योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रतिकिञ्जल्कसंस्थाभिः शक्तिभिः संवृतं प्रिये । कर्णिकामध्यतो देवि कुलदेवी च संस्थिता ॥ तत्पद्मोर्ध्वं सुषुम्नाया मध्ये त्वेकाङ्गुलोपरि ॥ पद्ममष्टदलेर्युक्तमष्टग्रन्थिसमन्वितम् ॥ रक्तं सुकर्णिकोपेतं रक्तकिञ्जल्कशोभितम् । ग्रन्थ्यग्रस्थत्रिशृङ्गं¹ च ब्रह्माण्याद्यष्टभैरवैः ॥ अष्टपत्रस्थितग्रन्थिस्थित²वामादिशक्तिभिः । तदन्यशक्तिभिश्चैव शृङ्गस्थाभिः समावृतम् ॥ तन्मध्ये कौलशक्त्या तु सेवितं च स्मरेत् ततः । एकाङ्गुलप्रमाणोर्ध्वं षड्दलं कुलपङ्कजम् ॥ इति । ननु कुलादन्यदकुलमिति चेदर्थस्तर्हि तदन्तरालस्थिताऽष्टदलपद्मस्याप्यकुलत्वं किं न स्यादित्यत आह—विषुसंज्ञे चेति । "विषॢ व्याप्तौ" (१०९५ जु०) । यत् पंकज के प्रत्येक दल और केसर में विभिन्न शक्तियों का निवास है और हे देवि ! कर्णिका के मध्य में कुलदेवी विराजमान हैं ॥ इस पद्म के एक अंगुल ऊपर सुषुम्ना नाडी के मध्य में आठ दल और आठ ग्रन्थियों से युक्त लाल वर्ण का पद्म है । इसकी कर्णिका सुन्दर है और यह लाल वर्ण की केसर से सुशोभित है । प्रत्येक ग्रन्थि के अग्र भाग में त्रिकोण है और उनमें ¹आठ भैरवों के साथ आठ ब्रह्माणी प्रभृति देवियाँ विराजमान हैं । आठ दलों की ग्रन्थियों में वामा प्रभृति आठ शक्तियाँ विराजमान हैं और शृंग (केसर) में भी अनेक शक्तियों का निवास है । इन सबके बीच का स्थान कौल शक्ति से सेवित है, अर्थात् इस कमल की कर्णिका में कौल शक्ति निवास करती है । इस अष्टदल कमल से एक अंगुल ऊपर छः दल वाला कुल पंकज अवस्थित है ॥ यहाँ प्रश्न होता है कि ऊपर कुलचक्र से भिन्न चक्र को अकुल कहा गया है, इसके अनुसार दोनों के बीच में विद्यमान अष्टदल पद्म की भी अकुल संज्ञा हो जायगी । इसका समाधान यह है कि इसी आशंका की निवृत्ति के लिये 'अकुले' पद का 'विषुसंज्ञे'² १. शृङ्गाग्रे-घ., शूलं च-उ. । २. वर्गादि-ख, ग, घ, ज, झ, ।
- असिताङ्ग, रुरु, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण और संहार नामक आठ भैरव तथा ब्रह्माणी, माहेशी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा और महालक्ष्मी नामक आठ देवियाँ मानी जाती हैं। वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, कलविकरणी, बलविकरणी, बलप्रमथिनी, सर्वभूतदमनी और मनोन्मनी—ये आठ वामा प्रभृति शक्तियाँ हैं।
- अमृतानन्द ने यहाँ आठ ही स्थान माने हैं, जब कि भास्करराय को नौ स्थान अभिप्रेत हैं। इसीलिये वे अकुल से विषु चक्र की स्थिति भिन्न मानते हैं। उनका अनुमान है कि स्वच्छन्दसंग्रह में निर्दिष्ट अष्टदल और षड्दल कमलों में से कोई एक प्राचीन तन्त्रों