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अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

by महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी

DevanagariSanskritpublished540 pages
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१० | अभिज्ञानशाकुन्तलम्

नटी—तहं । [ तथा ] ( ^१ गायति )

ईसीसिचुम्बिआईं भमरेहिं सुउमारकेसरसिहाई ।
ओदंसयन्ति दअमाणा पमदाओ सिरिषकुसुमाई ॥ ४ ॥
[ ^२ ईषद्वीषच्चुम्बितानि भ्रमरैः सुकुमारकेसरशिखानि ।
अवतंसयन्ति दयमानाः प्रमदाः शिरीषकुसुमानि ॥ ४ ॥ ]

सूत्रधारः—आर्ये ! साधुगीतम् । अहो ^३ रागबद्धचित्तवृत्तिरालिखित इव सर्वतो रङ्गः । तदिदानीं ^४ कतमत् प्रकरणमाश्रित्यैनमाराधयामः ।


कमनीयाः परिणामरमणीयाः = सायंकालशोभनाः भवन्ति । अत्र शृङ्गार-परिकर-स्वभावोक्त्यलङ्काराः आर्यावृत्तञ्च ॥ ३ ॥

नटी—तथा गायति = आज्ञापयत्यार्यस्तथैवानुतिष्ठामि इत्यभिधाय गायति = गानं गानं करोति, ईषदिति ।

अन्वयः—दयमानाः प्रमदाः भ्रमरैः ईषद्वीषत् चुम्बितानि सुकुमारकेसरशिखानि शिरीषकुसुमानि, अवतंसयन्ति ।

ईषद्विति—दयमाना दयन्ते इति दयमानाः = ग्लानिशङ्कया दयां कुर्वन्त्यः प्रमदाः-प्रकृष्टो मदो रूपसौभाग्यजनितो गर्वो यासां ताः प्रमदाः = वराङ्गनाः कामिन्यो युवतयः, भ्रमरैः = रोलम्बैः—ईषद्वीषद् = अल्पालपं, शनैः शनैः सरभसोपक्रममन्तरा चुम्बितानि = स्पृष्टानि, आस्वादितानि सुकुमारकेशरशिखानि-सुकुमाराः = मृदवः केशराणां = किंजल्कानां शिखा = अग्रभागः येषां तानि सुकुमारकेशरशिखानि शिरीषकुसुमानि-शिरीषस्य कुसुमानि शिरीषकुसुमानि शिरीषसुमनानि अवतंसयन्ति = कर्णभूषणे कुर्वन्ति । अत्र परिकरकाव्यालङ्कारौ, आर्याच्छन्दश्च ॥ ४ ॥

सूत्रधारः—आर्ये ! साधु = मधुरं लयतालादिललितं यथा स्यात् तथा गीतं = गानं


नटी—ठीक है : ( गाती है )
जिनपर गुनगुन करते हुए भौंरे रसपान कर रहे हैं और जिनकी पतली पंखुड़ियों के अग्रभाग बड़े ही सुकुमार हैं ऐसे इन कोमल शिरीष पुष्पों को दयालु स्त्रियां अपनी छोटी-छोटी अंगुलियों से पकड़कर शनैः शनैः अलंकार रूप से अपने शरीरों पर धारण कर रही है ॥ ४ ॥

विशेष—कविवर कालिदास ने अपने काव्यों में शिरीष पुष्प को अत्यन्त कोमल कहा है कुमारसंभव में वे कहते हैं कि शिरीषपुष्प भौरों के पैर सह सकता है ! किन्तु पक्षियों के नहीं 'पदं सहेत भ्रमरस्य पेलवं शिरीषपुष्पं न पुनः पतत्त्रिण' । शिरीष पुष्प अत्यन्त कोमल पंखुड़ियों वाला कर्णभूषण जैसा होता है । अतः उसका वर्णन कर्णभूषण के लिये उपयुक्त ही है ।

शिरीष पुष्पों पर दया करने का अभिप्राय यह है कि भौरों ने पहले ही इसे थोड़ा-थोड़ा चूस लिया है सहसा स्पर्श करने पर शायद यह बिखर न जाय । इससे शकुन्तला का दुष्यन्त से प्रेम संकेत भी कवि ने माना है—शकुन्तला, भ्रमर और अप्सरा की पूर्व सूचना के निमित्त क्रमशः यहाँ शिरीष, भ्रमर और प्रमदा शब्द प्रयुक्त हैं । ईषद ईषद् दो बार प्रयुक्त होने से शिरीषपुष्पों की अत्यन्त कोमलता व्यक्त होती है । युवतियां शिरीष पुष्पों को तोड़कर अपने कानों का आभूषण बनाती है, किन्तु उन्हें तोड़ना नहीं चाहती, उन्हें तोड़ने में दया आती है ।

सूत्रधार--वाह वाह आर्ये ! तुमने बड़ा ही सुन्दर गीत गाया । तुम्हारे राग-रागिणी युक्त इस


