योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ९ कुलगुरुं सम्यङ् न गुर्वन्तरमाश्रयेत्'' (कुला० १३।१३०) इत्यादिवचनात् तैरपि¹ न ग्राह्यम् । ये विद्यान्तरेषु पारम्पर्यक्रमेणानधिगताशेषरहस्य²परमार्था अप्राप्त- पूर्णाभिषेकाश्च तेभ्यो देयम्, तैरपि ग्राह्यम् । ³मधुलुब्धो यथा भृङ्गः पुष्पात् पुष्पान्तरं व्रजेत् । ज्ञानलुब्धस्तथा शिष्यो गुरोर्गुर्वन्तरं व्रजेत् ॥ (कुला० १३।१३२) इति वचनान्न ते परशिष्याः, “पूर्णाभिषेककर्ता यो गुरुस्तस्यैव पादुका⁴" (कुला० १३।१२९) इति वचनाच्च । नास्तिकेभ्यः । नास्ति परलोक इति ये ⁵मन्वते ते नास्तिकाः श्रद्धाविहीनाः । धनधान्याद्यपेक्षया तेषां रुचिमुत्पाद्य न देय- मित्यर्थः । तदुक्तं भगवद्गीतासु— जाते हैं। ऐसे परशिष्यों को यह ज्ञान न दिया जाय। "कुलगुरु की सम्यक् प्राप्ति हो जाने पर फिर दूसरा गुरु नहीं करना चाहिये" इस शास्त्रवचन के आधार पर उनको भी अन्य गुरु से ज्ञान की प्राप्ति के लिये प्रयत्न नहीं करना चाहिये। जो व्यक्ति अन्य सम्प्रदायों में गुरु-परम्परा के क्रम से दीक्षित नहीं हुए हैं, इसीलिये अन्य सम्प्रदायों के रहस्यों से जो परिचित नहीं हो सके हैं और जिनका उस उस सम्प्रदाय में अभिषेक भी नहीं हुआ है, उनको यह ज्ञान दिया जाय। वे इस ज्ञान के अधिकारी हैं। मधु (शहद) का लोभी भृंग (भँवरा) जैसे एक पुष्प को छोड़कर दूसरे पुष्प के पास पहुँच जाता है, उसी तरह से ज्ञान का लोभी शिष्य भी एक गुरु को छोड़कर दूसरे गुरु के पास पहुँच जाय¹ ॥ इस वचन के आधार पर ऐसा व्यक्ति परशिष्य नहीं कहा जायगा। फिर शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि "जो गुरु पूर्णाभिषेक करता है, शिष्य को उसी की पादुका की पूजा करनी चाहिये।" जो व्यक्ति परलोक को नहीं मानते, वे नास्तिक कहलाते हैं। ऐसे व्यक्तियों में श्रद्धा का अभाव रहता है। ऐसे व्यक्तियों में धन-धान्य आदि का प्रलो- भन देकर रुचि नहीं जगानी चाहिये। भगवद्गीता में कहा भी गया है— १. 'तैरपि न ग्राह्यम्' इति पाठो लब्ध्वेत्युद्धरणात् पूर्वं स्थापितः-ख. घ. ज. झ. । २. 'रहस्य' नास्ति-क. ग. घ. । ३. गन्ध-घ. ने. ज. झ. उ. । ४. काम्-ग. घ. ने. ज. झ. उ. । ५. मन्यन्ते-क. उ. ।
- यह श्लोक कुलार्णव तन्त्र में मिलता है और तन्त्रालोक (२२।४५-४६) में भी उपलब्ध है। कुलार्णव तन्त्र के एक (घृणा शङ्का०) श्लोक को अमृतानन्द (१।७२) अभि- युक्तवचन कह कर उद्धृत करते हैं। क्षेमराज द्वारा नेत्रोद्योत (पृ० ११४-११५, १५८ दिल्ली संस्करण) में उल्लिखित कुलार्णव के वचन प्रकाशित ग्रन्थ में नहीं मिलते। अतः निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता है कि अमृतानन्द ने ये वचन कहाँ से लिये हैं।