योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः एवं कृते सति सवासनं नवयोनिचक्रं निष्पद्यत इत्याह— धर्माधर्मौ तथात्मानौ मातृमेयौ तथा प्रमा ॥१२॥ नवयोन्यात्मकमिदं चिदानन्दघनं महत् । धर्माधर्मौ पुण्यपापे । आत्मानः आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा, ज्ञानात्मा चेति चत्वारः । मातृमेयौ माता जीवः, मेयो ग्राह्यवर्गः । प्रमा ज्ञप्तिः ॥१२॥ एवमेतन्नवमयं नवयोन्यात्मकं चक्रं चिदानन्दघनम् । चित् चैतन्यकला, आनन्दो विश्वाहन्तापरिणामः, ताभ्यां घनं बहिरन्तर्निबिडम् । यथा लवणं घनम् । महद् देशकालाकारैरनाकलितम्, चिन्मयत्वात् । ऐसा करने से नवयोनि चक्र बन जाता है । इसमें ¹वासना (भावना) का प्रकार बताते हैं— इसमें धर्म, अधर्म, चतुर्विध आत्मा, माता, मेय और प्रमा की भावना करनी चाहिए। यह नवयोन्यात्मक चक्र चित् और आनन्द से परिपूर्ण तथा महान् है ॥१२॥ धर्म और अधर्म का अर्थ है पुण्य और पाप । आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा और ज्ञानात्मा के भेद से आत्मा के चार भेद हैं । माता का अर्थ जीव, मेय का अर्थ ग्राह्य विषय और प्रमा का अर्थ ज्ञप्ति अर्थात् ज्ञान है ॥१२॥ नवयोनि चक्र इन नौ पदार्थों का प्रतिनिधि है, अर्थात् इस नवयोनि चक्र की एक- एक योनि में इनकी भावना करनी चाहिए । यह चक्र चिदानन्दघन है । चित् का अर्थ चैतन्यकला और आनन्द का अर्थ ²विश्वाहन्ता का अनुभव है । यह चक्र चैतन्यकला और विश्वाहन्ता की अनुभूति से भीतर-बाहर उसी तरह से ओत-प्रोत है, जैसे कि लवण का एक-एक कण लवणरस से ओत-प्रोत रहता है । यह चिन्मय होने से ही महत् है, देश-काल और आकार से परिमित न होने से महतो महीयान् है । १. योगिनीहृदय की अपनी टीका (पृ० ८२) में भास्करराय ने वासना शब्द का अर्थ सूक्ष्म रूपान्तर किया है । इसका अभिप्राय यह है कि स्थूल आकार में छिपे सूक्ष्म आध्यात्मिक स्वरूप की भावना का प्रकार यहाँ वासना के द्वारा बताया गया है । २. विश्वाहन्ता शब्द के अर्थ को समझने के लिये देखिये विज्ञानभैरव भाषानुवाद (पृ. १००, ११२-११४) तथा "आगम और तन्त्रशास्त्र" (पृ. ५५-५७) नामक ग्रन्थ ।