भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २१ बिन्दुरहङ्कारात्मा रविरेतन्मिथुनसमरसाकारः । कामः कमनीयतया कला च दहनेन्दुविग्रहौ बिन्दू ॥ इति कामकला विद्या देवी चक्रक्रमात्मिका सेयम् । विदिता येन स मुक्तो भवति महात्रिपुरसुन्दरीरूपः ॥ (का० वि० श्लो० ३-८) इत्यादि ॥११॥ एतस्य त्रिरूपत्वं पुनर्भवोत् । एतस्य त्रिकोणात्मकस्य चक्रस्य पुनस्त्रिरूपत्वं भवेत् । पुनःशब्देन पूर्वोक्तस्यैव गुणान्तरकथनं १गम्यते । इदमेव त्रिकोणात्मकं भूयोऽपि शक्तित्वं सृष्ट्या वह्नित्वं च संहारात्मना प्रतिपद्य तत् त्रिधाऽभूदित्यर्थः । यह श्वेत और रक्त बिन्दुयुगल अहंकार (अहंतत्त्व) स्वरूप है । इसका नाम रवि है । इसमें दोनों बिन्दु समरसभाव से रहते हैं । यह समरसभाव सबके लिये कमनीय (स्पृहणीय) है । इसलिए इसे काम भी कहते हैं । अग्नि और चन्द्र (अग्नीषोम) नामक दो बिन्दु इस काम की कलाएँ हैं ॥ इस कामकला नामक महात्रिपुरसुन्दरी विद्या का यही स्वरूप है । श्रीचक्र, श्रीविद्या आदि के क्रम से जो इसको जान लेता है, वह साधक महात्रिपुरसुन्दरी स्वरूप हो जाता है, मुक्त हो जाता है ॥ यह त्रिकोणात्मक बैन्दव चक्र पुनः तीन रूपों में विभक्त हो जाता है, अर्थात् तीन त्रिकोणों के योग से नवयोनि चक्र¹ बन जाता है । इस त्रिकोणात्मक चक्र के पुनः तीन रूप हो जाते हैं । पुनः शब्द का यहाँ प्रयोग हुआ है । इससे यह अभिप्राय निकलता है कि यह कोई नई सृष्टि न होकर उसी त्रिको- णात्मक चक्र का गुणात्मक परिवर्तन होता है । यही त्रिकोणात्मक चक्र फिर भी सृष्टि क्रम से शक्ति चक्र का और संहार क्रम से वह्नि चक्र का स्वरूप धारण कर त्रिधा विभक्त हो जाता है । १. शस्यते-ख. ।

  1. नवयोनि चक्र शब्द से योगिनीहृदय में सर्वत्र वसुकोण चक्र का ग्रहण करना चाहिए ।