भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः विमर्शरूपिणी शक्तिरस्य विश्वगुरोः परा । परिस्फुरति सैकापि नानानामा¹र्थरूपिणी ॥३॥ पश्यन्त्यादिक्रमादेतौ जातौ प्रश्नोत्तरात्मना² । तन्त्रावतारं तन्वाते सर्वत्रानुजिघृक्षया ॥४॥ तद्वामकेश्वरे तन्त्रे सूचितार्थान् परापरान् । व्यक्तीकर्तुं प्रयतते योगिनीहृदयेऽधुना ॥५॥ मानुषीहृदयं मर्त्यो वेत्ति नैकोऽपि तत्त्वतः । योगिनीहृदयं ज्ञातुं कः समर्थः शिवं विना ॥६॥ इस विश्वगुरु शिव की विमर्शस्वरूपिणी परा शक्ति एक ही है, किन्तु इस जगत् में वह नाना प्रकार के नाम और रूपों में भासित होती रहती है ॥३॥ यह परम शिव और परा शक्ति परा अवस्था से उतर कर पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी के क्रम से गुरु और शिष्य के रूप में प्रकट होते हैं और प्रश्न-प्रतिवचन पद्धति से सब प्राणियों पर अनुग्रह करने की दृष्टि से तन्त्रशास्त्र की अवतारणा¹ करते हैं ॥४॥ इसी पद्धति से वामकेश्वर तन्त्र उपदिष्ट हुआ है। उसमें अनेक मुख्य और गौण विषयों की पूर्वापर क्रम से मात्र सूचना दी गई है। प्रस्तुत ग्रन्थ² योगिनीहृदय में उनके स्पष्टी- करण का प्रयत्न किया जा रहा है ॥५॥ कोई भी मनुष्य साधारण स्त्री के हृदय को भी ठीक तरह से नहीं जान पाता । ऐसी स्थिति में शिव के अनुग्रह के बिना योगिनी के हृदय को जानने में कौन व्यक्ति समर्थ हो सकता है ? ॥६॥ १. नामानु-ज. झ. उ. । २. दिना-ख. । पाल का कार्य है, उसी तरह भगवती महात्रिपुरसुन्दरी का सान्निध्य (सामीप्य अथवा साहित्य) गणेश और बटुक के प्रसाद से ही मिल सकता है । इसीलिये त्रिपुरा सम्प्रदाय के प्रायः सभी ग्रन्थों के प्रारम्भ में इनकी स्तुति मिलती है । १. इस विषय का विस्तार हमने विज्ञानभैरव के भाषानुवाद (पृ० ३-६) में 'प्रश्नोत्तरतत्त्वनिर्णय' शीर्षक से किया है । २. वामकेश्वरतन्त्र (नित्याषोडशिकार्णव) और योगिनीहृदय, दीपिकाकार ने दो अलग-अलग ग्रन्थ माने हैं। इस विषय पर हम तन्त्रयात्रा (पृ० ३५-३८) और नित्याषोडशिकार्णव के उपोद्घात (पृ० ११-१३) में विचार कर चुके हैं ।