भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १३ एतज्ज्ञानविहीनस्य फलवैपरीत्यमाह— यावदेतन्न जानाति संकेतत्रयमुत्तमम् । न तावत् त्रिपुराचक्रे परमाज्ञाधरो भवेत् ॥७॥ यावद् एतद् वक्ष्यमाणं संकेतत्रयं यो न जानाति स तावत् त्रिपुरायाः परायाः १ स्वसंविदश्चक्रे मातृमानमेयलक्षणे तत्त्वसमूहे परमाज्ञाधरो न भवेत् । आज्ञा नाम निग्रहानुग्रहसामर्थ्यम् । तदाज्ञामपि लोकेऽस्ति । तदुच्यते—परमेति । परमा सर्व- लोकेष्वप्रतिहता आज्ञा परमेश्वरस्यैव । २परमाज्ञाधरः परमेश्वरो भवेत् । य एतद् विजानाति स सद्यः खेचरतां व्रजेत्, यो नैतद् विजानाति स न ३तद्भावं व्रजेदित्यन्वयव्यतिरेक४सिद्धमित्यर्थः । अत्रैतत्प्रयोजनकीर्तनमधिकारिविषयसंबन्धा- नामप्युपलक्षणम् । मुमुक्षुरधिकारी, स्वसंविद्देवता विषयः, मोक्षः प्रयोजनम्, प्रतिपाद्यप्रतिपादकभावः संबन्धः ॥७॥ इन तीन संकेतों से अपरिचित व्यक्ति विपरीत फल का भागी होता है— जब तक व्यक्ति इन उत्तम कोटि के तीन संकेतों को नहीं जानता, तब तक त्रिपुराचक्र में उसकी आज्ञा अप्रतिहत रूप से नहीं चल पाती ॥७॥ आगे जिन तीन संकेतों का विस्तार से वर्णन किया जायगा, उनको व्यक्ति जबतक पूरी तरह से समझ नहीं लेता, तबतक वह स्वसंवित्स्वरूपा पराशक्ति त्रिपुरा के चक्र, अर्थात् माता, मान और मेय रूप तत्त्वसमूह में परमाज्ञाधर नहीं हो सकता । निग्रह (नाराजगी) और अनुग्रह (प्रसन्नता) की सामर्थ्य वाले व्यक्ति के वचन को आज्ञा कहा जाता है । लौकिक प्रभु में भी यह सामर्थ्य है, किन्तु वह परम सामर्थ्य नहीं है । यह सर्वत्र अप्रतिहत परम सामर्थ्य केवल परमेश्वर में ही है । जो व्यक्ति इन तीन संकेतों को जानता है, वह परमाज्ञाधर, अर्थात् परमेश्वर हो जाता है । जो इनको जानता है, वह तत्काल खेचर (शिवस्वरूप) बन जाता है; जो नहीं जानता, वह ऐसा नहीं बन सकता । यह बात न्यायदर्शन की अन्वय-व्यतिरेक पद्धति से सिद्ध हो जाती है । इस तरह से यहाँ इस शास्त्र के अध्ययन का प्रयोजन बताया गया है । इससे १अनुबन्धचतुष्टय के अन्य विषयों—अधिकारी, विषय और सम्बन्ध—की भी प्रतीति हो जाती है । मुक्ति की कामना वाला व्यक्ति इस शास्त्र के अध्ययन का अधिकारी है, इस शास्त्र का प्रतिपाद्य विषय स्वसंविद्देवता भगवती त्रिपुरा है, मोक्ष की प्राप्ति इसका प्रयोजन है और इनमें परस्पर प्रतिपाद्यप्रतिपादकभाव सम्बन्ध है ॥७॥ १. 'परायाः' नास्ति-क. ख. । २. यः परमाज्ञाधरः स एव परमेश्वरः-क. ने. । ३. खेचरतां-क. । ४. रेखाभ्यां-क. ग. । १. अनुबन्धचतुष्टय शब्द के अभिप्राय को विज्ञानभैरव के भाषानुवाद (पृ० १-३) में स्पष्ट कर दिया गया है ।