भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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२० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः स्फुटशिवशक्तिसमागमबीजाङ्कुररूपिणी परा शक्तिः । अनुत्तररूपानुत्तरविमर्शलिपिलक्ष्यविग्रहा भाति ॥ परशिवरविकरनिकरे प्रतिफलति विमर्शदर्पणे विशदे । प्रतिरुचिरुचिरे कुड्ये चित्तमये निविशते महाबिन्दुः ॥ चित्तमयोऽहङ्कारः सुव्यक्ताहार्णसमरसाकारः । शिवशक्तिमिथुनपिण्डः कवलीकृतभुवनमण्डलो जयति¹ ॥ सितशोणबिन्दुयुगलं विविक्तशिवशक्तिसंकुचत्प्रसरम् । वागर्थसृष्टिहेतुः परस्परानुप्रविष्टविस्पष्टम् ॥ शिव और शक्ति, अर्थात् ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति का स्पष्ट समागम होने पर बीजाङ्कुरन्याय का प्रतिनिधित्व करने वाली पराशक्ति अत्यन्त सूक्ष्म अनुत्तर लिपि अकार और विमर्श लिपि हकार (विसर्ग) के स्वरूप में भासित होने लगती है ॥ सूर्य को तरफ दर्पण का मुँह करने से जैसे सूर्य की किरणें स्वच्छ दर्पण पर पड़ने के बाद दीवाल पर तेजोबिन्दु के रूप में प्रतिफलित होती हैं, उसी तरह से प्रकाशात्मक परमशिव की किरणों के विमर्श रूपी स्वच्छ दर्पण पर पड़ने से चित्तमय कुड्य (भित्ति) में महाबिन्दु भासित होने लगता है ॥ ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति के प्रकाश से आलोकित यह चित्त ही वह अहंकार ¹ (अहंतत्त्व) है, जिसका कि स्वरूप अत्यन्त स्पष्ट अकार और हकार लिपि के समरसीभाव से बनता है। यह 'अहम्' तत्त्व प्रकाशात्मक शिव और विमर्शात्मक शक्ति का युगल स्वरूप है। शब्द और अर्थमय सारे जागतिक प्रपंच को इसने अपने भीतर समेट रखा है, अतः यही सर्वोत्कृष्ट तत्त्व है ॥ इस चित्तमय महाबिन्दु में श्वेत और रक्त बिन्दुयुगल की भावना करनी चाहिए । शिव और शक्ति के इस विभक्त स्वरूप में सारी सृष्टि का विस्तार छिपा हुआ है। परा, पश्यन्ती प्रभृति वाक्सृष्टि और शिव से लेकर पृथिवी पर्यन्त अर्थ की सृष्टि का यही कारण (आधार) है। इस बिन्दुयुगल में कामेश्वर और कामेश्वरीमय दिव्य मिथुन का स्वरूप परस्पर अनुप्रविष्ट और विस्पष्ट, अर्थात् समरसाकार और विभक्ताकार दोनों ही रूपों में भासित होता है ॥ १. लसति—ख. ग. ने. ज. झ. उ. ।

  1. सांख्यदर्शन के अहंकार से यह भिन्न तत्त्व है । वामनभट्ट के अद्वयसम्पत्तिवार्त्तिक में इसका वर्णन मिलता है । देखिये—विज्ञानभैरव हिन्दी भाषानुवाद (पृ. १००) तथा लुप्तागमसंग्रह, द्वितीय भाग, उपोद्घात (पृ. १९५) !