१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअब इस चेतना का लाभ उठाकर एकदम विद्रोह किया जाए या पूर्व नियोजित संकेत के अनुसार 31 मई की राह देखी जाए? दिल्ली के विद्रोह की वार्त्ता सुन अन्यत्र क्या योजना चल रही है? दिल्ली की जल्दबाजी से जैसा घोटाला हुआ वैसे ही अन्य स्थानों की सम्मति लिये बिना हम भी विद्रोह करें और घोटाला फैल गया तो क्या होगा? ऐसी अनेक अनिश्चिताओं के कारण क्रांतिकारी नेताओं को-आगे क्या होना है-उसकी प्रतीक्षा करते हुए अपनी-अपनी जगह रूके रहना पड़ा। मंद गति जैसा क्रांति का प्राण हरण करनेवाला दूसरा विष नहीं है। क्रांति का विस्तार जितना त्वरित और जितना आकस्मिक होता है उतनी ही उसकी विजय की संभावना अधिक होती है। यह विस्तार का वेग शिथिल तो शत्रु को संरक्षण का अवसर मिल जाता है। जो पहले उठते हैं उनका उत्साह यह देखकर घटने लगता है कि अपने साथ कोई नहीं आ रहा और जो बाद में आते हैं उनके रास्ते में बीच के अवसर का लाभ लेनेवाला चतुर शत्रु अनेक बाधाएं खड़ी कर देता है। इसलिए उठाव और प्रसार के बीच में अधिक समय जाने देना क्रांतियुद्ध के लिए हमेशा हानिकारक होता है। फिर भी जहां तक बने, एक साथ विद्रोह करना निश्चित होते हुए भी बीच में ही आ पड़े पेंच के कारण विभिन्न स्थानों के क्रांतिकारी नेताओं को न ठहरते बन रहा था और न आगे बढ़ते। क्रांतिकारी पक्ष की इस अपरिहार्य स्तब्धता का अंग्रेजों को बहुत लाभ हुआ। अंग्रेजों के पैर हिंदुस्थान में पड़ने के बाद से आज तक उन्हें ऐसी भयानक वार्त्ता सुनने का अवसर कभी भी नहीं आया था। इस मई माह में बैरकपुर से सीधे आगरा तक कोई सात सौ पचास मील में केवल एक गोरी रेजिमेंट थी। ऐसी स्थिति में क्रांतिकारी पक्ष के पूर्व संकेतानुसार यदि यह सारा प्रदेश एकदम उठ गया होता तो दस इंग्लैंड भी इकट्ठा हो जाते तो भी हिंदुस्थान कब्जे में न रहता। यह गोरी रेजिमेंट दानापुर में रखी गई थी। उधर पंजाब में सरहद पर पर्याप्त गोरी सेना थी। परंतु उसे उधर-से-अधिक गोरी सेना को जमा करना। उसी समय अंग्रेजों के भाग्य से ईरान की लड़ाई समाप्त हुई थी-इसलिए उस सेना को हिंदुस्थान जल्दी आने के आदेश हुए। ईरान की लड़ाई सामप्त होते ही अंग्रेजों ने चीन से बखेड़ा खड़ा कर उधर सेना भिजवाई थी। परंतु हिंदुस्थान में यह भयानक आंधी आते ही केनिंग ने चीन की ओर जानेवाली सारी सेना बीच में ही रोक लेने का निश्चय किया। इन दो सेनाओं के सिवाय रंगून में स्थित गोरी रेजिमेंट भी कलकत्ता में रख ली गई और मद्रास फ्युजिलयर नामक गोरी सेना को तैयार रहने को लिख गया। ये गोरी सेनाएं जब सभी दिशाओं से यथासंभव वेग से कलकत्ता के लिए चली थीं तब केनिंग ने सिपाहियों के मन को फिर से एक बार कब्जे में लेने का प्रयास किया। उसने कहा, "आपकी जाति और वर्ण विषयक रीति में हाथ डालकर हिंदुस्थान के धर्म को दुखाने का हमारा कोई इरादा नहीं हैं सिपाही चाहें तो कारतूस अपने हाथों से बना लें। कंपनी का नमक जिन्होंने खाया है उनका ही यह विद्रोह करना पाप है।" इस प्रकार की 1857 का स्वातंत्र्य समर - 116