पाठा०-१. इति गायति । २. क्षणं चुम्बितानि । ३. रागापहृत, रागनिविष्ट । ४. कतमं प्रयोगम् ।

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प्रथमोऽङ्कः ११

नटी—णं अज्जमिस्सेहिं पढमं एव्व आणत्तं अहिण्णाणसाउन्दलं णाम अपुव्वं णाडअं पओए अधिकरीअदुत्ति । [ नन्वार्यमिश्रैः प्रथममेवाज्ञप्तमभिज्ञानशाकुन्तलं नामापूर्वं नाटकं प्रयोगेऽधिक्रियतामिति । ]

सूत्रधारः—आर्ये सम्यगनुबोधितोऽस्मि । अस्मिन् क्षणे विस्मृतं खलु मया । कुतः—


श्रावितम् । अहो = इत्याश्चर्यो रागबद्धचित्तवृत्तिः—रागेण = गीतरागेण बद्धा = आर्वाजिता चित्तस्य = मनसः वृत्तिः = व्यापारो यस्य सः रागबद्धचित्तवृत्तिः, आलिखितः = चित्रित इव निश्चेष्टः इव सर्वतः = सर्वासु दिक्षु, रङ्गः = रङ्गवासी जनः, तत् = तस्मात् कतमं = कीदृशप्रयोगः = प्रयुज्यते इति प्रयोगः = नाट्यगतं प्रयोगमाश्रित्य एनं = रङ्ग स्थितं लोकम् आराधयामः = अनुरञ्जयामः ।

नटी—आर्यमिश्रैः = पूज्यैर्भवद्भिः, प्रथममेव = पूर्वमेव आज्ञप्तं = आदिष्टं, यत् अपूर्वं = अभिनवम् अभिज्ञानशाकुन्तलं नाम नाटकम् प्रयोगे = अभिनये अभिनीयताम् = उपस्थाप्यताम् ।

सूत्रधारः—आर्ये ! = देवि ! सम्यक् = सुष्ठु अनुबोधितः = स्मारितः, अस्मि = अहम् अस्मिन् = एतस्मिन् क्षणे = काले विस्मृतं खलु = निश्चयेन मया = सूत्रधारेण । कुतः = यतः ।


मनोहर गीत से आकृष्टचित्त होकर यह रङ्गस्थलवर्ती दर्शक समाज चित्रलिखित सा निस्तब्ध प्रतीत हो रहा हैं । अच्छा, तो बताओ, अब इस विद्वत्समाज के सामने कौन से नाटक का प्रयोग (खेल दिखाकर इसे अनुरञ्जित) करूँ !

विशेष—सूत्रधार कह चुका है कि कविवर कालिदास द्वारा रचित अभिनव नाटक खेलना है । यहां पुनः नटी से पूछता है किस प्रयोग से रङ्गशालावर्ती पुरुषों का मनोरञ्जन करूँ । इससे मालूम पड़ता है कि नटी के मधुर गान से सुध-बुध खोकर सूत्रधार प्रसंग ही भूल गया । और सूत्रधार ने रंगस्थलवर्ती लीगों को चित्रलिखित के समान स्थिर बताया । वस्तुतः मनोमोहक गीत का ऐसा ही प्रभाव होता है, जिससे चित्तवृत्तियाँ एकाग्र हो जाती हैं । वस्तुतः विद्वानों ने स्वरवर्ण से विभूषित ध्वनिविशेषको मनुष्यों के चित्तों का रञ्जक राग बताया है—

योऽसौ ध्वनिविशेषस्तु स्वरवर्णविभूषितः ।
रञ्जको जनचित्तानां स रागः कथितो बुधैः ॥

नटी—अभी कुछ समय पहले आपने आज्ञा दी है कि हमलोगों को आज अपूर्व अभिज्ञान-शाकुन्तल नामक नाटक का अभिनय करना है ।

विशेष—यहां ननु शब्द से स्मरण दिलाया गया है । आर्यमिश्र शब्द सम्मानसूचक है । इसलिए इसमें बहुवचन का प्रयोग किया जाता है । कहा भी है—एकत्वं न प्रयुञ्जीत गुरावात्मनि चेश्वरे । अपने, श्रेष्ठपुरुष और गुरु के विषय में प्रायः बहुवचन का ही प्रयोग करना चाहिए ।

सूत्रधार—प्यारी, तुमने अच्छी सुधि दिलायी, इस समय मैं तो भूल ही गया था, क्योंकि—

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१२ अभिज्ञानशाकुन्तलम्

तवास्मि गीतरागेण हारिणा प्रसभं हृतः। एष राजेव दुष्यन्तः सारङ्गेणातिरंहसा ॥ ५ ॥ ( इति निष्क्रान्तौ ) इति प्रस्तावना ।


