योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १९ बिन्दुद्वयान्तरालनिःसृता¹ हार्धकलारूपा, तथा युक्तादेवंभूतात् कामकलाक्षरात् । प्रसूतं विश्वलहरीस्थानं मातृत्रयात्मकं बैन्दवं चक्रम् । विश्वलहरीस्थानम्, विश्व- लहर्यो वीचयः षट्त्रिंशत्तत्त्वरूपास्तासां स्थानम्, उत्पत्तिहेतुत्वात् । मातृत्रयात्मकं पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरीरूपम् । एवं तत्समष्टिरूपपरमा²त्मात्मकसदाशिवाख्य- तुरीयबिन्दोरुत्पन्नतत्वाद् बैन्दवं चक्रं मध्यत्रिकोणं प्रसृतम् । एतदत्रैव वक्ष्यति— "आत्मनः स्फुरणं पश्येत्" (१।३६) इत्यादि, "वैखरी विश्वविग्रहा" (१।४०) इत्यन्तेन, "चक्रं कामकलारूपं प्रसारपरमार्थतः" (१।२४) इति च । एतत् काम- कलाविलासेऽप्यस्मद्गुरुभिः प्रपञ्चितम्— गया है। स्फुरत्ता (विमर्शशक्ति) की लहरी यहाँ दो बिन्दुओं के बीच से निकली हार्ध- कला है। इस हार्धकला से युक्त कामकला नामक ¹अक्षर से विश्वलहरीस्थान मातृ- त्रयात्मक बैन्दव (त्रिकोण) चक्र का प्रसार होता है। इसको विश्वलहरीस्थान इसलिये कहा गया है कि षट्त्रिंशत् तत्त्वात्मक विश्व की उत्पत्ति इससे उसी तरह से होती है, जैसे कि समुद्र से लहरें उठती हैं। यह बैन्दव (त्रिकोण) चक्र पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी का प्रतिनिधि है, क्योंकि इस त्रिकोण चक्र का प्रसार उस परमात्मस्वरूप सदाशिव नामक तुरीय (चतुर्थ) समष्टि बिन्दु से हुआ है, जो कि परा वाणी का प्रतिनिधि है। उस बैन्दव चक्र से इसका प्रसार हुआ है, अतः इस मध्यत्रिकोण चक्र को भी यहाँ बैन्दव चक्र ही कह दिया गया है। इस विषय का विस्तार यहाँ ²आगे (१।३६-४०) किया जायगा। "चक्रं कामकलारूपम्" (१।२४) ³इस श्लोक में भी यही विषय वर्णित है। हमारे (अमृतानन्द के) गुरु पुण्यानन्द ने ⁴कामकलाविलास में इस विषय को अधिक स्पष्ट किया है— १. मिश्रिता-ग. घ. ने. ज. झ. उ. । २. मात्मक-क. ख. ग. उ. ।
- हार्धकला से युक्त कामकला नामक बीजाक्षर का स्थूल स्वरूप शारदा लिपि के ईकार की सहायता से समझा जा सकता है।
- वहाँ कामकला नामक बीजाक्षर की बैन्दव (त्रिकोण) चक्रात्मकता, वाक्चतुष्ट- यात्मकता, अम्बिकादि शान्तादि शक्तिचतुष्टयात्मकता का वर्णन करते हुए शृंगाट की परिपूर्णता दिखाई गई है।
- श्रीचक्र की सृष्टि और संहार क्रम की वासनाओं का वर्णन करने के बाद वहाँ बताया गया है कि सम्पूर्ण श्रीचक्र कामकला का ही विस्तार है।
- श्रीचक्र के आध्यात्मिक स्वरूप का इस ग्रन्थ में परिपूर्ण वर्णन मिलता है। अति- महत्त्वपूर्ण व्याख्या चिद्वल्ली के साथ इस ग्रन्थ का विशिष्ट संस्करण गणेश एण्ड कम्पनी, मद्रास से प्रकाशित हो चुका है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)