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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ९ कुलगुरुं सम्यङ् न गुर्वन्तरमाश्रयेत्'' (कुला० १३।१३०) इत्यादिवचनात् तैरपि¹ न ग्राह्यम् । ये विद्यान्तरेषु पारम्पर्यक्रमेणानधिगताशेषरहस्य²परमार्था अप्राप्त- पूर्णाभिषेकाश्च तेभ्यो देयम्, तैरपि ग्राह्यम् । ³मधुलुब्धो यथा भृङ्गः पुष्पात् पुष्पान्तरं व्रजेत् । ज्ञानलुब्धस्तथा शिष्यो गुरोर्गुर्वन्तरं व्रजेत् ॥ (कुला० १३।१३२) इति वचनान्न ते परशिष्याः, “पूर्णाभिषेककर्ता यो गुरुस्तस्यैव पादुका⁴" (कुला० १३।१२९) इति वचनाच्च । नास्तिकेभ्यः । नास्ति परलोक इति ये ⁵मन्वते ते नास्तिकाः श्रद्धाविहीनाः । धनधान्याद्यपेक्षया तेषां रुचिमुत्पाद्य न देय- मित्यर्थः । तदुक्तं भगवद्गीतासु— जाते हैं। ऐसे परशिष्यों को यह ज्ञान न दिया जाय। "कुलगुरु की सम्यक् प्राप्ति हो जाने पर फिर दूसरा गुरु नहीं करना चाहिये" इस शास्त्रवचन के आधार पर उनको भी अन्य गुरु से ज्ञान की प्राप्ति के लिये प्रयत्न नहीं करना चाहिये। जो व्यक्ति अन्य सम्प्रदायों में गुरु-परम्परा के क्रम से दीक्षित नहीं हुए हैं, इसीलिये अन्य सम्प्रदायों के रहस्यों से जो परिचित नहीं हो सके हैं और जिनका उस उस सम्प्रदाय में अभिषेक भी नहीं हुआ है, उनको यह ज्ञान दिया जाय। वे इस ज्ञान के अधिकारी हैं। मधु (शहद) का लोभी भृंग (भँवरा) जैसे एक पुष्प को छोड़कर दूसरे पुष्प के पास पहुँच जाता है, उसी तरह से ज्ञान का लोभी शिष्य भी एक गुरु को छोड़कर दूसरे गुरु के पास पहुँच जाय¹ ॥ इस वचन के आधार पर ऐसा व्यक्ति परशिष्य नहीं कहा जायगा। फिर शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि "जो गुरु पूर्णाभिषेक करता है, शिष्य को उसी की पादुका की पूजा करनी चाहिये।" जो व्यक्ति परलोक को नहीं मानते, वे नास्तिक कहलाते हैं। ऐसे व्यक्तियों में श्रद्धा का अभाव रहता है। ऐसे व्यक्तियों में धन-धान्य आदि का प्रलो- भन देकर रुचि नहीं जगानी चाहिये। भगवद्गीता में कहा भी गया है— १. 'तैरपि न ग्राह्यम्' इति पाठो लब्ध्वेत्युद्धरणात् पूर्वं स्थापितः-ख. घ. ज. झ. । २. 'रहस्य' नास्ति-क. ग. घ. । ३. गन्ध-घ. ने. ज. झ. उ. । ४. काम्-ग. घ. ने. ज. झ. उ. । ५. मन्यन्ते-क. उ. ।

  1. यह श्लोक कुलार्णव तन्त्र में मिलता है और तन्त्रालोक (२२।४५-४६) में भी उपलब्ध है। कुलार्णव तन्त्र के एक (घृणा शङ्का०) श्लोक को अमृतानन्द (१।७२) अभि- युक्तवचन कह कर उद्धृत करते हैं। क्षेमराज द्वारा नेत्रोद्योत (पृ० ११४-११५, १५८ दिल्ली संस्करण) में उल्लिखित कुलार्णव के वचन प्रकाशित ग्रन्थ में नहीं मिलते। अतः निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता है कि अमृतानन्द ने ये वचन कहाँ से लिये हैं।

१० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेत न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् । जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन् ॥ (३।२६) इति । न १ शुश्रूषालसानां च । ये शुश्रूषालसास्तेभ्यो न देयम्, येऽनर्थप्रदायिनस्तेभ्यो- ऽपि । शुश्रूषालसा अपि ये २ धनं वितरन्ति तेभ्यो देयम्, ये च शुश्रूषालसाश्च धनमपि न वितरन्ति तेभ्यो न देयमित्यर्थः । तदुक्तम्— गुरुशुश्रूषया विद्या पुष्कलेन धनेन वा । अथवा विद्यया विद्या ३ चतुर्थो नैव विद्यते ॥४॥ परीक्ष्याऽर्हाय देयमित्याह— परीक्षिताय दातव्यं वत्सराधोषित्याय च । परशिष्यत्वादिदोषपरीक्षणं वत्सरार्धेन सहवासेन कर्तुं शक्यते, गुरोर्विवेकि- त्वात् । ज्ञानी पुरुष को चाहिये कि वह शास्त्रविहित कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम न उत्पन्न करे, किन्तु स्वयं शास्त्र-विहित समस्त कर्म भलीभाँति करता हुआ उनसे भी वैसा ही करने को कहे ॥ जो व्यक्ति गुरु की सेवा करने में आलस्य करते हों और जो धन भी न देते हों, ऐसे व्यक्तियों को भी यह ज्ञान नहीं देना चाहिये । सेवा करने में आलसी व्यक्ति यदि धन देते हों तो उनको यह ज्ञान दिया जा सकता है, किन्तु जो व्यक्ति सेवा करने में आलसी हैं ही, धन भी नहीं देते, उनको यह ज्ञान नहीं देना चाहिये । कहा भी गया है— गुरु की सेवा करने से विद्या प्राप्त होती है अथवा पर्याप्त धन देने से भी यह प्राप्त हो सकती है । अथवा एक विद्या के बदले में भी दूसरी विद्या प्राप्त हो सकती है । इन तीन उपायों को छोड़कर विद्या प्राप्ति का १ चौथा कोई उपाय नहीं है ॥४॥ परीक्षा कर लेने के उपरान्त योग्य शिष्य को ही यह ज्ञान देना चाहिये— छः मास तक अपने पास रह रहे शिष्य की पूरी तरह से परीक्षा कर लेने पर ही उसको यह ज्ञान देना चाहिये । छः मास तक शिष्य के अपने पास रहने पर उसमें ऊपर बताये गये परशिष्य आदि दोष हैं कि नहीं, इस बात की परीक्षा विवेकी गुरु भलीभाँति कर सकता है । १. नाशुश्रूषारतानां-ख. ज. झ. उ. । २. धनं चेत्-ख. ज. झ. ने. उ. । ३. चतुर्थं नैव दृश्यते-ग० घ० ने० उ० ।

  1. नित्याषोडशिकार्णव की ऋजुविमर्शिनी व्याख्या (पृ० ९७) में संहिताब्राह्मण का एक श्लोक उद्धृत किया गया है । वहाँ ब्रह्मचारी, धनदायी, मेधावी, श्रोत्रिय, प्रिय व्यक्ति और विद्या के बदले विद्या देने वाला व्यक्ति—ये छः विद्याप्राप्ति के अधिकारी माने गये हैं ।

प्रथमः ] Deepikaभाषानुवादसहितम् ११ उक्तार्थमेव द्रढयन् शिष्यप्रवृत्तये फलमाह— एतज्ज्ञात्वा वरारोहे सद्यः खेचरतां व्रजेत् ॥५॥ अस्य तु महार्थत्वात् परीक्षितायैव देयम्। एतस्य परिज्ञानेनैव शिष्यः खेच- रतां खे परमव्योम्नि चरतीति खेचरः शिवः। तदुक्तं चिद्गगनचन्द्रिकायाम्— दृक्क्रियात्मशशिभानुमध्यगं १ खे चरत्यनलदृष्टिधाम २ यत्। यत्तदूर्ध्वशिखरं परं नभस्तत्र दर्शय शिवं त्वमम्बिके ॥ (श्लो० ३२) इति। सद्यस्तत्त्वं व्रजेत्, जीवन्मुक्तो भवेदित्यर्थः। तदुक्तं वेदरहस्ये—"तस्यैवात्मा पदैवित्तं विदित्वा न कर्मणा लिप्यते पापकेन" (इ० उ० २०) इति ॥५॥ इसी विषय की पुष्टि करते हुए और शिष्य की जिज्ञासावृत्ति को जगाने के लिये इस ज्ञान की फलश्रुति आगे के श्लोकार्ध में दी गई है— हे वरारोहे, योगिनीहृदय में उपदिष्ट ज्ञान को प्राप्त कर व्यक्ति तत्काल खेचरता को प्राप्त कर लेता है ॥५॥ यह ज्ञान महार्थ (बहुमूल्य) हैं, अतः परीक्षित शिष्य को ही इसका उपदेश करना चाहिये। इसके जान लेने मात्र से शिष्य खेचर, अर्थात् परम व्योम में विचरण करने वाला परमशिव बन जाता है, जैसा कि १चिद्गगनचन्द्रिका में कहा गया है— ज्ञान और क्रियाशक्ति स्वरूप चन्द्र और सूर्य के बीच में, अर्थात् दक्षिण और वाम नेत्र के बीच में भ्रूमध्यस्थित शून्य बिन्दु में जो अग्निस্বরূপ तृतीय नेत्रधाम, अर्थात् ज्ञानचक्षु विराजमान है, उस तृतीय ज्ञाननेत्र के खुल जाने पर साधक के चित्त में नाद- रूपी ऊर्ध्व शिखर परमव्योम को देख पाने की सामर्थ्य आ जाती है। ओ माँ, तुम मुझे वहाँ भगवान् शिव का दर्शन कराओ॥ इस प्रकार परम व्योम में प्रवेश पा जाने पर साधक तत्काल शिव बन जाता है, अर्थात् जीवन्मुक्त हो जाता है। इस विषय में वेदरहस्य २ का भी कहना है कि पद-वाक्य १. मध्यगे-क., मध्यगः-ख. ग. घ. ने. झ. उ.। २. धाम्नि यः-क. ख. ब.। ३. पदवित् तं-ख. ग. घ. ने. ज., पर-क.। १. चिद्गगनचन्द्रिका (मूलमात्र) आगमानुसन्धान समिति, कलकत्ता से सन् १९३६ में छपी थी। यह क्रम-सम्प्रदाय का एक जटिल ग्रन्थ है। बाद में श्री कर्रा अग्निहोत्र शास्त्री की टीका के साथ सन् १९४३ में यह ग्रन्थ आन्ध्रप्रदेश के पूर्व गोदावरी जिले से प्रकाशित हुआ। अभी हाल में स्व० पण्डित रघुनाथ मिश्र की टीका के साथ यह ग्रन्थ सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से प्रकाशित हुआ है। २. वेदरहस्य नाम का कोई संहितातुल्य ग्रन्थ है। उसका एक इतिहासप्रसिद्ध...

