भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 54

४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः इह खलु भगवान् प्रकाशमूर्तिः परमशिवः स्वात्मानं विमर्शांशेन विभज्य पश्यन्त्यादिक्रमात् पृच्छति— श्रीदेव्युवाच इति। शिव एवाहं वैखरीपर्यन्तं व्यापृत्य विमर्शांशेन पृष्टवानिति यावत्। उवाचेति लिडुत्तमपुरुषैकवचनम्। भूतत्वं च वक्तव्यस्य सदातनत्वात्। अनद्य- तनत्वमकालकलितत्वात्। परोक्षत्वमनिन्द्रियगोचरत्वात्। अनेन “श्रीभैरव उवाच” इत्येतदपि व्याख्यातम्। प्रकाशात्मकः परमशिवोऽहमेव विश्वानुग्रहपरः परा-पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरीक्रमेण व्यापृत्य विमर्शांशेन प्रष्टा भूत्वा प्रकाशांशेन प्रतिवचनदाताऽपि सन् तन्त्रं समवतारयामीत्यर्थः। तदुक्तं श्रीमत्स्वच्छन्दे— गुरुशिष्यपदे स्थित्वा स्वयं देवः सदाशिवः। प्रश्नोत्तरपरैर्वाक्यैस्तन्त्रं समवतारयत्॥ (स्व० त० ८।३१) इति। ‘श्रीदेव्युवाच’ इस वाक्य का अभिप्राय यह कि प्रकाशमूर्ति परमशिव अपने को विमर्शरूप में विभक्त कर ^१पश्यन्ती, मध्यमा और अन्ततः वैखरी वाणी का सहारा लेकर प्रश्न पूछते हैं। मैं स्वयं शिव ही वैखरी पर्यन्त अपना विस्तार कर विमर्शरूप में प्रश्न करता हूँ। ‘उवाच’ यह लिट् लकार के उत्तम पुरुष का एक वचन है। वर्तमान काल के स्थान पर भूतकाल का प्रयोग यहाँ इस लिये किया है कि इस वक्तव्य का सार्वकालिक महत्त्व है। काल इसको निगल नहीं सकता, इसलिये अनद्यतन काल का और यह ज्ञान इन्द्रियों का विषय नहीं है, अतः परोक्ष भूतकाल का प्रयोग यहाँ किया गया है। ‘श्रीदेव्युवाच’ की इस व्याख्या से ‘श्रीभैरव उवाच’ इस वाक्य की भी व्याख्या हो जाती है। इससे तात्पर्य यह निकला कि गुरुस्थानीय मैं प्रकाशात्मक परमशिव ही विश्व पर अनुग्रह करने की इच्छा से परा-पश्यन्ती-मध्यमा और वैखरी पर्यन्त अपना विस्तार कर विमर्शमयी देवी का स्वरूप धारण कर लेता हूँ, शिष्य बन जाता हूँ। इस तरह से शिष्य के रूप में मैं स्वयं ही प्रश्न करता हूँ और स्वयं ही प्रकाशात्मक गुरु का स्वरूप धारण कर उन प्रश्नों का उत्तर देकर तन्त्रशास्त्र की अवतारणा करता हूँ। महास्वच्छन्द शास्त्र में इस विषय को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि स्वयं सदाशिव देव ही गुरु और शिष्य का स्वरूप धारण कर प्रश्न और प्रतिवचन की पद्धति से तन्त्रशास्त्र की लोक में अवतारणा करते हैं। जानी जाती है, त्रिपुरा सम्प्रदाय में हमें दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ गुरुओं की परम्परा के क्रम से प्राप्त हुई है। १. इस विषय की विस्तार से चर्चा हमने विज्ञानभैरव के भाषानुवाद (पृ० ५-६) में की है।