योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपकाभाषानुवादसहितम् २३ प्रथमं त्रिकोणस्य पश्यन्त्यादित्रितयहेतुत्वात् तन्मयतां प्रतिपाद्य इदानीं बाह्य- चक्रस्य वैखरीमयतां तदुत्थितां तत्त्वस्वरूपतां च कथयति चक्रमित्यादिना वामा- रूपभ्रमित्रयमित्यन्तेन (श्लो० १३-१९) — चक्रं नवात्मकमिदं नवधा भिन्नमन्त्रकम् ॥१३॥ इदं चक्रं त्रिकोणत्रयरूपेण नवात्मकं त्रैलोक्यमोहनादिनवचक्रात्मना परिणतं नवधा भिन्नमन्त्रकं वक्ष्यमाणकरशुद्ध्यादिनवचक्रेश्वरीमन्त्रनवकभेदवत् ॥१३॥ बैन्दवासनसंरूढेसंवर्तानलचित्कलम् । अम्बिकारूपमेवेदमष्टारस्थं स्वरावृतम् ॥१४॥ बैन्दवासनं महाबिन्द्वात्मकसदाशिवासनम् । अत्रैव वक्ष्यति—"सदाशिवासनं देवि महाबिन्दुमयं परम्" (२।५६) इति । शिवशक्त्योः सदाशिवतत्त्वोपरि स्थित- त्वाद् बैन्दवासनसंरूढत्वम्। संवर्तानलो लयानलः, यत्र क्षित्यादिशिवपर्यन्तं लीयते अभी ११वें श्लोक में बताया गया है कि त्रिकोण से ही पश्यन्ती आदि वाणियों का विकास होता है, अतः यह तन्मय है। अब 'चक्रम्' इत्यादि १३वें श्लोक से 'वामारू- पभ्रमित्रयम्' पर्यन्त १९वें श्लोक तक बाह्य चक्र की वैखरीमयता (वर्णात्मकता) और तत्त्वमयता (तत्त्वात्मकता) का वर्णन किया जा रहा है— यह नवात्मक श्रीचक्र नवधा भिन्न मन्त्रों से संयुक्त है ॥१३॥ तीन त्रिकोणों के संयोग से निष्पन्न ¹नवयोनि चक्र ही त्रैलोक्यमोहन प्रभृति नौ चक्रों के रूप में परिणत हो जाता है। इनमें से प्रत्येक चक्र आगे (२।२-५) बताये गये कर- शुद्धि आदि नौ चक्रेश्वरी मन्त्रों से संवलित होता है ॥१३॥ बैन्दव (त्रिकोण) चक्र प्रकाशस्वरूप संवर्तानल अकार और विमर्शस्वरूप चित्कला हकार का आसन है। यह अम्बिका रूप ही है। त्रिकोण चक्र जब अष्टार नवयोनि चक्र से घिर जाता है, तो वह स्वरों से आवृत रहता है ॥१४॥ बैन्दवासन का अर्थ है महाबिन्दु स्वरूप सदाशिवासन । आगे (२।५६) महाबिन्दु को सदाशिव का आसन बताया गया है। शिव और शक्ति का स्थान सदाशिव तत्त्व से ऊपर है, अतः शिव और शक्ति को यहाँ बैन्दवासन पर बैठा हुआ बताया गया है। प्रलय काल की अग्नि को संवर्तानल कहते हैं। यहाँ अकार को संवर्तानल कहा गया है, क्योंकि पृथ्वी से लेकर शिव तत्त्व पर्यन्त सारा जगत् समस्त वर्णों के आदिभूत इस प्रकाशात्मक अनुत्तर १. संरूढं-ग. च. उ. । १. नवयोनि चक्र, अर्थात् तीन त्रिकोणों के संयोग से बने वसुकोण चक्र का नित्या- षोडशिकार्णव (१।२९-४१) में वर्णित पद्धति से विस्तार होने पर अन्ततः नवचक्रात्मक श्रीचक्र परिपूर्ण हो जाता है। यहाँ भी आगे (१।७३-७५) इस विषय की संक्षिप्त चर्चा