१२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः शास्त्रमारभते— चक्रसंकेतको मन्त्रपूजासंकेतकौ² तथा। त्रिविधस्त्रिपुरादेव्याः संकेततः परमेश्वरि ॥६॥ संकेतवत् संकेतकः। संकेत: समयः। यथा कृतसमयो कामिनीकामुकौ यत्र क्वापि निवसत:, एवमस्मिन् शिवाविति। चक्रसंकेतकः, मन्त्रसंकेतकः, पूजासंके- तकः—एवं त्रिविधः संकेत:। त्रिपुरादेव्या धाम-तत्त्व-पीठ-लिङ्ग-मातृकादिभ्य- स्त्रिभ्योऽपि पूरा या विद्यते सा त्रिपुरा³ देवी प्रकाशविमर्शसामरस्यरूपिणी परा। अस्यास्त्रिविधः संकेत:। परमेश्वरि परममुत्कृष्टमिन्द्रादिभिरपि परिपाल्यमान- मैश्वर्यमाज्ञा यस्याः। तदुक्तं वेदरहस्ये— भीषाऽस्माद् वातः पवते भीषोदेति सूर्यः। भीषाऽस्मादग्निश्चेन्द्रश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः॥ (तै० उ० २।८) इति ॥६॥ प्रवीण साधक की आत्मा उस आत्मतत्त्व को जान लेने के बाद फिर कभी पाप कर्म में लिप्त नहीं होती ॥५॥ इस संक्षिप्त विवेचन के साथ अब शास्त्र का प्रारम्भ होता है— हे परमेश्वरि ! चक्रसंकेत, मन्त्रसंकेत तथा पूजासंकेत—यह त्रिविध त्रिपुरा देवी का संकेत है ॥६॥ श्लोक में संकेत के ही अर्थ में संकेतक शब्द प्रयुक्त है। संकेत का अर्थ है समय। जैसे पहले से निश्चित स्थान और समय पर कामिनी और कामुक मिलते हैं, उसी तरह इस त्रिविध संकेत में भगवान् शिव और शक्ति समरस रूप में निवास करते हैं। चक्र- संकेत, मन्त्रसंकेत और पूजासंकेत—यह तीन प्रकार का संकेत है। धाम, तत्त्व, पीठ, लिङ्ग, मातृका आदि के शास्त्रों में तीन-तीन भेद बताये जाते हैं। इन तीनों भेदों से जो पहले विद्यमान है, उसे त्रिपुरा कहते हैं। यही प्रकाश और विमर्श स्वरूप को समरस रूप में रखने वाली परा देवी है। इसको प्राप्त करने के तीन प्रकार हैं। परमेश्वरी का अर्थ है परम ऐश्वर्य वाली। इन्द्र प्रभृति उत्कृष्ट देवगण भी इसकी आज्ञा का पालन करते हैं। जैसा कि तैत्तिरीयोपनिषद् में कहा गया है— इसी के भय से पवन बहता है, सूर्य उगता है और इसी के भय से अग्नि और इन्द्र अपना-अपना कार्य करते हैं तथा पाँचवाँ देव मृत्यु (यमराज) भी इसी के भय से इधर-उधर दौड़ता रहता है ॥६॥ १. मन्त्रः—ख. ने. उ.। २. कस्तथा—ख. ग. घ. ने. झ. उ.। ३. 'त्रिपुरा' नास्ति—ग. घ. ने. ज. झ.। मोतीलाल बनारसीदास के यहाँ से प्रकाशित उपनिषत्संग्रह के द्वितीय खण्ड में संगृहीत तैत्तिरीयोपनिषद्, भृगुवल्ली के आठवें अनुवाक में इस प्रकार पाठ है—

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १३ एतज्ज्ञानविहीनस्य फलवैपरीत्यमाह— यावदेतन्न जानाति संकेतत्रयमुत्तमम् । न तावत् त्रिपुराचक्रे परमाज्ञाधरो भवेत् ॥७॥ यावद् एतद् वक्ष्यमाणं संकेतत्रयं यो न जानाति स तावत् त्रिपुरायाः परायाः १ स्वसंविदश्चक्रे मातृमानमेयलक्षणे तत्त्वसमूहे परमाज्ञाधरो न भवेत् । आज्ञा नाम निग्रहानुग्रहसामर्थ्यम् । तदाज्ञामपि लोकेऽस्ति । तदुच्यते—परमेति । परमा सर्व- लोकेष्वप्रतिहता आज्ञा परमेश्वरस्यैव । २परमाज्ञाधरः परमेश्वरो भवेत् । य एतद् विजानाति स सद्यः खेचरतां व्रजेत्, यो नैतद् विजानाति स न ३तद्भावं व्रजेदित्यन्वयव्यतिरेक४सिद्धमित्यर्थः । अत्रैतत्प्रयोजनकीर्तनमधिकारिविषयसंबन्धा- नामप्युपलक्षणम् । मुमुक्षुरधिकारी, स्वसंविद्देवता विषयः, मोक्षः प्रयोजनम्, प्रतिपाद्यप्रतिपादकभावः संबन्धः ॥७॥ इन तीन संकेतों से अपरिचित व्यक्ति विपरीत फल का भागी होता है— जब तक व्यक्ति इन उत्तम कोटि के तीन संकेतों को नहीं जानता, तब तक त्रिपुराचक्र में उसकी आज्ञा अप्रतिहत रूप से नहीं चल पाती ॥७॥ आगे जिन तीन संकेतों का विस्तार से वर्णन किया जायगा, उनको व्यक्ति जबतक पूरी तरह से समझ नहीं लेता, तबतक वह स्वसंवित्स्वरूपा पराशक्ति त्रिपुरा के चक्र, अर्थात् माता, मान और मेय रूप तत्त्वसमूह में परमाज्ञाधर नहीं हो सकता । निग्रह (नाराजगी) और अनुग्रह (प्रसन्नता) की सामर्थ्य वाले व्यक्ति के वचन को आज्ञा कहा जाता है । लौकिक प्रभु में भी यह सामर्थ्य है, किन्तु वह परम सामर्थ्य नहीं है । यह सर्वत्र अप्रतिहत परम सामर्थ्य केवल परमेश्वर में ही है । जो व्यक्ति इन तीन संकेतों को जानता है, वह परमाज्ञाधर, अर्थात् परमेश्वर हो जाता है । जो इनको जानता है, वह तत्काल खेचर (शिवस्वरूप) बन जाता है; जो नहीं जानता, वह ऐसा नहीं बन सकता । यह बात न्यायदर्शन की अन्वय-व्यतिरेक पद्धति से सिद्ध हो जाती है । इस तरह से यहाँ इस शास्त्र के अध्ययन का प्रयोजन बताया गया है । इससे १अनुबन्धचतुष्टय के अन्य विषयों—अधिकारी, विषय और सम्बन्ध—की भी प्रतीति हो जाती है । मुक्ति की कामना वाला व्यक्ति इस शास्त्र के अध्ययन का अधिकारी है, इस शास्त्र का प्रतिपाद्य विषय स्वसंविद्देवता भगवती त्रिपुरा है, मोक्ष की प्राप्ति इसका प्रयोजन है और इनमें परस्पर प्रतिपाद्यप्रतिपादकभाव सम्बन्ध है ॥७॥ १. 'परायाः' नास्ति-क. ख. । २. यः परमाज्ञाधरः स एव परमेश्वरः-क. ने. । ३. खेचरतां-क. । ४. रेखाभ्यां-क. ग. । १. अनुबन्धचतुष्टय शब्द के अभिप्राय को विज्ञानभैरव के भाषानुवाद (पृ० १-३) में स्पष्ट कर दिया गया है ।

