योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १७ वर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः” इति । अत्र श्रुतिः—‘‘अ इति ब्रह्म’’ (ऐ० आ० २।३।८) इति । विसर्गान्ताद् विसर्गोऽन्ते यस्य, १तस्माद् [विसर्गान्तात् । २बिन्दोः इसी लिये यह परमशिव का ही स्वरूप है। संकेतपद्धति में बताया गया है—“सभी वर्णों के आगे विद्यमान अकार प्रकाशात्मक परमशिव है”। ऐतरेयारण्यक में अकार को ब्रह्म कहा गया है। यह शून्याकार विसर्गान्त है, अर्थात् इस शून्यस्वरूप अकार के अन्त १. स विसर्गान्तस्तस्मात्–क. ग. । २. बिन्दुप्रस्यन्द–ख. ग. ने । हम सभी जानते हैं कि बिन्दु का आकार शून्य जैसा है। शून्य के आकार से ही बिन्दु की पहचान होती है। परा शक्ति के प्रतीक इस बिन्दु में अनुत्तर लिपि अकार और विसर्ग लिपि हकार (विसर्ग) अत्यन्त सूक्ष्म रूप में समरस अवस्था में स्थित हैं। यहाँ अनेक स्थलों पर उद्धृत संकेतपद्धति के एक वचन में बताया गया है कि अकार प्रकाशात्मक शिव और हकार विमर्शात्मक शक्ति का प्रतीक है। इन दोनों के मिलन से 'अहम्' की सृष्टि होती है। पाणिनि व्याकरण के अच् प्रत्याहार में जैसे अकार से लेकर चकार के मध्यवर्ती सभी वर्णों का ग्रहण होता है, उसी तरह से प्रत्याहारन्याय से 'अहम्' पद अकार से लेकर हकार पर्यन्त सभी वर्णों का द्योतक है। हकार को विसर्ग भी कहा जाता है और विसर्ग से ही समस्त विश्व की सृष्टि होती है। इसका अभिप्राय यह है कि बिन्दु की प्रकाश-विमर्शात्मक समरस अवस्था में यह सारा विश्व छिपा हुआ है। 'स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति' इस प्रत्यभिज्ञाहृदयसूत्र में तथा आगे (१।५०) दीपिका में उद्धृत वचन (जगच्चित्रं) में यह बताया गया है कि चितिशक्ति अथवा परमशिव स्वात्मभित्ति में स्वेच्छया विश्व का उन्मीलन करते हैं। सूर्य की तरफ दर्पण का मुंह करने पर सूर्य की किरणें स्वच्छ दर्पण पर पड़ कर जैसे दीवाल पर तेजोबिन्दु के रूप में भासित होने लगती हैं, उसी तरह से प्रकाशात्मक परमशिव की किरणें जब विमर्शरूपी स्वच्छ दर्पण पर पड़ती हैं, तो स्वात्मभित्ति में सबसे पहले महाबिन्दु भासित होता है। यही नवचक्रात्मक श्रीचक्र का बिन्दु नामक चक्र है। इसी को कामबिन्दु भी कहते हैं, क्योंकि कामेश्वर और कामेश्वरी यहाँ समरस अवस्था में स्थित हैं। इस कामबिन्दु में स्पन्दन या स्राव के उठने पर श्वेत और रक्त अग्नीषोमात्मक बिन्दुयुगल के रूप में विसर्ग की प्रतीति होती है। यह बिन्दुयुगल कामबिन्दु की कला है। इस तरह से बिन्दु और विसर्ग के मिलन से कामकला नामक बीजाक्षर की निष्पत्ति होती है। प्रकाशशक्ति की प्रधानता वाले विमर्शशक्ति की स्फुरत्ता (हार्धकला) से युक्त इस कामकला नामक बीजाक्षर से ही विश्वलहरीस्थान मातृत्रयात्मक बैन्दव (त्रिकोण) चक्र का प्रसार होता है। २