१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६४ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् रखी है ॥ ११ ॥ शास्त्र के बिना सिद्धि तीनों लोक में कहीं दिखाई नहीं देती । इसलिए मेलन ( योग ) का देने वाला, शास्त्र का देने वाला और अभ्यास का कराने वाला गुरु भगवत स्वरूप ही है, ऐसा समझ कर उसका आश्रय लेना चाहिये और इस शास्त्र को प्राप्त कर लेने पर किसी अन्य के सम्मुख प्रकट न करना चाहिए ॥१२—१३ ॥ इसलिए इसको हर तरह से प्रयत्न करके गुप्त रखना चाहिये और जहाँ कहीं इस दिव्य योग का ज्ञाता गुरु रहता हो, वहाँ उसके पास जाकर खेचरी विद्या को ग्रहण करके सम्यक रूप से इसका अभ्यास करना चाहिए ॥ १४—१५ ॥ अनया विद्यया योगी खेचरीसिद्धिभाग्भवेत् । खेचर्या खेचरीं युञ्जन् खेचरीबीजपूरया ॥१६ खेचराधिपतिर्भूत्वा खेचरेषु सदा वसेत् । खेचरावसथं वह्निसम्बुमण्डलभूषितम् ॥१७ आख्यातं खेचरीबीजं तेन योगः प्रसिध्यति । सोमांशनवकं वर्णं प्रतिलोमेन चोद्धरेत् ॥१८ तस्मात् त्र्यंशकमाख्यातमक्षरं चन्द्ररूपकम् । तस्मादप्यष्टमं वर्णं विलोमेनापरं मुने ॥१९ तथा तत्परमं विद्धि तदादिरपि पञ्चमा । इन्दोश्च बहुभिन्नं च कूटोऽयं परिकीर्तितः ॥२० योगी को इस विद्या द्वारा खेचरी शक्ति की प्राप्ति होती है । खेचरी में खेचरी के बीज सहित खेचरी का योग करने से साधक खेचरों ( देवताओं ) का अधीश्वर बनकर सदा उन्हीं में रहता है । खेचर का प्रतीक 'ह' कार आवसथ ( धारणा ) का 'ई'कार, अग्नि का 'रकार और जल का 'म'कार है । इन सबका योग करने से 'ह्रीं' होता है जो कि खेचरी का बीज मन्त्र है और इसी से खेचरी