१४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः तत्रादौ१ चक्रसंकेतं वक्तुमुपक्रमते— तच्छक्तिपञ्चकं सृष्ट्या लयेनाग्निचतुष्टयम् । पञ्चशक्तिचतुर्वह्निसंयोगाच्चक्रसंभवः ॥८॥ तच्चक्रं सृष्ट्या सृष्टिरूपेण शक्तिपञ्चकम्, स्वाभिमुखाग्रत्रिकोणं शक्तिरुच्यते, तादृशं शक्तिपञ्चकम् । लयेनाग्निचतुष्टयं लयेन संहाररूपेण अग्निः, पराङ्मुखा- ग्रत्रिकोणमग्निरुच्यते, तच्चतुष्टयम् । एवं पञ्चशक्तीनां चतुर्वह्नीनां च संयोगात्, सम्यग् योगः संयोगः, "शक्त्या शक्तिं विनिर्भिद्य" (१।२९) इत्यादिश्चतुश्शती- शास्त्रोक्तरीत्या ग्रन्थिभेदक्रमेण समत्रिकोणशक्त्यग्रं समरेखं यथा भवति तथा लेखनं संयोगः, तस्मात् । चक्रस्य संभवो भवति ॥८॥ सामान्यतश्चक्रसमुदायमुत्पाद्य इदानीमवयवशश्चक्रसंभवं प्रतिजानीते— एतच्चक्रावतारं तु कथयामि तवानघे । एतस्य श्रीमहात्रिपुरसुन्दर्याश्चक्रस्य पूजाचक्रस्यावतारम्, अवतारो नाम लोके सौधाद्युन्नतप्रदेशान्निम्नप्रदेशप्राप्तिः, अत्र तु विश्वोत्तरात्२ प्रकाशात्मनः अब पहले चक्रसंकेत का उपदेश किया जाता है— पांच शक्तियों और चार वह्नियों के संयोग से श्रीचक्र का स्वरूप बनता है। यह संयोग शक्तियों का सृष्टिक्रम से और वह्नियों का लयक्रम से होना चाहिये ॥८॥ इस श्रीचक्र में सृष्टिक्रम से पाँच शक्तियां रहती हैं। त्रिकोण का अग्रभाग यदि अपनी तरफ हो तो उसे शक्ति कहा जाता है। चक्र में ऐसी स्वाभिमुख त्रिकोण वालो पांच शक्तियाँ रहती हैं। यहाँ संहार क्रम से चार वह्नियां रहती हैं। त्रिकोण का अग्र- भाग यदि विपरीत दिशा में हो तो उसे वह्नि कहते हैं। चक्र में पराङ्मुख त्रिकोण वाली चार वह्नियां रहती हैं। इस तरह से पाँच शक्ति और चार वह्नि के सम्यक् योग से अर्थात् नित्याषोडशिकार्णव के "शक्त्या शक्तिम्" (१।२९) इत्यादि श्लोकों में बताई गई विधि से ग्रन्थिभेद के क्रम में समत्रिकोण शक्त्यग्र समरेख चक्र के लेखन से ही पाँच शक्तियों और चार वह्नियों का संयोग होता है और इससे चक्र का स्वरूप बनता है ॥८॥ इस तरह से मोटा-मोटी श्रीचक्र का स्वरूप बन जाता है। अब एक-एक कर अवान्तर चक्रों की निर्माण की प्रक्रिया बतायी जा रही है— हे अनघे ! इस श्रीचक्र की अवतार की पद्धति को अब मैं तुमको कह रहा हूँ ॥ इस तरह से भगवती श्रीमहात्रिपुरसुन्दरी के इस पूजाचक्र का अवतार होता है। लोक में प्रासाद आदि उन्नत स्थल से नीचे उतरने की क्रिया को अवतार कहा जाता है। १. अत्रादौ-ख. ने. ज. झ. उ. । २. तत्त्वात्-क. ग. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५ परमशिवात् तत्त्वक्रमेण प्रसरः, तादृशं चक्रावतारम् । अनघे परशिष्यत्वादि- दोषरहिते । तव प्रकाशात्मनो ममांशभूताया विमर्शशक्तेः । कथयामि हृदयङ्गमंतां नयामीत्यर्थः । १'ननु कथमक्रियात् परमशिवात् तत्त्वमयं चक्रं संभवतीत्यत आह— यदा सा परमा शक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी ॥९॥ स्फुरत्तामात्मनः पश्येत् तदा चक्रस्य संभवः । यदा यस्मिन् काले प्राणिनामदृष्टवशात् स्वान्तःसंहृतविश्वसिसृक्षया सैव परा शक्तिर्विमर्शरूपिणी स्वेच्छया २विश्वरूपिणी३ विश्वं सृजति, शिवस्तटस्थ उदासीन इत्यर्थः । अत्र श्रुतिः— प्रस्तुत स्थल में विश्वोत्तीर्ण१ प्रकाशात्मक परमशिव से इस चक्र का ३६ तत्त्वों के क्रम से जो प्रसार होता है, उसी को यहाँ अवतार कहा गया है । 'अनघे' इस विशेषण से यह तात्पर्य निकलता है कि इस ज्ञान को सुनने वाली देवी पूर्वोक्त परशिष्य आदि दोषों से रहित है । हे देवि ! तुम मुझ प्रकाशात्मक शिव की अंशभूत विमर्श शक्ति हो, अतः तुम्हारे हृदय में मैं इस बात को पूरी तरह से बैठा देना चाहता हूँ ॥ यहाँ प्रश्न उठता है कि क्रियाशून्य परमशिव से तत्त्वमय श्रीचक्र की उत्पत्ति कैसे हो सकती हैं ? भैरव इसका उत्तर देते हैं— यह विश्वरूपिणी परमा शक्ति अपनी इच्छा से जब स्फुरत्ता का दर्शन करती है, तो इस श्रीचक्र की निष्पत्ति होती है ॥९॥ जिस समय प्राणियों के अदृष्ट के कारण अपने भीतर समेटे हुए विश्व की यह विमर्श- रूपिणी परा शक्ति अपनी इच्छा से सृष्टि करना चाहती है, उस समय शिव तटस्थ, १. 'ननु' नास्ति-ख. झ. । २. 'विश्वरूपिणो' नास्ति-ख. ने. । ३. 'आत्मनः स्फुरणं पश्येत्' अधिकम्-ग. घ. उ. ।

  1. प्रत्यभिज्ञाहृदय के ८ वें सूत्र की व्याख्या करते समय क्षेमराज कहते हैं— “विश्वोत्तीर्णमात्मतत्त्वमिति तान्त्रिकाः, विश्वमयमिति कुलाद्याम्नायनिविष्टाः, विश्वोत्तीर्णं विश्वमयं चेति त्रिकादिदर्शनविदः” । अभिनवगुप्त, क्षेमराज आदि ने तान्त्रिक शब्द का प्रयोग सिद्धान्त, वाम, दक्ष, भूत और गरुड नामक पञ्चप्रवाह शास्त्र के अनुयायियों के लिये किया है । प्रधानतः द्वैतवादी सिद्धान्त शैव पञ्चकृत्यकारी पञ्चमन्त्रतनु भगवान् शिव को विश्वोत्तीर्ण, विश्व से ऊपर मानते हैं । कुल, कौल और मत दर्शन के अनुयायी स्वात्मदेवतावाद के पोषक हैं । अतः इनकी दृष्टि में परतत्त्व विश्वमय है । त्रिक और क्रम मत के अनुसार तत्त्वातीत परमशिव अथवा भगवती संवित् विश्वोत्तीर्ण है । ये ही जब विश्वरूप में भासित होते हैं, तो विश्वमय बन जाते हैं । त्रिपुरा सम्प्रदाय के आचार्यों ने अन्तिम मत का अनुसरण किया है । यहीं आगे (१।४९-५०) देखिये । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

