योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३ अनन्योद्घाटितं दिव्यागमकोषगृहान्तरम् । उद्घाट्यते मयेदानीं महार्थो गृह्यतां बुधैः ॥७॥ तदनेकार्थसन्दर्भनानासंकेतसंकुलम् । विवृणोम्यमृतानन्दः शिवयोरेव शासनात् ॥८॥ १अन्यथाऽनादिसंसारे किं नेदं व्याकृतं पुरा । तदा न सन्ति सन्तः किं किं वा नात्र प्रयोजनम् ॥९॥ शिवादिकुरुपर्यन्तं पारम्पर्यक्रमागतम् । एतज्ज्ञानं मया लब्धमक्रमाणांमगोचरम् ॥१०॥ घर के भीतर छिपे हुए खजाने के समान इस दिव्य आगम का रहस्य अभी तक किसी¹ ने उद्घाटित नहीं किया था। अब मैं उसको प्रकट कर रहा हूँ। विद्वानों को चाहिये कि वे इस महार्थ² से लाभ उठावें ॥७॥ यह योगिनीहृदय नामक ग्रन्थ अनेक विषयों, सन्दर्भों और संकेतों से भरा हुआ है। मैं अमृतानन्द भगवान् शिव और पराम्बा की आज्ञा से ही इन सब विषयों की व्याख्या कर रहा हूँ ॥८॥ अन्यथा इस अनादि संसार में अब तक इस ग्रन्थ की व्याख्या क्यों नहीं हुई ? क्या उस समय इस विषय को जानने वाले विद्वान् नहीं थे ? अथवा इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी ? ॥९॥ शिव से लेकर अपने गुरु तक चली आ रही परम्परा से क्रमशः यह ज्ञान मुझे प्राप्त हुआ है। इस ³क्रमपरम्परा से वंचित व्यक्तियों के लिये इस विषय को समझ पाना कठिन है ॥१०॥ १. नवमदशमश्लोकयोर्विपर्ययः-क. ।
- अमृतानन्द की इस उक्ति से भी दोनों ग्रन्थों की भिन्नता सिद्ध होती है, क्योंकि योगिनीहृदय की अब तक कोई प्राचीन व्याख्या उपलब्ध नहीं हुई है। इसके विपरीत नित्याषोडशिकार्णव की अनेक प्राचीन व्याख्याओं का उल्लेख मिलता है। उनमें से कुछ उपलब्ध भी हैं।
- महार्थ का तात्पर्य यहाँ 'बहुमूल्य अर्थ' तो है ही, साथ ही टीकाकार इस शब्द से यह भी दिखाना चाहते हैं कि यह व्याख्या त्रिपुरा सम्प्रदाय की क्रम परम्परा का अनुसरण करतो है। क्रम सम्प्रदाय के 'क्रमश्चतुष्टयार्थः' और 'क्रमः पञ्चार्थः' नामक दो विभाग हैं। संकेतपद्धति जैसे ग्रन्थों के प्रमाण पर अमृतानन्द ने अपनी व्याख्या में प्रथम पक्ष को अंगीकार किया है। द्वितीय पक्ष का परिचय महेश्वरानन्द की महार्थमञ्जरी और उसकी स्वोपज्ञ व्याख्या में मिलता है।
- यहाँ क्रम शब्द क्रम सम्प्रदाय का बोधक न होकर गुरु परम्परा के क्रम को सूचित करता है। ज्ञान की परम्परा, जो कि तन्त्रशास्त्र में ओघ या ओघवल्ली शब्द से