योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ५ देवदेव महादेव परिपूर्णप्रथामय । वामकेश्वरतन्त्रेऽस्मिन्नज्ञातार्थास्त्वनेकशः ॥१॥ तांस्तानर्थानशेषेण वक्तुमर्हसि भैरव । विश्वस्य भरणाद् रमणाद् वमनात् सृष्टिस्थितिसंहारकारी भैरवः परम- शिवः । देवदेव देवा द्योतनात्मानो रव्यादयस्तेषां देवः प्रकाशकः । महादेवो महाप्रकाशात्मा । अयमर्थः—तव महाप्रकाशोत्मकत्वात् त्वमेव विश्वं भासयसि, न त्वां कोऽपि भासयितुमलमिति । तत्र श्रुतिः— न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ इति । (क० उ० ५।१५) परिपूर्णप्रथामय प्रथा ज्ञानम्, परिपूर्णप्रथा विश्वविषयिणी ज्ञप्तिः, तन्मय तद्रूप । तत्र सर्वज्ञत्वात् त्वमेव सर्वान् बोधयितुमर्हसि, न त्वां कोऽपि बोधयितुमलमिति । अतो वामकेश्वरतन्त्रे चतुश्शतीशास्त्रे, अज्ञातार्था अविदितार्थाः, अनेकशो बहवः विमर्शस्वरूपा देवी प्रकाशस्वरूप भगवान् भैरव से पूछती है— हे देवदेव महादेव परिपूर्णप्रथामय भैरव ! इस पूर्वोपदिष्ट वामकेश्वर तन्त्र में अनेक विषय अज्ञात हैं। उन विषयों को आप पूरी तरह से मुझे समझाइये ॥१॥ विश्व का भरण, रमण और वमन करने से उसकी सृष्टि, स्थिति और संहार का कारणभूत भैरव¹ परमशिव ही है । इसको देवदेव इसलिये कहते हैं कि यह जगत् के प्रकाशक सूर्य प्रभृति देवों को भी प्रकाश देने वाला है। इस तरह से महाप्रकाश स्वरूप होने से यह महादेव है। देवी के प्रश्न का तात्पर्य यह है कि आप महाप्रकाश स्वरूप हैं, अतः आप ही सारे जगत् को भासित करते हैं, आपको प्रकाशित करने में कोई भी समर्थ नहीं है । कठोपनिषद् में बताया गया है कि वहाँ सूर्य प्रकाशित नहीं होता और न चाँद- तारे ही वहाँ प्रकाशित होते हैं। यह आकाशीय विद्युत् भी वहाँ नहीं चमकती, तब इस भौतिक अग्नि की बात ही क्या है ? उस ब्रह्म के प्रकाश के बाद ही यह सब प्रकाशित होते हैं, इस ब्रह्म से प्रकाश प्राप्त कर लेने के उपरान्त ही इनमें प्रकाश दिखाई पड़ता है ।। प्रथा ज्ञान को कहते हैं । परिपूर्णप्रथा का अर्थ हुआ सारे विश्व का ज्ञान । इस तरह से हे भगवन् भैरव ! आप परिपूर्णप्रथामय हैं । आप सर्वज्ञ हैं, अतः आप ही सबको ज्ञान प्रदान कर सकते हैं, आपको समझाने वाला दूसरा कोई नहीं है । अतः इस (पूर्वोपदिष्ट) १. शक्तत्वात्-ख. । १. भैरव शब्द के पारिभाषिक अर्थ को समझने के लिये विज्ञानभैरव का उपोद्घात (का० सं०) द्रष्टव्य है । आनन्दलहरी ग्रन्थ का भाषानुवाद (पृ० १४-१५ द्वितीय संस्करण) देखिये ।