१६ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते। पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च।। इति। (श्वे० उ० ६।८) आज्ञावतारेऽप्युक्तम्—"स्वेच्छयैव जगत्सर्वं निगरत्युद्गिरत्यपि" इति। विश्वसर्जनमेव पराशक्तेः स्फुरत्ता, १तस्याः २सृष्टिरूपत्वात्। तदा षट्त्रिंशत्तत्त्वा- त्मकविश्वसृष्टिकाले चक्रस्य विश्वमयस्य परदेवताचक्रस्य संभवः। एतदेवाह— शून्याकाराद् विसर्गान्ताद् ३बिन्दोः प्रस्पन्दसंविदः ॥१०॥ शून्यश्चासावाकारश्चेति शून्याकारः। शून्यत्वं पुनरत्र निरस्तनिखिल- प्रपञ्चत्वात्। अत एव परमशिवः। तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्—"अकारः सर्व- उदासीन रहता है। यह शक्ति ही विश्व का रूप धारण करती है। इसीलिये यह विश्व- रूपिणी कहलाती है। श्वेताश्वतर श्रुति में कहा भी गया है— उस परमशिव स्वरूप ब्रह्म का न कोई कार्य है और न कारण ही। उसके समान और उससे अधिक भी कोई नहीं दिखाई पड़ता। इस ब्रह्म की स्वाभाविक परा शक्ति ही ज्ञान, बल, क्रिया आदि नाना स्वरूपों में सुनाई पड़ती है, भासित होती रहती है॥ आज्ञावतार शास्त्र में भी बताया गया है—"यह शक्ति अपनी इच्छा से ही इस जगत् को निगलती और उगलती रहती है"। विश्व का यह सृष्टि-व्यापार ही परा शक्ति की स्फुरत्ता है, क्योंकि शक्ति की स्फुरत्ता को ही सृष्टि कहा जाता है। जब शक्ति की स्फुरता से ३६ तत्त्वात्मक जगत् की सृष्टि होने लगती है, तभी इस विश्वमय पर- देवतात्मक श्रीचक्र की भी उत्पत्ति होता है ॥९॥ श्रीचक्र की यह निष्पत्ति इस क्रम से होती है— शून्यस्वरूप अकार और विसर्ग (हकार) के समष्टि बिन्दु में बैन्दव चक्र की प्रतीति होती है ॥१०॥ 'शून्याकार'१ शब्द में कर्मधारय समास है। इसका अर्थ होगा शून्यस्वरूप अकार। अकार को शून्य यहाँ इसलिये कहा गया है कि यह समस्त जागतिक प्रपंच से ऊपर है। १. 'तस्याः' नास्ति-ज.। २. विश्वसृष्टि-ख.। ३. बिन्दुप्रस्यन्द-ख. ग. घ. ने. ज. उ. । १. यहाँ दीपिका की सहायता से मूल ग्रन्थ का अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाता। भास्करराय ने 'शून्याकारात्' से लेकर 'बैन्दवं चक्रम्' पर्यन्त ग्रन्थ की एक साथ व्याख्या की है। यहाँ शून्याकारात्, विसर्गान्तात्, प्रस्पन्दसंविदः, प्रकाशपरमार्थत्वात् और स्फुरत्तालहरी- युतात्—ये पाँच पद विशेषण तथा 'बिन्दोः' पद विशेष्य है। सभी पद बहुव्रीहि समासान्त हैं। अतः शून्याकार शब्द में भी कर्मधारय समास की आवश्यकता नहीं है।

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १७ वर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः” इति । अत्र श्रुतिः—‘‘अ इति ब्रह्म’’ (ऐ० आ० २।३।८) इति । विसर्गान्ताद् विसर्गोऽन्ते यस्य, १तस्माद् [विसर्गान्तात् । २बिन्दोः इसी लिये यह परमशिव का ही स्वरूप है। संकेतपद्धति में बताया गया है—“सभी वर्णों के आगे विद्यमान अकार प्रकाशात्मक परमशिव है”। ऐतरेयारण्यक में अकार को ब्रह्म कहा गया है। यह शून्याकार विसर्गान्त है, अर्थात् इस शून्यस्वरूप अकार के अन्त १. स विसर्गान्तस्तस्मात्–क. ग. । २. बिन्दुप्रस्यन्द–ख. ग. ने । हम सभी जानते हैं कि बिन्दु का आकार शून्य जैसा है। शून्य के आकार से ही बिन्दु की पहचान होती है। परा शक्ति के प्रतीक इस बिन्दु में अनुत्तर लिपि अकार और विसर्ग लिपि हकार (विसर्ग) अत्यन्त सूक्ष्म रूप में समरस अवस्था में स्थित हैं। यहाँ अनेक स्थलों पर उद्धृत संकेतपद्धति के एक वचन में बताया गया है कि अकार प्रकाशात्मक शिव और हकार विमर्शात्मक शक्ति का प्रतीक है। इन दोनों के मिलन से 'अहम्' की सृष्टि होती है। पाणिनि व्याकरण के अच् प्रत्याहार में जैसे अकार से लेकर चकार के मध्यवर्ती सभी वर्णों का ग्रहण होता है, उसी तरह से प्रत्याहारन्याय से 'अहम्' पद अकार से लेकर हकार पर्यन्त सभी वर्णों का द्योतक है। हकार को विसर्ग भी कहा जाता है और विसर्ग से ही समस्त विश्व की सृष्टि होती है। इसका अभिप्राय यह है कि बिन्दु की प्रकाश-विमर्शात्मक समरस अवस्था में यह सारा विश्व छिपा हुआ है। 'स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति' इस प्रत्यभिज्ञाहृदयसूत्र में तथा आगे (१।५०) दीपिका में उद्धृत वचन (जगच्चित्रं) में यह बताया गया है कि चितिशक्ति अथवा परमशिव स्वात्मभित्ति में स्वेच्छया विश्व का उन्मीलन करते हैं। सूर्य की तरफ दर्पण का मुंह करने पर सूर्य की किरणें स्वच्छ दर्पण पर पड़ कर जैसे दीवाल पर तेजोबिन्दु के रूप में भासित होने लगती हैं, उसी तरह से प्रकाशात्मक परमशिव की किरणें जब विमर्शरूपी स्वच्छ दर्पण पर पड़ती हैं, तो स्वात्मभित्ति में सबसे पहले महाबिन्दु भासित होता है। यही नवचक्रात्मक श्रीचक्र का बिन्दु नामक चक्र है। इसी को कामबिन्दु भी कहते हैं, क्योंकि कामेश्वर और कामेश्वरी यहाँ समरस अवस्था में स्थित हैं। इस कामबिन्दु में स्पन्दन या स्राव के उठने पर श्वेत और रक्त अग्नीषोमात्मक बिन्दुयुगल के रूप में विसर्ग की प्रतीति होती है। यह बिन्दुयुगल कामबिन्दु की कला है। इस तरह से बिन्दु और विसर्ग के मिलन से कामकला नामक बीजाक्षर की निष्पत्ति होती है। प्रकाशशक्ति की प्रधानता वाले विमर्शशक्ति की स्फुरत्ता (हार्धकला) से युक्त इस कामकला नामक बीजाक्षर से ही विश्वलहरीस्थान मातृत्रयात्मक बैन्दव (त्रिकोण) चक्र का प्रसार होता है। २

१८ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः प्रस्पन्दसंविदः। बिन्दुरग्नीषोमात्मकः कामाख्यो रविः शिवशक्तिसामरस्यात्मा१ जातः। तदुक्तं चिद्गगनचन्द्रिकायाम्— २भोग्यभोक्तृमयभाविमर्शागा(गां) देवि मां ३चिदुदधेदृढां दशाम्। अर्पयन्ननलसोममिश्रणस्तद्विवक्ष४ इह भानुजृम्भणः ॥ (श्लो० २१२) इति। शिवशक्तिसामरस्यरूपकामाख्यस्य बिन्दोः संस्कारः प्रस्पन्दो५ दहनेन्दुरूप- सितशोणबिन्दुद्वयात्मकः। अकारहकारसामरस्यबिन्दोः ६प्रस्पन्दात् सितशोणबिन्दु- युगलात् संविच्चिन्मयी दहनेन्दुरूपा चित्कला जायत इत्यर्थः ॥१०॥ ७प्रकाशपरमार्थत्वात् स्फुरत्तालहरीयुतात् । प्रसृतं विश्वलहरीस्थानं मातृत्रयात्मकम् ॥११॥ बैन्दवं चक्रम् प्रकाशविमर्शवृत्तिसम्पर्काद् घृतस्येव धारा विमर्शशक्तेः स्रावो जायते, अत एव प्रकाशस्य परमार्थत्वम्। स्फुरत्तालहरीयुतात् स्फुरत्ताया विमर्शशक्तेर्लहरी में विसर्ग है। इस शून्य अकार और विसर्ग से शिवशक्तिसामरस्य स्वरूप अग्नीषोमात्मक काम (रवि) बिन्दु की उत्पत्ति होती है। चिद्गगनचन्द्रिका में भी ऐसा ही कहा गया है— हे देवि ! चिदात्मक सागर (परमशिव दशा) से भोक्ता (आत्मा) और भोग्य (विषय) के रूप में उठ रही प्रकाशविमर्शात्मक (द्वैतमयी चंचल) लहरियों की स्थिति में भी स्थिर दशा (शुद्ध स्वात्मस्वरूप) को निरन्तर भासित कराने वाला, अग्नीषोमात्मक जगत् की सृष्टि के लिये उद्यत भानुजृम्भण (कामबिन्दु) मुझे यहाँ कुछ कहना सा चाह रहा है ॥ शिवशक्तिसामरस्यमय काम नामक बिन्दु का संस्कार, अर्थात् स्पन्दन ही अग्नी- षोमात्मक श्वेत और रक्त बिन्दुओं का रूप धारण करता है। अकार और हकार (विसर्ग) स्वरूप समरस कामबिन्दु के स्पन्दन से उत्पन्न श्वेत और रक्त बिन्दुयुगल से संवित्स्वरूपा, अर्थात् चिन्मयी अग्नीषोमात्मिका चित्कला निकलती है ॥१०॥ स्फुरत्ता (विमर्श) की लहरी से युक्त प्रकाशरूपी परमार्थ से विश्व के प्रकाशक मातृत्रयात्मक बैन्दव चक्र का प्रसार होता है ॥११॥ अग्नि के संपर्क से जैसे घी पिघलने लगता है, उसी तरह से प्रकाश के संपर्क से विमर्श शक्ति में स्राव होने लगता है, अतः प्रकाशात्मक शिव को ही यहाँ परमार्थ कहा १. रस्यवाच्यात्मा-क. ख. ने. । २. 'भोक्तृभोग्यमयगोविसर्गो' इति सार्वत्रिको दीपिकापाठः । ३. चिदुदधो-क. ग. ने., चिदुदरे-चि. । ४. 'विमर्श' इति सार्वत्रिको दी. पाठः । ५. प्रस्पन्दो-ख. ग. ज. । ६. प्रस्य-ख. ग. ने. । ७. प्रसार-ख. च. झ. ।

