भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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अध्याय २ मन्त्र ८६ ३१५ वृत्ति पर जीवनयापन करे। जिससे कि उसके शरीर में चर्बी की वृद्धि न हो तथा उसको सतत विचरण करते रहना चाहिए। वह हाथ रूपी पात्र के द्वारा या मुख रूपी पात्र के द्वारा भिक्षा ग्रहण करते हुए जीवन व्यतीत करे॥ आहारस्य च भागौ द्वौ तृतीयमुदकस्य च। वायोः संचरणार्थाय चतुर्थमवशेषयेत् ॥ ७७॥ संन्यासी को पेट के चार भागों में से दो भाग में आहार (भोजन) ग्रहण करना चाहिए। एक भाग में जल तथा एक भाग वायु-संचरण के लिए रिक्त रखना चाहिए ॥ ७७॥ भैक्षेण वर्तयेन्नित्यं नैकान्नाशी भवेत्क्वचित्। निरीक्षन्ते त्वनुद्विग्नास्तद्गृहं यत्नतो व्रजेत् ॥ ७८ ॥ (संन्यासी) सतत भिक्षावृत्ति पर ही आश्रित रहे। हमेशा एक ही घर से भोजन नहीं ग्रहण करना चाहिए। जो शान्त-भाव से उसकी राह देखते हों, उन्हीं के यहाँ प्रयासपूर्वक भोजन के लिए जाना चाहिए ॥ ७८ ॥ पञ्चसप्तगृहाणां तु भिक्षामिच्छेत्क्रियावताम्। गोदोहमात्रमाकाङ्क्षेत्रिष्क्रान्तो न पुनर्व्रजेत् ॥७९ संन्यासी को श्रेष्ठ आचरण वाले पाँच या सात घरों में भिक्षा के लिए जाना चाहिए तथा गौ के दोहन में जितना समय लगता है, उतनी ही देर तक प्रतीक्षा करनी चाहिए। वह जहाँ से एक बार भिक्षा ग्रहण कर ले, वहाँ पुनः नहीं जाना चाहिए ॥ ७९ ॥ नक्ताद्वरश्श्रोपवास उपवासादयाचितः। अयाचिताद्वरं भैक्षं तस्माद्भैक्षेण वर्तयेत् ॥ ८० ॥ रात्रि के आहार (भोजन) से उपवास अधिक श्रेष्ठ है, उपवास की अपेक्षा अयाचित अर्थात् बिना माँगी हुई भिक्षा अधिक श्रेष्ठ है। अयाचित भिक्षा की अपेक्षा माँगकर खाना कहीं अधिक श्रेष्ठ है। अतः यथा सम्भव भिक्षा का ही आश्रय लेना चाहिए ॥ ८० ॥ नैव सव्यापसव्येन भिक्षाकाले विशेद्गृहान्। नातिक्रामेद्गृहं मोहाद्यत्र दोषो न विद्यते ॥ ८१ ॥ भिक्षा काल में सव्य-अपसव्य (दायें-बायें) मार्ग से घर में प्रविष्ट नहीं होना चाहिए। जिस घर में किसी तरह का दोष न हो, उसे भूल या मोह से भी नहीं छोड़ा जाना चाहिए (वहाँ भिक्षा ग्रहण कर लेनी चाहिए) ॥ श्रोत्रियान्नं न भिक्षेत श्रद्धाभक्तिबहिष्कृतम्। व्रात्यस्यापि गृहे भिक्षेच्छ्रद्धाभक्तिपुरस्कृते ॥८२ यदि श्रोत्रिय अर्थात् वेदज्ञ श्रद्धा-भक्ति से विहीन हो, तो उसके यहाँ भिक्षा नहीं स्वीकार करनी चाहिए तथा जो संस्कार विहीन (व्रात्य) भी यदि श्रद्धा-भक्ति रखता हो, तो उसके यहाँ भिक्षा ग्रहण करनी चाहिए॥ माधूकरमसंकॢप्तं प्राक्प्रणीतमयाचितम्। तात्कालिकं चोपपन्नं भैक्षं पञ्चविधं स्मृतम् ॥ ८३ ॥ (संन्यासियों की) भिक्षा पाँच तरह की कही गयी है- असंकल्पित माधूकर, प्राक्प्रणीत, अयाचित, तात्कालिक तथा उपपन्न ॥ ८३ ॥ मनः संकल्परहितांस्त्रीन्गृहान्पञ्च सप्त वा। मधुमक्षिकवत्कृत्वा माधूकरमिति स्मृतम् ॥ ८४ ॥ मन में किसी भी तरह का संकल्प किये बिना किन्हीं तीन, पाँच अथवा सात घरों में से मधुमक्खी के सदृश थोड़ी-थोड़ी भिक्षा ग्रहण करना असंकल्पित माधूकर है ॥ ८४ ॥ प्रातःकाले च पूर्वेद्युर्भक्तैः प्रार्थितं मुहुः। तद्भैक्षं प्राक्प्रणीतं स्यात्स्थितिं कुर्यात्तथापि वा ॥८५ प्रातःकाल अथवा पिछले दिन कोई भी मनुष्य भक्तिपूर्वक भिक्षा के लिए निवेदन करे, तो उसके यहाँ जो भिक्षा ग्रहण की जाती है, उसे प्राक्प्रणीत भिक्षा कहते हैं ॥ ८५ ॥ भिक्षाटनसमुद्योगाद्येन केन निमन्त्रितम्। अयाचितं तु तद्भैक्षं भोक्तव्यं च मुमुक्षुभिः ॥ ८६ ॥ भिक्षा के लिए विचरण करते समय संन्यासी को यदि कोई (व्यक्ति) निमंत्रित करे, तो उस (व्यक्ति) के यहाँ (अयाचित) भिक्षा ग्रहण कर लेना चाहिए ॥ ८६ ॥