योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५ परमशिवात् तत्त्वक्रमेण प्रसरः, तादृशं चक्रावतारम् । अनघे परशिष्यत्वादि- दोषरहिते । तव प्रकाशात्मनो ममांशभूताया विमर्शशक्तेः । कथयामि हृदयङ्गमंतां नयामीत्यर्थः । १'ननु कथमक्रियात् परमशिवात् तत्त्वमयं चक्रं संभवतीत्यत आह— यदा सा परमा शक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी ॥९॥ स्फुरत्तामात्मनः पश्येत् तदा चक्रस्य संभवः । यदा यस्मिन् काले प्राणिनामदृष्टवशात् स्वान्तःसंहृतविश्वसिसृक्षया सैव परा शक्तिर्विमर्शरूपिणी स्वेच्छया २विश्वरूपिणी३ विश्वं सृजति, शिवस्तटस्थ उदासीन इत्यर्थः । अत्र श्रुतिः— प्रस्तुत स्थल में विश्वोत्तीर्ण१ प्रकाशात्मक परमशिव से इस चक्र का ३६ तत्त्वों के क्रम से जो प्रसार होता है, उसी को यहाँ अवतार कहा गया है । 'अनघे' इस विशेषण से यह तात्पर्य निकलता है कि इस ज्ञान को सुनने वाली देवी पूर्वोक्त परशिष्य आदि दोषों से रहित है । हे देवि ! तुम मुझ प्रकाशात्मक शिव की अंशभूत विमर्श शक्ति हो, अतः तुम्हारे हृदय में मैं इस बात को पूरी तरह से बैठा देना चाहता हूँ ॥ यहाँ प्रश्न उठता है कि क्रियाशून्य परमशिव से तत्त्वमय श्रीचक्र की उत्पत्ति कैसे हो सकती हैं ? भैरव इसका उत्तर देते हैं— यह विश्वरूपिणी परमा शक्ति अपनी इच्छा से जब स्फुरत्ता का दर्शन करती है, तो इस श्रीचक्र की निष्पत्ति होती है ॥९॥ जिस समय प्राणियों के अदृष्ट के कारण अपने भीतर समेटे हुए विश्व की यह विमर्श- रूपिणी परा शक्ति अपनी इच्छा से सृष्टि करना चाहती है, उस समय शिव तटस्थ, १. 'ननु' नास्ति-ख. झ. । २. 'विश्वरूपिणो' नास्ति-ख. ने. । ३. 'आत्मनः स्फुरणं पश्येत्' अधिकम्-ग. घ. उ. ।
- प्रत्यभिज्ञाहृदय के ८ वें सूत्र की व्याख्या करते समय क्षेमराज कहते हैं— “विश्वोत्तीर्णमात्मतत्त्वमिति तान्त्रिकाः, विश्वमयमिति कुलाद्याम्नायनिविष्टाः, विश्वोत्तीर्णं विश्वमयं चेति त्रिकादिदर्शनविदः” । अभिनवगुप्त, क्षेमराज आदि ने तान्त्रिक शब्द का प्रयोग सिद्धान्त, वाम, दक्ष, भूत और गरुड नामक पञ्चप्रवाह शास्त्र के अनुयायियों के लिये किया है । प्रधानतः द्वैतवादी सिद्धान्त शैव पञ्चकृत्यकारी पञ्चमन्त्रतनु भगवान् शिव को विश्वोत्तीर्ण, विश्व से ऊपर मानते हैं । कुल, कौल और मत दर्शन के अनुयायी स्वात्मदेवतावाद के पोषक हैं । अतः इनकी दृष्टि में परतत्त्व विश्वमय है । त्रिक और क्रम मत के अनुसार तत्त्वातीत परमशिव अथवा भगवती संवित् विश्वोत्तीर्ण है । ये ही जब विश्वरूप में भासित होते हैं, तो विश्वमय बन जाते हैं । त्रिपुरा सम्प्रदाय के आचार्यों ने अन्तिम मत का अनुसरण किया है । यहीं आगे (१।४९-५०) देखिये । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)