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १९ बिन्दुद्वयान्तरालनिःसृता¹ हार्धकलारूपा, तथा युक्तादेवंभूतात् कामकलाक्षरात् । प्रसूतं विश्वलहरीस्थानं मातृत्रयात्मकं बैन्दवं चक्रम् । विश्वलहरीस्थानम्, विश्व- लहर्यो वीचयः षट्त्रिंशत्तत्त्वरूपास्तासां स्थानम्, उत्पत्तिहेतुत्वात् । मातृत्रयात्मकं पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरीरूपम् । एवं तत्समष्टिरूपपरमा²त्मात्मकसदाशिवाख्य- तुरीयबिन्दोरुत्पन्नतत्वाद् बैन्दवं चक्रं मध्यत्रिकोणं प्रसृतम् । एतदत्रैव वक्ष्यति— "आत्मनः स्फुरणं पश्येत्" (१।३६) इत्यादि, "वैखरी विश्वविग्रहा" (१।४०) इत्यन्तेन, "चक्रं कामकलारूपं प्रसारपरमार्थतः" (१।२४) इति च । एतत् काम- कलाविलासेऽप्यस्मद्गुरुभिः प्रपञ्चितम्— गया है। स्फुरत्ता (विमर्शशक्ति) की लहरी यहाँ दो बिन्दुओं के बीच से निकली हार्ध- कला है। इस हार्धकला से युक्त कामकला नामक ¹अक्षर से विश्वलहरीस्थान मातृ- त्रयात्मक बैन्दव (त्रिकोण) चक्र का प्रसार होता है। इसको विश्वलहरीस्थान इसलिये कहा गया है कि षट्त्रिंशत् तत्त्वात्मक विश्व की उत्पत्ति इससे उसी तरह से होती है, जैसे कि समुद्र से लहरें उठती हैं। यह बैन्दव (त्रिकोण) चक्र पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी का प्रतिनिधि है, क्योंकि इस त्रिकोण चक्र का प्रसार उस परमात्मस्वरूप सदाशिव नामक तुरीय (चतुर्थ) समष्टि बिन्दु से हुआ है, जो कि परा वाणी का प्रतिनिधि है। उस बैन्दव चक्र से इसका प्रसार हुआ है, अतः इस मध्यत्रिकोण चक्र को भी यहाँ बैन्दव चक्र ही कह दिया गया है। इस विषय का विस्तार यहाँ ²आगे (१।३६-४०) किया जायगा। "चक्रं कामकलारूपम्" (१।२४) ³इस श्लोक में भी यही विषय वर्णित है। हमारे (अमृतानन्द के) गुरु पुण्यानन्द ने ⁴कामकलाविलास में इस विषय को अधिक स्पष्ट किया है— १. मिश्रिता-ग. घ. ने. ज. झ. उ. । २. मात्मक-क. ख. ग. उ. ।

  1. हार्धकला से युक्त कामकला नामक बीजाक्षर का स्थूल स्वरूप शारदा लिपि के ईकार की सहायता से समझा जा सकता है।
  2. वहाँ कामकला नामक बीजाक्षर की बैन्दव (त्रिकोण) चक्रात्मकता, वाक्चतुष्ट- यात्मकता, अम्बिकादि शान्तादि शक्तिचतुष्टयात्मकता का वर्णन करते हुए शृंगाट की परिपूर्णता दिखाई गई है।
  3. श्रीचक्र की सृष्टि और संहार क्रम की वासनाओं का वर्णन करने के बाद वहाँ बताया गया है कि सम्पूर्ण श्रीचक्र कामकला का ही विस्तार है।
  4. श्रीचक्र के आध्यात्मिक स्वरूप का इस ग्रन्थ में परिपूर्ण वर्णन मिलता है। अति- महत्त्वपूर्ण व्याख्या चिद्वल्ली के साथ इस ग्रन्थ का विशिष्ट संस्करण गणेश एण्ड कम्पनी, मद्रास से प्रकाशित हो चुका है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

२० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः स्फुटशिवशक्तिसमागमबीजाङ्कुररूपिणी परा शक्तिः । अनुत्तररूपानुत्तरविमर्शलिपिलक्ष्यविग्रहा भाति ॥ परशिवरविकरनिकरे प्रतिफलति विमर्शदर्पणे विशदे । प्रतिरुचिरुचिरे कुड्ये चित्तमये निविशते महाबिन्दुः ॥ चित्तमयोऽहङ्कारः सुव्यक्ताहार्णसमरसाकारः । शिवशक्तिमिथुनपिण्डः कवलीकृतभुवनमण्डलो जयति¹ ॥ सितशोणबिन्दुयुगलं विविक्तशिवशक्तिसंकुचत्प्रसरम् । वागर्थसृष्टिहेतुः परस्परानुप्रविष्टविस्पष्टम् ॥ शिव और शक्ति, अर्थात् ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति का स्पष्ट समागम होने पर बीजाङ्कुरन्याय का प्रतिनिधित्व करने वाली पराशक्ति अत्यन्त सूक्ष्म अनुत्तर लिपि अकार और विमर्श लिपि हकार (विसर्ग) के स्वरूप में भासित होने लगती है ॥ सूर्य को तरफ दर्पण का मुँह करने से जैसे सूर्य की किरणें स्वच्छ दर्पण पर पड़ने के बाद दीवाल पर तेजोबिन्दु के रूप में प्रतिफलित होती हैं, उसी तरह से प्रकाशात्मक परमशिव की किरणों के विमर्श रूपी स्वच्छ दर्पण पर पड़ने से चित्तमय कुड्य (भित्ति) में महाबिन्दु भासित होने लगता है ॥ ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति के प्रकाश से आलोकित यह चित्त ही वह अहंकार ¹ (अहंतत्त्व) है, जिसका कि स्वरूप अत्यन्त स्पष्ट अकार और हकार लिपि के समरसीभाव से बनता है। यह 'अहम्' तत्त्व प्रकाशात्मक शिव और विमर्शात्मक शक्ति का युगल स्वरूप है। शब्द और अर्थमय सारे जागतिक प्रपंच को इसने अपने भीतर समेट रखा है, अतः यही सर्वोत्कृष्ट तत्त्व है ॥ इस चित्तमय महाबिन्दु में श्वेत और रक्त बिन्दुयुगल की भावना करनी चाहिए । शिव और शक्ति के इस विभक्त स्वरूप में सारी सृष्टि का विस्तार छिपा हुआ है। परा, पश्यन्ती प्रभृति वाक्सृष्टि और शिव से लेकर पृथिवी पर्यन्त अर्थ की सृष्टि का यही कारण (आधार) है। इस बिन्दुयुगल में कामेश्वर और कामेश्वरीमय दिव्य मिथुन का स्वरूप परस्पर अनुप्रविष्ट और विस्पष्ट, अर्थात् समरसाकार और विभक्ताकार दोनों ही रूपों में भासित होता है ॥ १. लसति—ख. ग. ने. ज. झ. उ. ।

  1. सांख्यदर्शन के अहंकार से यह भिन्न तत्त्व है । वामनभट्ट के अद्वयसम्पत्तिवार्त्तिक में इसका वर्णन मिलता है । देखिये—विज्ञानभैरव हिन्दी भाषानुवाद (पृ. १००) तथा लुप्तागमसंग्रह, द्वितीय भाग, उपोद्घात (पृ. १९५) !

