योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २१ बिन्दुरहङ्कारात्मा रविरेतन्मिथुनसमरसाकारः । कामः कमनीयतया कला च दहनेन्दुविग्रहौ बिन्दू ॥ इति कामकला विद्या देवी चक्रक्रमात्मिका सेयम् । विदिता येन स मुक्तो भवति महात्रिपुरसुन्दरीरूपः ॥ (का० वि० श्लो० ३-८) इत्यादि ॥११॥ एतस्य त्रिरूपत्वं पुनर्भवोत् । एतस्य त्रिकोणात्मकस्य चक्रस्य पुनस्त्रिरूपत्वं भवेत् । पुनःशब्देन पूर्वोक्तस्यैव गुणान्तरकथनं १गम्यते । इदमेव त्रिकोणात्मकं भूयोऽपि शक्तित्वं सृष्ट्या वह्नित्वं च संहारात्मना प्रतिपद्य तत् त्रिधाऽभूदित्यर्थः । यह श्वेत और रक्त बिन्दुयुगल अहंकार (अहंतत्त्व) स्वरूप है । इसका नाम रवि है । इसमें दोनों बिन्दु समरसभाव से रहते हैं । यह समरसभाव सबके लिये कमनीय (स्पृहणीय) है । इसलिए इसे काम भी कहते हैं । अग्नि और चन्द्र (अग्नीषोम) नामक दो बिन्दु इस काम की कलाएँ हैं ॥ इस कामकला नामक महात्रिपुरसुन्दरी विद्या का यही स्वरूप है । श्रीचक्र, श्रीविद्या आदि के क्रम से जो इसको जान लेता है, वह साधक महात्रिपुरसुन्दरी स्वरूप हो जाता है, मुक्त हो जाता है ॥ यह त्रिकोणात्मक बैन्दव चक्र पुनः तीन रूपों में विभक्त हो जाता है, अर्थात् तीन त्रिकोणों के योग से नवयोनि चक्र¹ बन जाता है । इस त्रिकोणात्मक चक्र के पुनः तीन रूप हो जाते हैं । पुनः शब्द का यहाँ प्रयोग हुआ है । इससे यह अभिप्राय निकलता है कि यह कोई नई सृष्टि न होकर उसी त्रिको- णात्मक चक्र का गुणात्मक परिवर्तन होता है । यही त्रिकोणात्मक चक्र फिर भी सृष्टि क्रम से शक्ति चक्र का और संहार क्रम से वह्नि चक्र का स्वरूप धारण कर त्रिधा विभक्त हो जाता है । १. शस्यते-ख. ।
- नवयोनि चक्र शब्द से योगिनीहृदय में सर्वत्र वसुकोण चक्र का ग्रहण करना चाहिए ।