भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 87

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३७ सुषुम्नां तदन्तर्गतत्रिंशत्पङ्कजानि च व्याप्नोति, तत्सहस्रदलकमलं विषुवम्¹, ²तस्य सर्वाधारत्वात्। ततो नाष्टदलकमलमकुलमित्यर्थः। शाक्ते वह्नाविति। अत्र वह्नौ शाक्त इति व्यत्ययेन पठितव्यम्। वह्निर्मूला- धारः, वह्निबिम्बाधारत्वात्। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— आधारपङ्कजं पीतं चतुष्पत्रं सुकेसरम्। अधोमुखं च तन्मध्ये कुण्डली परमेश्वरी³ ॥ स्वयम्भुमध्यगा चिन्त्या वरदादिभिरावृता⁴। पार्थिवं पङ्कजं ह्येतत् तस्योर्ध्वं⁵ पङ्कजं परम्॥ यह विशेषण दिया गया है। 'विष्लृ' धातु का अर्थ व्याप्ति होता है। जो चक्र सुषुम्ना नाडी और उसके मध्य में विद्यमान ३० पंकजों में व्याप्त है, वह सहस्रदल कमल विषुव कहलाता है, क्योंकि वही इन सबका आधार है। अष्टदल कमल इन सबमें व्याप्त नहीं है, अतः इसको अकुल (विषुव) नहीं कहा जायगा। 'शाक्ते वह्नौ' इसको 'वह्नौ शाक्ते' इस क्रम से पढ़ना चाहिये। वह्नि शब्द से मूला- धार चक्र गृहीत होता है, क्योंकि यही वह्निबिम्ब का आधार है, जैसा कि स्वच्छन्दसंग्रह में वर्णित है— आधार पंकज पीत वर्ण का चार दल वाला और सुन्दर केसर से संयुक्त है। यह चक्र अधोमुख है। इस चक्र के मध्य में स्वयम्भू लिंग विराजमान है। उस स्वयम्भू लिंग के बीच में ²वरदा प्रभृति शक्तियों से घिरी हुई भगवती कुण्डलिनी का ध्यान १. विषुवत्-ने.। २. 'तस्य' नास्ति-ग. ने. ज. झ. उ.। ३. इतः परम्-'तदुक्तं गोरक्षसंहितायाम्-योनिमध्ये महालिङ्गं पश्चिमाभिमुखं त्वधः। मस्तके मणिवद् भिन्नं यो जानाति स योगवित्॥' इत्याधिकः पाठः-ग. उ.। ४. इतः परम्-'पृथिवीमण्डलं पीतं चतुरस्रं सुशोभनम्। तप्तचामीकराभासं तडिल्लेखेव विस्फुरत्॥ चतुरस्रं पुरं वह्नेरधो मैत्रादवस्थितम्। इति गोरक्षे' इत्याधिकः पाठः-ग. उ.। ५. तस्याधः-घ. ने. ज. झ. उ.। में विषु नाम से जाना जाता था। उनका यह अनुमान सही लगता है। दीपिकाकार ने अष्टदल पद्म का विशेष वर्णन किया है, षड्दल का केवल संक्षेप में उल्लेख कर दिया है। अतः अष्टदल पद्म की ही विषु संज्ञा होनी चाहिये। इस विषय पर उपोद्घात में विशेष चर्चा की जायगी। सकलनिष्कल भावना जैसे बिन्दु से उन्मना पर्यन्त नौ कलाओं में की जाती है, उसी तरह से सकल भावना के भी नौ ही स्थान होने चाहिये। आगे (३।१४२- १४४) स्वयं दीपिकाकार ने स्वच्छन्दसंग्रह के एक वचन को उद्धृत किया है, जिसमें नवाधार तथा षट्‌चक्रों का स्पष्ट उल्लेख है। छः चक्रों का उल्लेख मूलग्रन्थ (३।३०) में भी मिलता है। १. व श ष स इन चार अक्षरों की अधिष्ठात्री वरदा, श्री, षण्ढा और सरस्वती नाम्नी चार शक्तियों का ध्यान यहाँ विहित किया गया है।