भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 58

८ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः कर्णात्, कर्मणि ल्यब्लोपे पञ्चमी, कर्णं प्राप्य पुनः कर्ण एवोपदेशक्रमेणैव पारम्पर्यक्रमेण सम्प्राप्तम् । आदिकर्मणि क्तः । अवनीतलाशब्देन तत्रस्था मनुष्या लक्ष्यन्ते, यथा मञ्चाः क्रोशन्तीति । तेनायमर्थः सम्पद्यते—दिव्यसिद्धमानव- क्रमेणातिरहस्यत्वात् कर्णपरम्परामात्रगम्यमेवेदमिति । अत्र मानवग्रहणं १दिव्य- सिद्धयोरुपलक्षणार्थम् ॥३॥ अनर्हेभ्यो न देयमित्याह— न देयं परशिष्येभ्यो नास्तिकेभ्यो न चेश्वरि । २न शुश्रूषालसानां च नैवानर्थप्रदायिनाम् ॥४॥ परशिष्या एव के येभ्यो न देयम्३ ? ये विद्यान्तरेषु पारम्प४र्यक्रमेणाधिगता- शेषरहस्यपरमार्थाः ५प्राप्तपूर्णाभिषेकाश्च ते परशिष्याः । तेभ्यो न देयम् । “लब्ध्वा 'कर्णात्' इस पद में कर्म में ल्यप् का लोप होकर पञ्चमी हुई है । इस ज्ञान को गुरु शिष्य के कान तक पहुँचाता है । इसी तरह यह ज्ञान एक कान से दूसरे कान तक गुरु- शिष्यपरम्परा से पहुँचता रहता है । 'सम्प्राप्त' पद में आदि कर्म में क्त प्रत्यय हुआ है । अवनीतल शब्द से अवनी (पृथिवी) तल पर रहने वाले मनुष्यों का ग्रहण होता है, जैसे 'मञ्चाः क्रोशन्ति' इस वाक्य में मंच स्थित पुरुषों का ग्रहण किया जाता है । इससे श्लोक का यह अभिप्राय निकलता है कि १दिव्य, सिद्ध और मानव गुरुओं की परम्परा में ही यह अत्यन्त रहस्यभूत ज्ञान मात्र कर्ण-परम्परा से प्राप्त हो सकता है । अवनीतल पद में लक्षणा से प्राप्त मानव शब्द दिव्य और सिद्ध गुरुओं की परम्परा का भी द्योतक है ॥३॥ अयोग्य व्यक्तियों को यह ज्ञान नहीं दिया जाना चाहिये— हे ईश्वरि ! परशिष्य को, नास्तिक को, गुरु की सेवा में आलस्य करने वाले को और गुरु को धन न देने वाले को यह ज्ञान नहीं देना चाहिये ॥४॥ वे परशिष्य कौन हैं, जिनको यह ज्ञान नहीं दिया जायगा ? जो अन्य सम्प्रदायों में गुरु-परम्परा के क्रम से दीक्षित होकर उस सम्प्रदाय के रहस्यों से पूरी तरह परिचित हो चुके हैं और जिनका उस सम्प्रदाय में अभिषेक भी हो चुका है, वे व्यक्ति परशिष्य कहे १. सिद्धदिव्यानामुप-ने. ज. झ. उ. । २. नाशुश्रूषारतानां-ख. ज. झ. उ. । ३. इतः परम् 'इत्यत आह' इत्यधिकम्-ग. घ. ने. ज. झ. उ. ब. । ४. म्पर्येणा-ने. ज. झ. उ. । ५. अप्राप्त-ज. झ. । १. दिव्य, सिद्ध और मानवौघ क्रम की गुरु-परम्परा की चर्चा हम ऊपर पृ० ३ की टिप्पणी में कर चुके हैं ।