भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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१८ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः प्रस्पन्दसंविदः। बिन्दुरग्नीषोमात्मकः कामाख्यो रविः शिवशक्तिसामरस्यात्मा१ जातः। तदुक्तं चिद्गगनचन्द्रिकायाम्— २भोग्यभोक्तृमयभाविमर्शागा(गां) देवि मां ३चिदुदधेदृढां दशाम्। अर्पयन्ननलसोममिश्रणस्तद्विवक्ष४ इह भानुजृम्भणः ॥ (श्लो० २१२) इति। शिवशक्तिसामरस्यरूपकामाख्यस्य बिन्दोः संस्कारः प्रस्पन्दो५ दहनेन्दुरूप- सितशोणबिन्दुद्वयात्मकः। अकारहकारसामरस्यबिन्दोः ६प्रस्पन्दात् सितशोणबिन्दु- युगलात् संविच्चिन्मयी दहनेन्दुरूपा चित्कला जायत इत्यर्थः ॥१०॥ ७प्रकाशपरमार्थत्वात् स्फुरत्तालहरीयुतात् । प्रसृतं विश्वलहरीस्थानं मातृत्रयात्मकम् ॥११॥ बैन्दवं चक्रम् प्रकाशविमर्शवृत्तिसम्पर्काद् घृतस्येव धारा विमर्शशक्तेः स्रावो जायते, अत एव प्रकाशस्य परमार्थत्वम्। स्फुरत्तालहरीयुतात् स्फुरत्ताया विमर्शशक्तेर्लहरी में विसर्ग है। इस शून्य अकार और विसर्ग से शिवशक्तिसामरस्य स्वरूप अग्नीषोमात्मक काम (रवि) बिन्दु की उत्पत्ति होती है। चिद्गगनचन्द्रिका में भी ऐसा ही कहा गया है— हे देवि ! चिदात्मक सागर (परमशिव दशा) से भोक्ता (आत्मा) और भोग्य (विषय) के रूप में उठ रही प्रकाशविमर्शात्मक (द्वैतमयी चंचल) लहरियों की स्थिति में भी स्थिर दशा (शुद्ध स्वात्मस्वरूप) को निरन्तर भासित कराने वाला, अग्नीषोमात्मक जगत् की सृष्टि के लिये उद्यत भानुजृम्भण (कामबिन्दु) मुझे यहाँ कुछ कहना सा चाह रहा है ॥ शिवशक्तिसामरस्यमय काम नामक बिन्दु का संस्कार, अर्थात् स्पन्दन ही अग्नी- षोमात्मक श्वेत और रक्त बिन्दुओं का रूप धारण करता है। अकार और हकार (विसर्ग) स्वरूप समरस कामबिन्दु के स्पन्दन से उत्पन्न श्वेत और रक्त बिन्दुयुगल से संवित्स्वरूपा, अर्थात् चिन्मयी अग्नीषोमात्मिका चित्कला निकलती है ॥१०॥ स्फुरत्ता (विमर्श) की लहरी से युक्त प्रकाशरूपी परमार्थ से विश्व के प्रकाशक मातृत्रयात्मक बैन्दव चक्र का प्रसार होता है ॥११॥ अग्नि के संपर्क से जैसे घी पिघलने लगता है, उसी तरह से प्रकाश के संपर्क से विमर्श शक्ति में स्राव होने लगता है, अतः प्रकाशात्मक शिव को ही यहाँ परमार्थ कहा १. रस्यवाच्यात्मा-क. ख. ने. । २. 'भोक्तृभोग्यमयगोविसर्गो' इति सार्वत्रिको दीपिकापाठः । ३. चिदुदधो-क. ग. ने., चिदुदरे-चि. । ४. 'विमर्श' इति सार्वत्रिको दी. पाठः । ५. प्रस्पन्दो-ख. ग. ज. । ६. प्रस्य-ख. ग. ने. । ७. प्रसार-ख. च. झ. ।