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २१ बिन्दुरहङ्कारात्मा रविरेतन्मिथुनसमरसाकारः । कामः कमनीयतया कला च दहनेन्दुविग्रहौ बिन्दू ॥ इति कामकला विद्या देवी चक्रक्रमात्मिका सेयम् । विदिता येन स मुक्तो भवति महात्रिपुरसुन्दरीरूपः ॥ (का० वि० श्लो० ३-८) इत्यादि ॥११॥ एतस्य त्रिरूपत्वं पुनर्भवोत् । एतस्य त्रिकोणात्मकस्य चक्रस्य पुनस्त्रिरूपत्वं भवेत् । पुनःशब्देन पूर्वोक्तस्यैव गुणान्तरकथनं १गम्यते । इदमेव त्रिकोणात्मकं भूयोऽपि शक्तित्वं सृष्ट्या वह्नित्वं च संहारात्मना प्रतिपद्य तत् त्रिधाऽभूदित्यर्थः । यह श्वेत और रक्त बिन्दुयुगल अहंकार (अहंतत्त्व) स्वरूप है । इसका नाम रवि है । इसमें दोनों बिन्दु समरसभाव से रहते हैं । यह समरसभाव सबके लिये कमनीय (स्पृहणीय) है । इसलिए इसे काम भी कहते हैं । अग्नि और चन्द्र (अग्नीषोम) नामक दो बिन्दु इस काम की कलाएँ हैं ॥ इस कामकला नामक महात्रिपुरसुन्दरी विद्या का यही स्वरूप है । श्रीचक्र, श्रीविद्या आदि के क्रम से जो इसको जान लेता है, वह साधक महात्रिपुरसुन्दरी स्वरूप हो जाता है, मुक्त हो जाता है ॥ यह त्रिकोणात्मक बैन्दव चक्र पुनः तीन रूपों में विभक्त हो जाता है, अर्थात् तीन त्रिकोणों के योग से नवयोनि चक्र¹ बन जाता है । इस त्रिकोणात्मक चक्र के पुनः तीन रूप हो जाते हैं । पुनः शब्द का यहाँ प्रयोग हुआ है । इससे यह अभिप्राय निकलता है कि यह कोई नई सृष्टि न होकर उसी त्रिको- णात्मक चक्र का गुणात्मक परिवर्तन होता है । यही त्रिकोणात्मक चक्र फिर भी सृष्टि क्रम से शक्ति चक्र का और संहार क्रम से वह्नि चक्र का स्वरूप धारण कर त्रिधा विभक्त हो जाता है । १. शस्यते-ख. ।

  1. नवयोनि चक्र शब्द से योगिनीहृदय में सर्वत्र वसुकोण चक्र का ग्रहण करना चाहिए ।

२२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः एवं कृते सति सवासनं नवयोनिचक्रं निष्पद्यत इत्याह— धर्माधर्मौ तथात्मानौ मातृमेयौ तथा प्रमा ॥१२॥ नवयोन्यात्मकमिदं चिदानन्दघनं महत् । धर्माधर्मौ पुण्यपापे । आत्मानः आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा, ज्ञानात्मा चेति चत्वारः । मातृमेयौ माता जीवः, मेयो ग्राह्यवर्गः । प्रमा ज्ञप्तिः ॥१२॥ एवमेतन्नवमयं नवयोन्यात्मकं चक्रं चिदानन्दघनम् । चित् चैतन्यकला, आनन्दो विश्वाहन्तापरिणामः, ताभ्यां घनं बहिरन्तर्निबिडम् । यथा लवणं घनम् । महद् देशकालाकारैरनाकलितम्, चिन्मयत्वात् । ऐसा करने से नवयोनि चक्र बन जाता है । इसमें ¹वासना (भावना) का प्रकार बताते हैं— इसमें धर्म, अधर्म, चतुर्विध आत्मा, माता, मेय और प्रमा की भावना करनी चाहिए। यह नवयोन्यात्मक चक्र चित् और आनन्द से परिपूर्ण तथा महान् है ॥१२॥ धर्म और अधर्म का अर्थ है पुण्य और पाप । आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा और ज्ञानात्मा के भेद से आत्मा के चार भेद हैं । माता का अर्थ जीव, मेय का अर्थ ग्राह्य विषय और प्रमा का अर्थ ज्ञप्ति अर्थात् ज्ञान है ॥१२॥ नवयोनि चक्र इन नौ पदार्थों का प्रतिनिधि है, अर्थात् इस नवयोनि चक्र की एक- एक योनि में इनकी भावना करनी चाहिए । यह चक्र चिदानन्दघन है । चित् का अर्थ चैतन्यकला और आनन्द का अर्थ ²विश्वाहन्ता का अनुभव है । यह चक्र चैतन्यकला और विश्वाहन्ता की अनुभूति से भीतर-बाहर उसी तरह से ओत-प्रोत है, जैसे कि लवण का एक-एक कण लवणरस से ओत-प्रोत रहता है । यह चिन्मय होने से ही महत् है, देश-काल और आकार से परिमित न होने से महतो महीयान् है । १. योगिनीहृदय की अपनी टीका (पृ० ८२) में भास्करराय ने वासना शब्द का अर्थ सूक्ष्म रूपान्तर किया है । इसका अभिप्राय यह है कि स्थूल आकार में छिपे सूक्ष्म आध्यात्मिक स्वरूप की भावना का प्रकार यहाँ वासना के द्वारा बताया गया है । २. विश्वाहन्ता शब्द के अर्थ को समझने के लिये देखिये विज्ञानभैरव भाषानुवाद (पृ. १००, ११२-११४) तथा "आगम और तन्त्रशास्त्र" (पृ. ५५-५७) नामक ग्रन्थ ।

प्रथमः ] दीपकाभाषानुवादसहितम् २३ प्रथमं त्रिकोणस्य पश्यन्त्यादित्रितयहेतुत्वात् तन्मयतां प्रतिपाद्य इदानीं बाह्य- चक्रस्य वैखरीमयतां तदुत्थितां तत्त्वस्वरूपतां च कथयति चक्रमित्यादिना वामा- रूपभ्रमित्रयमित्यन्तेन (श्लो० १३-१९) — चक्रं नवात्मकमिदं नवधा भिन्नमन्त्रकम् ॥१३॥ इदं चक्रं त्रिकोणत्रयरूपेण नवात्मकं त्रैलोक्यमोहनादिनवचक्रात्मना परिणतं नवधा भिन्नमन्त्रकं वक्ष्यमाणकरशुद्ध्यादिनवचक्रेश्वरीमन्त्रनवकभेदवत् ॥१३॥ बैन्दवासनसंरूढेसंवर्तानलचित्कलम् । अम्बिकारूपमेवेदमष्टारस्थं स्वरावृतम् ॥१४॥ बैन्दवासनं महाबिन्द्वात्मकसदाशिवासनम् । अत्रैव वक्ष्यति—"सदाशिवासनं देवि महाबिन्दुमयं परम्" (२।५६) इति । शिवशक्त्योः सदाशिवतत्त्वोपरि स्थित- त्वाद् बैन्दवासनसंरूढत्वम्। संवर्तानलो लयानलः, यत्र क्षित्यादिशिवपर्यन्तं लीयते अभी ११वें श्लोक में बताया गया है कि त्रिकोण से ही पश्यन्ती आदि वाणियों का विकास होता है, अतः यह तन्मय है। अब 'चक्रम्' इत्यादि १३वें श्लोक से 'वामारू- पभ्रमित्रयम्' पर्यन्त १९वें श्लोक तक बाह्य चक्र की वैखरीमयता (वर्णात्मकता) और तत्त्वमयता (तत्त्वात्मकता) का वर्णन किया जा रहा है— यह नवात्मक श्रीचक्र नवधा भिन्न मन्त्रों से संयुक्त है ॥१३॥ तीन त्रिकोणों के संयोग से निष्पन्न ¹नवयोनि चक्र ही त्रैलोक्यमोहन प्रभृति नौ चक्रों के रूप में परिणत हो जाता है। इनमें से प्रत्येक चक्र आगे (२।२-५) बताये गये कर- शुद्धि आदि नौ चक्रेश्वरी मन्त्रों से संवलित होता है ॥१३॥ बैन्दव (त्रिकोण) चक्र प्रकाशस्वरूप संवर्तानल अकार और विमर्शस्वरूप चित्कला हकार का आसन है। यह अम्बिका रूप ही है। त्रिकोण चक्र जब अष्टार नवयोनि चक्र से घिर जाता है, तो वह स्वरों से आवृत रहता है ॥१४॥ बैन्दवासन का अर्थ है महाबिन्दु स्वरूप सदाशिवासन । आगे (२।५६) महाबिन्दु को सदाशिव का आसन बताया गया है। शिव और शक्ति का स्थान सदाशिव तत्त्व से ऊपर है, अतः शिव और शक्ति को यहाँ बैन्दवासन पर बैठा हुआ बताया गया है। प्रलय काल की अग्नि को संवर्तानल कहते हैं। यहाँ अकार को संवर्तानल कहा गया है, क्योंकि पृथ्वी से लेकर शिव तत्त्व पर्यन्त सारा जगत् समस्त वर्णों के आदिभूत इस प्रकाशात्मक अनुत्तर १. संरूढं-ग. च. उ. । १. नवयोनि चक्र, अर्थात् तीन त्रिकोणों के संयोग से बने वसुकोण चक्र का नित्या- षोडशिकार्णव (१।२९-४१) में वर्णित पद्धति से विस्तार होने पर अन्ततः नवचक्रात्मक श्रीचक्र परिपूर्ण हो जाता है। यहाँ भी आगे (१।७३-७५) इस विषय की संक्षिप्त चर्चा

