद्म शक्तिसमूह से आवृत हैं, कर्णिका और केसर से संयुक्त हैं। हे महादेवि ! शक्तिस्वरूप कुलाकुलमय ये शुभ पंकज शाश्वत और अव्यय हैं। इनकी यही स्थिति सदा बनी रहती है, अपनी इस स्थिति से ये कभी च्युत नहीं होते। इन दोनों पद्मों के बीच में सुषुम्ना के भीतर ३० आधार पंकज माने गये हैं। ये शिवशक्तिस्वरूप हैं और इनमें भगवती शर्वाणी (पार्वती) निवास करती हैं। इन आधार पंकजों के स्वरूप और कार्य को अब मैं बताता हूँ, तुम सुनो। हे देवि ! गुदा और मेढ्र (लिंग) के बीच में पाँच अंगुल की ऊँची जगह है। इसके बीच में एक अंगुल के ऊँचे और दो अंगुल विस्तार वाले स्थान को कन्द कहते हैं। इस कन्द स्थान के मध्य में त्रिकोण सदृश आकार वाली महायोनि विराजमान है। इस योनि के मध्य में सुषुम्ना नाडी अवस्थित है। हे महेश्वरि इसी सुषुम्ना नाडी के मूल में कर्णिका और केसर से संयुक्त नीचे वाला रक्तदल सहस्रार पद्म विराजमान है। यह तेजोमय पंकज रत्नों की प्रभा के समान उज्ज्वल है। हे प्रिये ! १. इतः परम्—'पर्वाङ्गुलसमुच्छ्रयम् । गुदमेकाङ्गुलं मध्ये' इत्यधिकं—ने. ज. उ. । २. द्वयाङ्गुलकुलाकुलम्—ज. । ३. सर्वेभ्यो मत्प्रियालयम्—क., सर्वाभ्यासनिजालयम्—ख. ने. झ. । ४. क्रमं—ख. ग. ने. ज. झ. । ५. द्वयम्—ने. ज. उ. । ६. गुद—ख. ग. घ. ने. ज. झ. उ. । ७. मले—ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ८. रक्तवह्नीप्तं—घ. ने. ज. झ. उ. ।