योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ७ स्वसंविदो हृदयमिवाविर्भावभूमित्वाद् हृदयम्। अत्र तु योगो नाम 'समस्तवस्तु- समवायसम्बन्धः, तेन भासत इति योगिनी। तदुक्तमभियुक्तैः— देशकालपदार्थात्म यद्यद् वस्तु यथा तथा²। तत्तद्रूपेण या भाति तां श्रये ³सांविदीं कलाम् ॥ इति। (सौ० हृ० ४) परम् उत्कृष्टम्, सर्वज्ञानोत्तरत्वात्। अत एव वक्ष्यति—"एतज्ज्ञात्वा वरारोहे सद्यः खेचरतां व्रजेत्" (१।५) इति। एतत् शृणु विमर्शपदवीं प्रापय ॥२॥ त्वत्प्रीत्या ⁴त्वदेकसामरस्यहेतोः कथयामि। अद्य पुरा न कस्यचिदाख्यात- मतिरहस्यत्वात्, अतो ⁵हेतोर्विशेषतो गोपितव्यम्। आत्माहंभावभावनया भाव- यितव्यमित्यर्थः। अत्यन्तगोपनीयतामेव द्रढयितुमाह— कर्णात् कर्णोपदेशेन सम्प्राप्तमवनीतलम् ॥३॥ सामान्य जन के हृदय में अपना ज्ञान उन्मिषित होता है। यहाँ योग का अर्थ है जगत् की सारी वस्तुओं के साथ ज्ञान का समवाय सम्बन्ध। इससे भासित होने वाली है योगिनी। शिवानन्द महायोगी ¹सौभाग्यहृदयस्तोत्र में कहते हैं कि देश, काल अथवा पदार्थ के रूप में जो भी वस्तु जिस-किसी भी रूप में भासित होती है, उन सभी रूपों में जो भासित होती रहती है, उस सांविदी (ज्ञानमयी) कला की मैं शरण लेता हूँ ॥ यह अनुत्तर ज्ञान सभी लौकिक ज्ञानों से श्रेष्ठ है। इसी लिये आगे (१।५) कहा जायगा कि इस ज्ञान को प्राप्त कर लेने पर व्यक्ति तत्काल परम पद में लीन हो जाता है। इस ज्ञान को तुम अपने मन में बैठाने का प्रयत्न करो ॥२॥ तुम्हारी प्रसन्नता के लिये, शिव और शक्ति के सामरस्य-लाभ के लिये ही इसे मैं सुना रहा हूँ। इससे पहले मैंने इसे किसी को भी नहीं सुनाया है, क्योंकि इसमें गहरा रहस्य छिपा हुआ है। इसी लिये इस ज्ञान को बहुत छिपा कर रखना चाहिये, अपने मन में ही इसकी भावना करनी चाहिये। ज्ञान की अत्यन्त गोपनीयता को ही भगवान् पुनः पुष्ट करते हैं— यह ज्ञान एक कान से दूसरे कान तक उपदेश के क्रम से ही पृथिवी तल पर अवतरित हुआ है ॥३॥ १. सर्व-ने. ज. झ. उ. । २. यथा-घ. ज. झ. उ. । ३. संविदं-ख. ग. घ. ने. ज. झ. उ. । ४. त्वदैकस्थ्य-उ., त्वदेकरहस्य-ने. ज. झ. । ५. 'हेतोः' नास्ति-ने. ज. झ. उ. ।
- यह स्तोत्र नित्याषोडशिकार्णव के वाराणसी संस्करण के परिशिष्ट (पृ० ३०४- ३०७) में प्रकाशित हो चुका है।