२४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः तदनलरूपं१ सकलवर्णाद्यभूतमनुत्तरं प्रकाशात्मकं संवर्तानलः । चिदेव कला चित्कला विमर्शात्मिका सर्व२वर्णान्त्यभूतहार्थकलारूपा । तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्— अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः । हकारोऽन्त्यः कलारूपो विमर्शाख्यः प्रकीर्तितः ॥ इति । बैन्दवासनसंरूढे संवर्तानलचित्कले यस्मिन् तत्, तथैवं त्रिकोणं शिवशक्ति- सामरस्यरूपमहाबिन्दुमं३यमध्यचक्रोत्पन्नत्वादम्बिकारूपम् । अष्टारस्थं त्रिकोण- ४स्पन्दत्रयसमुत्पन्नत्वादष्टकोणस्य ५तत इदं त्रिकोणमष्टारस्थम् । स्वरावृतम् अकारादिबिन्द्वन्तपञ्चदशस्वरैस्त्रिधा विभक्तैराकलितरेखात्रयम्, अःस्वराक्रान्त- मध्यम् । तदुक्तमभियुक्तैः—"विभाव्य च महात्र्यस्रं समरेखं स्वरोदरम्" (सु० ४१) इति । अयमर्थः—इदमेव त्रिकोणचक्रं नवचक्रात्मना परिणतं त्रिपुरादिनवचक्रेश्वरो- अकार में ही उस समय लीन हो जाता है । सभी वर्णों के अन्त में स्थित विमर्शात्मक हार्धकला को ही यहाँ चित्कला कहा गया है । संकेतपद्धति में भी यह विषय वर्णित है— सभी वर्णों का आदिभूत अकार प्रकाशात्मक परम शिव है । अन्तिम वर्ण हकार विम- र्शात्मक चित्कला का स्वरूप है ॥ त्रिकोण चक्र के मध्य में स्थित महाबिन्दु में ही संवर्तानल और चित्कला का स्थान है, यही अम्बिका रूप भी है, किन्तु शिव-शक्ति सामरस्य स्वरूप महाबिन्दुमयं मध्यचक्र से ही त्रिकोण चक्र की उत्पत्ति होती है, अतः त्रिकोण चक्र को भी यहाँ अम्बिका रूप मान लिया गया है । यही त्रिकोणचक्र अष्टारचक्र में भी स्थित है, क्योंकि अष्टकोण नवयोनि चक्र त्रिकोण के तीन स्पन्दनों से बनता है । यह षोडश स्वरों से आवृत है । अकार से लेकर बिन्दुपर्यन्त १५ स्वरों को तीन हिस्सों में बाँटकर त्रिकोण चक्र की एक- एक रेखा में पाँच-पाँच स्वरों को और त्रिकोण के मध्य में १६वें स्वर अः को लिखा जाता है । सुभगोदयकार१ शिवानन्द ने भी कहा है— महात्र्यस्र, अर्थात् प्रथम मूल त्रिकोण की समान रेखाओं के मध्य में सभी स्वरों की भावना करनी चाहिए ॥ ऊपर की तीन पंक्तियों का अभिप्राय यह है—यह त्रिकोण चक्र ही अन्ततः नौ चक्रों का रूप धारण कर लेता है तथा त्रिपुरा प्रभृति नौ चक्रेश्वरी देवियों और उनके कर- १. चक्रं-घ. झ., चक्रं पररूपं-ग. ज. ने झ. उ. । २. वर्णानामन्तिमा-क., वर्णाभ्यन्तर-ग. झ. उ. । ३. 'मयमध्य' नास्ति-ख. ग. घ. उ. । ४. स्यन्द-ख. घ. ने. । ५. ततोऽष्टारस्थम्-ख. ग. ज. झ. उ. । १. महार्थमंजरीकार महेश्वरानन्द के परमगुरु नित्याषोडशिकार्णव की टीका (ऋजु- विमर्शिनी) के रचयिता शिवानन्द मुनि का यह ग्रन्थ नित्याषोडशिकार्णव के काशी संस्करण (पृ० ३८४-३९६) में प्रकाशित हो चुका है।

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २५ करशुद्ध्यादितत्तन्मन्त्रनवककलितमष्टकोणमध्यगतं१ षोडशस्वरावृतम् अम्बि- काशान्तासामरस्यरूपमहाबिन्दुमयसदाशिवासना रूढप्रकाशविमर्शात्मककामेश्वर- कामेश्वर्यधिष्ठितमिति ॥१४॥ उपरितनचक्रं सवासनमुत्पादयति-- नवत्रिकोणस्फुरितप्रभारूपदशारकम् । शक्त्यादिनवपर्यन्तदशार्णस्फूर्तिकारकम्२ ॥१५॥ भूततन्मात्रदशकप्रकाशालम्बनत्वतः । नव च त्रिकोणं३ च नवत्रिकोणानि । त्रिकोणशब्देन त्रिकोणमध्य४गतं बैन्दवं लक्ष्यते । नवत्रिकोणानां बैन्दवस्य च ५परितः स्फुरिताः प्रतीयमानाः प्रभा दश, तद्रूपं दशारं यत्र । यद्यथा परिणमते तत् तथाविधम् । शक्तिः रेफः । तदुक्तं६मुद्गा-

शुद्धि प्रभृति नौ मन्त्रों से संयुक्त हो जाता है। यही त्रिकोण चक्र जब अष्टकोण (नव- योनिचक्र) के मध्य में स्थित रहता है, तो १६ स्वरों से आवृत हो जाता है। इसी के मध्य में स्थित अम्बिका और शान्ता शक्ति के सामरस्य स्वरूप महाबिन्दु में सदाशिव रूपी आसन पर बैठे हुए प्रकाशविमर्शात्मक कामेश्वर और कामेश्वरी के युगल स्वरूप का निवास है ॥१४॥ भावनापद्धति के साथ अब आगे के चक्रों की निष्पत्ति बताते हैं— नवयोनि और त्रिकोण मध्यगत महाबिन्दु की प्रभा से दशार चक्र की निष्पत्ति होती है। इसमें यकार से लेकर क्षकार पर्यन्त दस वर्णों का स्फुरण होता है। यह दशार चक्र पांच महाभूत और पांच तन्मात्राओं के प्रकाश का आलम्बन है ॥१५॥ नवत्रिकोण शब्द में द्वन्द्व समास होने से नवयोनि और त्रिकोण का ग्रहण होता है। त्रिकोण शब्द से यहाँ त्रिकोण के मध्य में स्थित बिन्दु का ग्रहण किया जाता है। नवयोनि (अष्टार) चक्र और बैन्दव चक्र से चारों तरफ फैली प्रकाश की किरणें ही दशार चक्र का रूप धारण कर लेती हैं। जो जिससे परिणत होता है, वह वैसा ही हो जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि नवयोनि और बैन्दव चक्र के परिणाम से निष्पन्न यह चक्र दशार का रूप धारण कर लेता है। शक्ति शब्द से रेफ का ग्रहण किया जाता है।

१. 'मध्य' नास्ति-घ. ने. ज. झ. उक., कोणान्तः-उग. । २. णम्-ग. घ. ने. ज. झ. उ. । ३. णानि-च. झ. । ४. मध्यं-ख. ने. ज. उ. । ५. 'परितः' नास्ति-ख. ग. घृ. ज. झ. उ. । ६. मध्याहारो-ग. घ. ब. उ. ।

२६ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः रोर्ध्वतन्त्रे १रमाशक्तिबीजोद्धारे—"चन्द्रः२ शक्तिर्महाशक्तिर्ब्रह्माणी कालिकादि- कम्" इति। शक्ते रेफस्यादिर्यकारः, शक्त्यादिकारमारभ्य नवानां ३वर्णानां पर्यन्तः क्षकारः, तेषां दशानां स्फूर्तिकारकम्। स्फूर्तिर्विमर्शः। यकारादिक्षका- रान्तदशवर्णविमर्शकमित्यर्थः ॥१५॥ भूतानि पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशाः, तन्मात्राः पञ्च गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः, तेषां दशानां प्रकाशा दश, तेषामालम्बनत्वात्४। शिवात्मकत्वात् पृथिव्याद्यर्था- नाम्, शक्त्यात्मकत्वाद् यकारादिवर्णानाम्। तदुभयप्रकाशविमर्शमयदशकोणावृत- मिदं चक्रमित्यर्थः। पृथिव्यादिक्षकारान्तवर्णदशकमयताकथनेन प्रथमदशारादि- चक्रत्रयस्य स्थितिरूपता द्योत्यते। रमा शक्ति के बीज का उद्धार करते समय उद्धारोर्ध्वतन्त्र में बताया गया है—"चन्द्र, शक्ति, महाशक्ति, ब्रह्माणी, कालिका आदि शब्द (इस बीज के वाचक हैं)"। शक्ति अर्थात् रेफ का आदि यकार है। १यकार से लेकर ळकार सहित नौ वर्णों के अन्त में क्षकार है। यह चक्र इन दस वर्णों की स्फूर्ति करता है। स्फूर्ति का अर्थ यहाँ विमर्श है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि यकार से लेकर क्षकार पर्यन्त १० वर्णों का यहाँ विन्यास करना चाहिये ॥१५॥ पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश—भूत कहलाते हैं। गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द—ये हैं पांच तन्मात्राएँ। इन दस तत्त्वों के प्रकाश का आलम्बन यह दशार चक्र है। पृथिवी आदि दस तत्त्व शिवात्मक और यकार आदि दस वर्ण शक्त्यात्मक हैं। यह दशार चक्र भी प्रकाशविमर्शमय शिव-शक्ति के प्रकाश से घिरा हुआ है। पृथिवी आदि दस तत्त्व और यकारादि क्षकारान्त दस वर्णों से संयुक्त होने से प्रथम दशार आदि तीन चक्रों की स्थितिरूपता जानी जाती है। १. परा—उ. । २. चन्द्र—उ. । ३. 'वर्णानां' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. । ४. कत्वात्— ख. ग. ने. ज. झ. ।

