भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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योगिनीहृदयम् दी पि का भा षा नु वा द सं व लि त म् चक्रसंकेतः प्रथमः जगद्वन्द्यावेतौ गणपबटुकौ विश्वविनुतौ जगद्रक्षाशीलौ जपनिरतसामीप्यफलदौ¹। रथाङ्गे सन्नद्धौ रविशशिकृशानुज्ज्वलदृशो मयि स्यातां रक्षापरवशधियौ सद्गुणमयौ ॥१॥ ²तन्नित्यं ज्योतिषां ज्योतिर्जयत्येकमनुत्तरम्³। न यद्⁴ भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः⁵॥२॥ सारा संसार जिनकी वन्दना और स्तुति करता है, जो सदा जगत् की रक्षा करने में लगे रहते हैं, जप में लगे साधकों को जो ¹सामीप्य नामक मोक्ष प्रदान करते हैं, श्रीचक्र के साथ जो सदा संयुक्त हैं, सूर्य-चन्द्र और अग्निरूपी तीन उज्ज्वल नेत्रों को जो धारण करने वाले हैं, ऐसे सारे सद्गुणों के निधान गणेश और बटुक मेरी रक्षा करने में लग जांय ॥१॥ सभी प्रकाशात्मक वस्तुओं को प्रकाशित करने वाली वह एक और नित्य अनुत्तर शिवात्मक ज्योति ही सर्वश्रेष्ठ है। इसको सूर्य, चन्द्र और अग्नि भी प्रकाशित नहीं कर सकते। अभिप्राय यह है कि उस प्रकाशात्मक ज्योति से ही सब कुछ प्रकाशित होता है ॥२॥ १. साहित्यवरदौ-ख. ग. ज. झ. ने. उ. । २. य-क. । ३. त्तमम्-क. । ४. तद्-क. । ५. तारकाः-ग. झ. उ. । १. गणेश और बटुक भगवती महात्रिपुरसुन्दरी के निवासस्थान श्रीचक्र के द्वार- रक्षक हैं। श्रीचक्र के बाह्य द्वार पर इनकी पूजा का विधान है (यहीं पूजासंकेत का १०९ वां श्लोक देखिये)। दीपिका की प्रायः सभी मातृकाओं में 'सामीप्यफलदौ' के स्थान पर 'साहित्यवरदौ' पाठ मिलता है। मुद्रित पुस्तक के इस पाठ को केवल उ. मातृका का समर्थन मिलता है। इन दोनों पाठों के अर्थ में कोई विशेष अन्तर नहीं है, तो भी हमने यहाँ 'सामीप्यफलदौ' पाठ को ही मूल में इस लिये रखा है कि इससे सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य के नाम से पुराण, आगम आदि में चतुर्धा विभक्त मुक्ति का बोध सरलता से हो जाता है। जैसे राजदरबार में पहुँचा देता द्वार-