योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] Deepikaभाषानुवादसहितम् ११ उक्तार्थमेव द्रढयन् शिष्यप्रवृत्तये फलमाह— एतज्ज्ञात्वा वरारोहे सद्यः खेचरतां व्रजेत् ॥५॥ अस्य तु महार्थत्वात् परीक्षितायैव देयम्। एतस्य परिज्ञानेनैव शिष्यः खेच- रतां खे परमव्योम्नि चरतीति खेचरः शिवः। तदुक्तं चिद्गगनचन्द्रिकायाम्— दृक्क्रियात्मशशिभानुमध्यगं १ खे चरत्यनलदृष्टिधाम २ यत्। यत्तदूर्ध्वशिखरं परं नभस्तत्र दर्शय शिवं त्वमम्बिके ॥ (श्लो० ३२) इति। सद्यस्तत्त्वं व्रजेत्, जीवन्मुक्तो भवेदित्यर्थः। तदुक्तं वेदरहस्ये—"तस्यैवात्मा पदैवित्तं विदित्वा न कर्मणा लिप्यते पापकेन" (इ० उ० २०) इति ॥५॥ इसी विषय की पुष्टि करते हुए और शिष्य की जिज्ञासावृत्ति को जगाने के लिये इस ज्ञान की फलश्रुति आगे के श्लोकार्ध में दी गई है— हे वरारोहे, योगिनीहृदय में उपदिष्ट ज्ञान को प्राप्त कर व्यक्ति तत्काल खेचरता को प्राप्त कर लेता है ॥५॥ यह ज्ञान महार्थ (बहुमूल्य) हैं, अतः परीक्षित शिष्य को ही इसका उपदेश करना चाहिये। इसके जान लेने मात्र से शिष्य खेचर, अर्थात् परम व्योम में विचरण करने वाला परमशिव बन जाता है, जैसा कि १चिद्गगनचन्द्रिका में कहा गया है— ज्ञान और क्रियाशक्ति स्वरूप चन्द्र और सूर्य के बीच में, अर्थात् दक्षिण और वाम नेत्र के बीच में भ्रूमध्यस्थित शून्य बिन्दु में जो अग्निस্বরূপ तृतीय नेत्रधाम, अर्थात् ज्ञानचक्षु विराजमान है, उस तृतीय ज्ञाननेत्र के खुल जाने पर साधक के चित्त में नाद- रूपी ऊर्ध्व शिखर परमव्योम को देख पाने की सामर्थ्य आ जाती है। ओ माँ, तुम मुझे वहाँ भगवान् शिव का दर्शन कराओ॥ इस प्रकार परम व्योम में प्रवेश पा जाने पर साधक तत्काल शिव बन जाता है, अर्थात् जीवन्मुक्त हो जाता है। इस विषय में वेदरहस्य २ का भी कहना है कि पद-वाक्य १. मध्यगे-क., मध्यगः-ख. ग. घ. ने. झ. उ.। २. धाम्नि यः-क. ख. ब.। ३. पदवित् तं-ख. ग. घ. ने. ज., पर-क.। १. चिद्गगनचन्द्रिका (मूलमात्र) आगमानुसन्धान समिति, कलकत्ता से सन् १९३६ में छपी थी। यह क्रम-सम्प्रदाय का एक जटिल ग्रन्थ है। बाद में श्री कर्रा अग्निहोत्र शास्त्री की टीका के साथ सन् १९४३ में यह ग्रन्थ आन्ध्रप्रदेश के पूर्व गोदावरी जिले से प्रकाशित हुआ। अभी हाल में स्व० पण्डित रघुनाथ मिश्र की टीका के साथ यह ग्रन्थ सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से प्रकाशित हुआ है। २. वेदरहस्य नाम का कोई संहितातुल्य ग्रन्थ है। उसका एक इतिहासप्रसिद्ध...