  1. भास्करराय ने यहाँ 'शक्त्यादि' शब्द से मकार का ग्रहण किया है। उनके मत से इन दस वर्णों में ळकार की गणना नहीं की जाती और इस तरह से त्रिकोण से चतुर्दशार पर्यन्त चक्रों में सभी (पचास) वैखरी वर्णों का विन्यास पूर्ण हो जाता है। अमृतानन्द ५१ वैखरी वर्णों के पक्षधर लगते हैं। आगे मूल ग्रन्थ में (३।१००-१०१) भी इसी पद्धति से वैखरी वर्णों का विन्यास बताया गया है, किन्तु इस क्रम में मकार का विन्यास कहीं नहीं होने पाता। बीजाक्षरों में बिन्दु अनिवार्य तत्त्व है। मकार को बिन्दु का प्रतीक मानकर और इस तरह से प्रत्येक वर्ण में इसकी सत्ता समझ कर मूल ग्रन्थ और अमृतानन्द की व्याख्या की संगति बैठाई जा सकती है।

प्रथम ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २७ द्वितीयदशारमाह- द्विदशारस्फुरद्रूपं क्रोधीशादिदशार्णकम् ॥१६॥ द्वितीयदशारं द्विदशारम् । १'रूप्यन्त इति रूपा इन्द्रियार्था दश, शब्दादयो वचनादयश्च, द्वितीयदशारतया स्फुरन्तो रूपा यस्य तत् तथाविधम्। क्रोधीशः ककारः। ककारादिदशवर्णवत्। कोऽर्थः ? बैन्दवत्रिकोणाष्टकोणचक्रेषु मध्य- स्थितप्रकाशविमर्शमयदीपद्वयदीपितेषु तद्दशकप्रभाच्छायादशकद्वयमययकारादि- पृथिव्यादिककारादिशब्दादिशकद्वयात्मकं दशार(२चक्रद्वयं जातमित्यर्थः । तदुक्तं कामकलाविलासे- नवकोणमध्यमञ्चास्मिंश्चिद्दीपदीपिते दशके । तच्छायाद्वितयमिदं) चक्रद्वयात्मना दृष्टम् ॥ (श्लो० २९-३०) इति । ननु-"भूततन्मात्रदशकप्रकाशाल्म्बनत्वतः" (१।१६) इत्यत्रैव शब्दादीना- मुक्तत्वात् पुनः "द्विदशारस्फुरद्रूपम्" (१।१६) इत्यत्रापि रूपशब्देनापि कथं अब द्वितीय दशार चक्र का वर्णन करते हैं- द्वितीय दशार चक्र इन्द्रियों के १० रूपों (विषयों) को स्फुटित करता है। इसमें ककार प्रभृति १० वर्णों का विन्यास किया जाता है ॥१६॥ द्वितीय दशार को ही यहाँ द्विदशार कहा गया है। रूप शब्द से इन्द्रियों के १० विषयों का ग्रहण होता है। शब्द आदि बुद्धीन्द्रियों के और वचन आदि कर्मेन्द्रियों के विषयों का स्फुरण करने वाला है यह द्वितीय दशार चक्र। क्रोधीश शब्द से ककार का ग्रहण होता है। यह चक्र ककार आदि १० वर्ण वाला है। इस श्लोक का अभिप्राय यह है कि बैन्दव, त्रिकोण और अष्टकोण चक्र मध्य में स्थित प्रकाशविमर्शमय दो दीपों से आलोकित हैं। इनकी दस प्रभाओं के प्रतिबिम्ब से प्रथम दशार चक्र और द्वितीय दशार चक्र की निष्पत्ति होती है। इसी के साथ यकार प्रभृति दस वर्ण, पृथिवी प्रभृति दस तत्त्व प्रथम दशार में और ककार प्रभृति दस वर्ण, शब्द प्रभृति दस विषय द्वितीय दशार में अभिव्यक्त होते हैं। यह विषय कामकलाविलास में भी वर्णित है- नवयोनि चक्र और मध्यत्रिकोण चक्र के मध्य में स्थित मञ्च, अर्थात् सदाशिवासन स्थानीय बिन्दुचक्र में विराजमान प्रकाशविमर्शमय ज्ञानदीपक की प्रभा की दस किरणों के द्विविध प्रतिबिम्ब से दो प्रकार के दशार चक्रों की निष्पत्ति देखी गई है ॥ यहाँ प्रश्न उठता है कि "भूततन्मात्र" प्रभृति श्लोक में ही शब्द प्रभृति विषयों का वर्णन हो चुका है, फिर "द्विदशार" प्रभृति श्लोक में पुनः रूप शब्द से उन्हीं का ग्रहण १. 'रूप्यन्त' 'वचनादयश्च' नास्ति-ग. घ. ने. ज. झ. उ.। २. कोष्ठान्तर्गतः पाठः कपुस्तकं विहाय क्वापि न दृश्यते ।

२८ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः गृह्यन्ते ? मैवम्, तन्मात्रपदेन भूतसूक्ष्माणामनिन्द्रियगोचराणां ग्रहणम्, रूपशब्देन तु भूतगुणाः शब्दादयः श्रोत्रादिग्राह्या गृह्यन्ते, अतो न विरोधः ॥१६॥ चतुर्दशारमाह— चतुश्चक्रप्रभारूपसंयुक्तपरिणामतः । चतुर्दशाररूपेण संवित्तिकरणात्मना ॥१७॥ खेचर्यादिजयन्तार्णपरसार्थप्रथामयम् । चत्वारि चक्राणि बैन्दवत्रिकोणाष्टकोणप्रथमदशाररूपाणि, तेषां प्रभाश्चतस्रः । विप्रकृष्टत्वात् प्रभामात्रमेव गम्यते । यथा बहवो वृक्षा वनमिति नावयवभेदः, तथा१ । तच्चक्रप्रभाचतुष्टयसंयुक्तस्य द्वितीयदशारस्य सन्निकृष्टत्वादवयवप्रतीति- स्तत्प्रभाचतुष्टयसम्२वेतद्वितीयदशा३रावयवदशकपरिणामत्वात् । चतुर्दशाररूपेण संवित्तिकरणात्मना । संवित्तिः ज्ञानम् । संवित्तिशब्देन क्रियापि लक्ष्यते । करणानि कैसे हो सकता है ? इसका समाधान यह है कि तन्मात्र शब्द से शब्दतन्मात्रा प्रभृति सूक्ष्म भूतों का ग्रहण होता है, जो कि इन्द्रियगोचर नहीं है । रूप शब्द से शब्द प्रभृति भूत गुणों का ग्रहण किया जाता है, जो कि श्रोत्र प्रभृति इन्द्रियों से गृहीत होते हैं। इस तरह से यहाँ कोई विरोध नहीं है ॥१६॥ चतुर्दशार चक्र की भावना इस तरह से की जाती है— चार चक्रों की प्रभा के साथ संयुक्त द्वितीय दशार की प्रभा से चतुर्दशार चक्र निष्पन्न होता है। यह चतुर्दश करणों का प्रतिनिधि है। टकार से लेकर भकार पर्यन्त १४ वर्णों का इसमें विन्यास किया जाता है ॥१७-१८॥ चार चक्र हैं बैन्दव, त्रिकोण, अष्टकोण और प्रथम दशार । इनसे चार प्रभाएँ छिटकती हैं । चतुर्दशार चक्र के इनसे दूर होने से वहाँ इनकी प्रभामात्र का दर्शन होता है । जैसे कि दूरी के कारण वन में वृक्षों की अलग-अलग पहचान नहीं होती, उसी तरह से चतुर्दशार चक्र में इनकी प्रभा की ही प्रतीति होती है, उनके अवयवों की नहीं । इन चार चक्रों की चार प्रभाओं के साथ चतुर्दशार चक्र में द्वितीय दशार के दस अव- यवों का स्पष्ट दर्शन होता है, क्योंकि द्वितीय दशार चक्र की स्थिति उसके पास में ही है । इस तरह से चार चक्रों की चार प्रभाओं और द्वितीय दशार चक्र के दस अवयवों से मिलकर यह चक्र बनता है । इसका यह चतुर्दशार रूप संवित्तिकरणात्मक है । संवित्ति ज्ञान को कहते हैं। इस ज्ञान के साथ क्रिया भी जुड़ी हुई है । इसका यह अभिप्राय हुआ कि यह ज्ञान और क्रिया शक्ति के स्फुरण से आविर्भूत चतुर्दशार चक्र श्रोत्र प्रभृति १. तथा तच्चक्रभेदः—ख. ने. ज. । २. समेत—ख. ग. ज. झ. उ. । ३. दशा- रावयववत् । चतु—ख. ग. घ. ज. झ. ।