भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 56

६ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः सन्ति । तांस्तानर्थानशेषेण साकल्येन, वक्तुं व्यक्तीकर्तुम्, अर्हसि मम विमर्शपदवीं प्रापयितुमर्हसीत्यर्थः ॥१॥ प्रकाशांशेन प्रतिवदति— श्रीभैरव उवाच शृणु देवि महागुह्यं योगिनीहृदयं परम् ॥२॥ त्वत्प्रीतया कथयाम्यद्य गोपितव्यं विशेषतः । १हे देवि ! विश्वसर्जनादि२व्यवहारक्रीडापरे विमर्शविग्रहे। महागुह्यं लोके गोप- नीयम्। यद्वस्तु ३यावत् तत्र न मनः प्रवर्तते तत् तावत्कालमतीन्द्रियगोचरं भवति, अस्य तु सर्वदा मनोवागिन्द्रियातीतत्वान्महागुह्यत्वम् । योगिनीहृदयं योगिन्याः वामकेश्वर तन्त्र में, १चतुःशती (चार सौ श्लोकों वाले) शास्त्र में जो अनेक अविदित अर्थ हैं, उन सबको आप पूरी तरह से मुझे बताइये, जिससे कि वे सारी बातें मेरी समझ में आ जाँय ॥१॥ २प्रकाशस्वरूप भगवान् भैरव इसका उत्तर देते हैं— हे देवि ! इस महागुह्य उत्कृष्ट योगिनीहृदय शास्त्र को तुम सुनो । तुम्हारी प्रसन्नता के लिये ही इसे मैं सुना रहा हूँ । इसे विशेष रूप से गुप्त ही रखना चाहिये ॥२॥ जगत् के सृष्टि-संहार आदि का खेल करने वाले विमर्शस्वरूपिणी हे देवि ! लोक में छिपाने लायक वस्तु को गुह्य कहा जाता है । कोई भी वस्तु जब तक उसको जानने के लिये मन प्रवृत्त नहीं होता, तब तक अज्ञात ही रहती है । योगिनीहृदय में प्रतिपादित किये जाने वाले विषय में तो मन और वाणी की प्रवृत्ति ही नहीं हो पाती, अतः इसको महागुह्य कहा गया है। योगिनीहृदय का अभिप्राय है कि इस ग्रन्थ में योगिनी (स्वसंवित् स्वरूपा भगवती त्रिपुरा) का हृदय (स्वरूप) उसी प्रकार प्रकट हुआ है, जैसे कि १. 'हे' नास्ति-ज. झ. । २. 'व्यवहार' नास्ति-क. ख. । ३. 'यावत्''''प्रवर्तते' नास्ति-ने. ज. झ. उ. । १. अमृतानन्द ने दीपिका में चार सौ श्लोकों वाले नित्याषोडशिकार्णव को चतुःशती- शास्त्र के नाम से अनेक स्थलों पर उद्धृत किया है। अमृतानन्द की इस उक्ति से भी चतुःशती-शास्त्र से योगिनीहृदय की भिन्नता सिद्ध होती है। २. प्रकाश और विमर्श शब्दों की विभिन्न आचार्यों द्वारा की गई व्याख्या के लिये नित्याषोडशिकार्णव का उपोद्घात (पृ० ८३-८४ टि०) तथा लुप्तागमसंग्रह द्वितीय भाग का उपोद्घात (पृ० ४०) देखिये।

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