भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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१४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः तत्रादौ१ चक्रसंकेतं वक्तुमुपक्रमते— तच्छक्तिपञ्चकं सृष्ट्या लयेनाग्निचतुष्टयम् । पञ्चशक्तिचतुर्वह्निसंयोगाच्चक्रसंभवः ॥८॥ तच्चक्रं सृष्ट्या सृष्टिरूपेण शक्तिपञ्चकम्, स्वाभिमुखाग्रत्रिकोणं शक्तिरुच्यते, तादृशं शक्तिपञ्चकम् । लयेनाग्निचतुष्टयं लयेन संहाररूपेण अग्निः, पराङ्मुखा- ग्रत्रिकोणमग्निरुच्यते, तच्चतुष्टयम् । एवं पञ्चशक्तीनां चतुर्वह्नीनां च संयोगात्, सम्यग् योगः संयोगः, "शक्त्या शक्तिं विनिर्भिद्य" (१।२९) इत्यादिश्चतुश्शती- शास्त्रोक्तरीत्या ग्रन्थिभेदक्रमेण समत्रिकोणशक्त्यग्रं समरेखं यथा भवति तथा लेखनं संयोगः, तस्मात् । चक्रस्य संभवो भवति ॥८॥ सामान्यतश्चक्रसमुदायमुत्पाद्य इदानीमवयवशश्चक्रसंभवं प्रतिजानीते— एतच्चक्रावतारं तु कथयामि तवानघे । एतस्य श्रीमहात्रिपुरसुन्दर्याश्चक्रस्य पूजाचक्रस्यावतारम्, अवतारो नाम लोके सौधाद्युन्नतप्रदेशान्निम्नप्रदेशप्राप्तिः, अत्र तु विश्वोत्तरात्२ प्रकाशात्मनः अब पहले चक्रसंकेत का उपदेश किया जाता है— पांच शक्तियों और चार वह्नियों के संयोग से श्रीचक्र का स्वरूप बनता है। यह संयोग शक्तियों का सृष्टिक्रम से और वह्नियों का लयक्रम से होना चाहिये ॥८॥ इस श्रीचक्र में सृष्टिक्रम से पाँच शक्तियां रहती हैं। त्रिकोण का अग्रभाग यदि अपनी तरफ हो तो उसे शक्ति कहा जाता है। चक्र में ऐसी स्वाभिमुख त्रिकोण वालो पांच शक्तियाँ रहती हैं। यहाँ संहार क्रम से चार वह्नियां रहती हैं। त्रिकोण का अग्र- भाग यदि विपरीत दिशा में हो तो उसे वह्नि कहते हैं। चक्र में पराङ्मुख त्रिकोण वाली चार वह्नियां रहती हैं। इस तरह से पाँच शक्ति और चार वह्नि के सम्यक् योग से अर्थात् नित्याषोडशिकार्णव के "शक्त्या शक्तिम्" (१।२९) इत्यादि श्लोकों में बताई गई विधि से ग्रन्थिभेद के क्रम में समत्रिकोण शक्त्यग्र समरेख चक्र के लेखन से ही पाँच शक्तियों और चार वह्नियों का संयोग होता है और इससे चक्र का स्वरूप बनता है ॥८॥ इस तरह से मोटा-मोटी श्रीचक्र का स्वरूप बन जाता है। अब एक-एक कर अवान्तर चक्रों की निर्माण की प्रक्रिया बतायी जा रही है— हे अनघे ! इस श्रीचक्र की अवतार की पद्धति को अब मैं तुमको कह रहा हूँ ॥ इस तरह से भगवती श्रीमहात्रिपुरसुन्दरी के इस पूजाचक्र का अवतार होता है। लोक में प्रासाद आदि उन्नत स्थल से नीचे उतरने की क्रिया को अवतार कहा जाता है। १. अत्रादौ-ख. ने. ज. झ. उ. । २. तत्त्वात्-क. ग. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)