भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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१२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः शास्त्रमारभते— चक्रसंकेतको मन्त्रपूजासंकेतकौ² तथा। त्रिविधस्त्रिपुरादेव्याः संकेततः परमेश्वरि ॥६॥ संकेतवत् संकेतकः। संकेत: समयः। यथा कृतसमयो कामिनीकामुकौ यत्र क्वापि निवसत:, एवमस्मिन् शिवाविति। चक्रसंकेतकः, मन्त्रसंकेतकः, पूजासंके- तकः—एवं त्रिविधः संकेत:। त्रिपुरादेव्या धाम-तत्त्व-पीठ-लिङ्ग-मातृकादिभ्य- स्त्रिभ्योऽपि पूरा या विद्यते सा त्रिपुरा³ देवी प्रकाशविमर्शसामरस्यरूपिणी परा। अस्यास्त्रिविधः संकेत:। परमेश्वरि परममुत्कृष्टमिन्द्रादिभिरपि परिपाल्यमान- मैश्वर्यमाज्ञा यस्याः। तदुक्तं वेदरहस्ये— भीषाऽस्माद् वातः पवते भीषोदेति सूर्यः। भीषाऽस्मादग्निश्चेन्द्रश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः॥ (तै० उ० २।८) इति ॥६॥ प्रवीण साधक की आत्मा उस आत्मतत्त्व को जान लेने के बाद फिर कभी पाप कर्म में लिप्त नहीं होती ॥५॥ इस संक्षिप्त विवेचन के साथ अब शास्त्र का प्रारम्भ होता है— हे परमेश्वरि ! चक्रसंकेत, मन्त्रसंकेत तथा पूजासंकेत—यह त्रिविध त्रिपुरा देवी का संकेत है ॥६॥ श्लोक में संकेत के ही अर्थ में संकेतक शब्द प्रयुक्त है। संकेत का अर्थ है समय। जैसे पहले से निश्चित स्थान और समय पर कामिनी और कामुक मिलते हैं, उसी तरह इस त्रिविध संकेत में भगवान् शिव और शक्ति समरस रूप में निवास करते हैं। चक्र- संकेत, मन्त्रसंकेत और पूजासंकेत—यह तीन प्रकार का संकेत है। धाम, तत्त्व, पीठ, लिङ्ग, मातृका आदि के शास्त्रों में तीन-तीन भेद बताये जाते हैं। इन तीनों भेदों से जो पहले विद्यमान है, उसे त्रिपुरा कहते हैं। यही प्रकाश और विमर्श स्वरूप को समरस रूप में रखने वाली परा देवी है। इसको प्राप्त करने के तीन प्रकार हैं। परमेश्वरी का अर्थ है परम ऐश्वर्य वाली। इन्द्र प्रभृति उत्कृष्ट देवगण भी इसकी आज्ञा का पालन करते हैं। जैसा कि तैत्तिरीयोपनिषद् में कहा गया है— इसी के भय से पवन बहता है, सूर्य उगता है और इसी के भय से अग्नि और इन्द्र अपना-अपना कार्य करते हैं तथा पाँचवाँ देव मृत्यु (यमराज) भी इसी के भय से इधर-उधर दौड़ता रहता है ॥६॥ १. मन्त्रः—ख. ने. उ.। २. कस्तथा—ख. ग. घ. ने. झ. उ.। ३. 'त्रिपुरा' नास्ति—ग. घ. ने. ज. झ.। मोतीलाल बनारसीदास के यहाँ से प्रकाशित उपनिषत्संग्रह के द्वितीय खण्ड में संगृहीत तैत्तिरीयोपनिषद्, भृगुवल्ली के आठवें अनुवाक में इस प्रकार पाठ है—