योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते। पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च।। इति। (श्वे० उ० ६।८) आज्ञावतारेऽप्युक्तम्—"स्वेच्छयैव जगत्सर्वं निगरत्युद्गिरत्यपि" इति। विश्वसर्जनमेव पराशक्तेः स्फुरत्ता, १तस्याः २सृष्टिरूपत्वात्। तदा षट्त्रिंशत्तत्त्वा- त्मकविश्वसृष्टिकाले चक्रस्य विश्वमयस्य परदेवताचक्रस्य संभवः। एतदेवाह— शून्याकाराद् विसर्गान्ताद् ३बिन्दोः प्रस्पन्दसंविदः ॥१०॥ शून्यश्चासावाकारश्चेति शून्याकारः। शून्यत्वं पुनरत्र निरस्तनिखिल- प्रपञ्चत्वात्। अत एव परमशिवः। तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्—"अकारः सर्व- उदासीन रहता है। यह शक्ति ही विश्व का रूप धारण करती है। इसीलिये यह विश्व- रूपिणी कहलाती है। श्वेताश्वतर श्रुति में कहा भी गया है— उस परमशिव स्वरूप ब्रह्म का न कोई कार्य है और न कारण ही। उसके समान और उससे अधिक भी कोई नहीं दिखाई पड़ता। इस ब्रह्म की स्वाभाविक परा शक्ति ही ज्ञान, बल, क्रिया आदि नाना स्वरूपों में सुनाई पड़ती है, भासित होती रहती है॥ आज्ञावतार शास्त्र में भी बताया गया है—"यह शक्ति अपनी इच्छा से ही इस जगत् को निगलती और उगलती रहती है"। विश्व का यह सृष्टि-व्यापार ही परा शक्ति की स्फुरत्ता है, क्योंकि शक्ति की स्फुरत्ता को ही सृष्टि कहा जाता है। जब शक्ति की स्फुरता से ३६ तत्त्वात्मक जगत् की सृष्टि होने लगती है, तभी इस विश्वमय पर- देवतात्मक श्रीचक्र की भी उत्पत्ति होता है ॥९॥ श्रीचक्र की यह निष्पत्ति इस क्रम से होती है— शून्यस्वरूप अकार और विसर्ग (हकार) के समष्टि बिन्दु में बैन्दव चक्र की प्रतीति होती है ॥१०॥ 'शून्याकार'१ शब्द में कर्मधारय समास है। इसका अर्थ होगा शून्यस्वरूप अकार। अकार को शून्य यहाँ इसलिये कहा गया है कि यह समस्त जागतिक प्रपंच से ऊपर है। १. 'तस्याः' नास्ति-ज.। २. विश्वसृष्टि-ख.। ३. बिन्दुप्रस्यन्द-ख. ग. घ. ने. ज. उ. । १. यहाँ दीपिका की सहायता से मूल ग्रन्थ का अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाता। भास्करराय ने 'शून्याकारात्' से लेकर 'बैन्दवं चक्रम्' पर्यन्त ग्रन्थ की एक साथ व्याख्या की है। यहाँ शून्याकारात्, विसर्गान्तात्, प्रस्पन्दसंविदः, प्रकाशपरमार्थत्वात् और स्फुरत्तालहरी- युतात्—ये पाँच पद विशेषण तथा 'बिन्दोः' पद विशेष्य है। सभी पद बहुव्रीहि समासान्त हैं। अतः शून्याकार शब्द में भी कर्मधारय समास की आवश्यकता नहीं है।