भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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१० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेत न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् । जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन् ॥ (३।२६) इति । न १ शुश्रूषालसानां च । ये शुश्रूषालसास्तेभ्यो न देयम्, येऽनर्थप्रदायिनस्तेभ्यो- ऽपि । शुश्रूषालसा अपि ये २ धनं वितरन्ति तेभ्यो देयम्, ये च शुश्रूषालसाश्च धनमपि न वितरन्ति तेभ्यो न देयमित्यर्थः । तदुक्तम्— गुरुशुश्रूषया विद्या पुष्कलेन धनेन वा । अथवा विद्यया विद्या ३ चतुर्थो नैव विद्यते ॥४॥ परीक्ष्याऽर्हाय देयमित्याह— परीक्षिताय दातव्यं वत्सराधोषित्याय च । परशिष्यत्वादिदोषपरीक्षणं वत्सरार्धेन सहवासेन कर्तुं शक्यते, गुरोर्विवेकि- त्वात् । ज्ञानी पुरुष को चाहिये कि वह शास्त्रविहित कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम न उत्पन्न करे, किन्तु स्वयं शास्त्र-विहित समस्त कर्म भलीभाँति करता हुआ उनसे भी वैसा ही करने को कहे ॥ जो व्यक्ति गुरु की सेवा करने में आलस्य करते हों और जो धन भी न देते हों, ऐसे व्यक्तियों को भी यह ज्ञान नहीं देना चाहिये । सेवा करने में आलसी व्यक्ति यदि धन देते हों तो उनको यह ज्ञान दिया जा सकता है, किन्तु जो व्यक्ति सेवा करने में आलसी हैं ही, धन भी नहीं देते, उनको यह ज्ञान नहीं देना चाहिये । कहा भी गया है— गुरु की सेवा करने से विद्या प्राप्त होती है अथवा पर्याप्त धन देने से भी यह प्राप्त हो सकती है । अथवा एक विद्या के बदले में भी दूसरी विद्या प्राप्त हो सकती है । इन तीन उपायों को छोड़कर विद्या प्राप्ति का १ चौथा कोई उपाय नहीं है ॥४॥ परीक्षा कर लेने के उपरान्त योग्य शिष्य को ही यह ज्ञान देना चाहिये— छः मास तक अपने पास रह रहे शिष्य की पूरी तरह से परीक्षा कर लेने पर ही उसको यह ज्ञान देना चाहिये । छः मास तक शिष्य के अपने पास रहने पर उसमें ऊपर बताये गये परशिष्य आदि दोष हैं कि नहीं, इस बात की परीक्षा विवेकी गुरु भलीभाँति कर सकता है । १. नाशुश्रूषारतानां-ख. ज. झ. उ. । २. धनं चेत्-ख. ज. झ. ने. उ. । ३. चतुर्थं नैव दृश्यते-ग० घ० ने० उ० ।

  1. नित्याषोडशिकार्णव की ऋजुविमर्शिनी व्याख्या (पृ० ९७) में संहिताब्राह्मण का एक श्लोक उद्धृत किया गया है । वहाँ ब्रह्मचारी, धनदायी, मेधावी, श्रोत्रिय, प्रिय व्यक्ति और विद्या के बदले विद्या देने वाला व्यक्ति—ये छः विद्याप्राप्ति के अधिकारी माने गये हैं ।