अन्वयः—हारिणा तव गीतरागेण अतिरंहसा सारङ्गेण एष राजा दुष्यन्तः इव प्रसभं हृतः अस्मि।

तवास्मीति। हारिणा—मनोहरेण, तव = भवत्याः गीतरागेण = गीतस्य = गानस्य रागेण गीतरागेण = गानरागेण अतिरंहसा = अतिवेगवता सारङ्गेण = चित्राङ्गेन हरिणेन एषः = पुरोदृश्यमानः राजा = नृपो दुष्यन्त इव = यथा प्रसभं = बलात् हृतः = विषयान्तर-मानीतः अपहृतचित्तवृत्तिः जातः अस्मि। यथा राजा दुष्यन्तोऽतिवेगवता मृगेणाकृष्टः

तुम्हारे इस मनोहर गीत के राग से सहसा मुग्ध होकर मैं उस प्रकार भूल गया था जैसे अति-वेगवान् हरिण उस राजा दुष्यन्त को दूर खींच ले गया है ॥ ५ ॥

( ऐसा कहकर दोनों बाहर चले जाते हैं )। यह इस नाटक की प्रस्तावना हुई।

विशेष—सूत्रधार के कहने का तात्पर्य है कि तुम्हारे संगीत जादू ने मुझे इस प्रकार अपनी ओर खींच लिया कि मैं अपने को भी भूल गया जिस प्रकार वेगशाली हरिण राजा दुष्यन्त की उसकी सेना से दूर भगा ले गया।

सूत्रधार के साथ नटी या विदूषक आदि पात्र इधर-उधर की बातें करते हुए जहाँ किसी प्रकृत विषय की सूचना दें उसे आमुख कहते हैं। इसी का नाम नाटक में प्रस्तावना है—

नटी विदूषको वापि पारिपार्श्वक एव वा।
सूत्रधारेण सहिताः संलापं यत्र कुर्वते॥
चित्रैर्वाक्यैः स्वकार्योत्थैः प्रस्तुताक्षेपिभिर्मिथः।
आमुखं तत्तु विज्ञेयं नाम्ना प्रस्तावनापि सा ॥ ( साहित्यदर्पण )

दशरूपक में आमुख = प्रस्तावना का लक्षण यह लिखा हुआ है कि—

सूत्रधारो नटीमार्यं ब्रूते वापि विदूषकम्।
स्वकार्ये प्रस्तुताक्षेपि चित्रोक्त्या यत्तदामुखम् ॥

साहित्यदर्पण के अनुसार प्रस्तावना के पाँच भेद माने गये हैं—( १ ) उद्घातक ( २ ) कथो-द्घात ( ३ ) प्रयोगातिशय ( ४ ) प्रवर्तक तथा ( ५ ) अवगलितं इनमें यहां अवगलितं नाम की प्रस्तावना है, जिसका लक्षण निम्नाङ्कित है—

उद्घातकः कथोद्घातः प्रयोगातिशयस्तथा।
प्रवर्तकावगलिते पञ्चप्रस्तावनाभिदः ॥
यत्रैकत्र समावेशात् कार्यमन्यत् प्रसाध्यते।
प्रयोगे खलु तज्ज्ञेयं नाम्नावगलितं बुधैः ॥

किन्तु दशरूपक में धनिक के अनुसार जहाँ सूत्रधार 'एषोऽयम्' यह कहकर किसी पात्र का प्रवेश कराता है, वह प्रयोगातिशय नाम की प्रस्तावना है। तदनुसार यहाँ 'एष राजेव दुष्यन्तः' कहकर राजा का प्रवेश कराया गया है। अतः यहां प्रयोगातिशय नामक प्रस्तावना है। जैसे—

एषोऽयमित्युपक्षेपात् सूत्रधारप्रयोगतः।
पात्रप्रवेशो येनैष प्रयोगातिशयो मतः ॥

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प्रथमोऽङ्कः १३

( ततः प्रविशति रथाधिरूढः सशरचापहस्तो मृगमनुसरन् राजा सूतश्च¹ )
सूतः—( राजानं मृगं चावलोक्य ) आयुष्मन् !

कृष्णसारे ददच्चक्षुस्त्वयि चाधिज्यकार्मुके ।
मृगानुसारिणं साक्षात् पश्यामीव पिनाकिनम् ॥ ६ ॥

एतावतीं भूमिमायातः तथैवाहमपि मनोहारिणा ताललयरागवता गीतेन अपहृतचित्तवृत्तिः अवधारितमपि नाटकं विस्मृतवानस्मीति भावः। निष्क्रान्तौ=रङ्गमञ्चाद् बहिर्गतौ इति = समाप्ता प्रस्तावना = आमुखम्। अत्र श्रौती उपमा, काव्यलिङ्गं च वृत्तं चानुष्टुबेव ॥ ५ ॥

तत इति । ततः = सूतनिर्गमनान्तरं प्रस्तावनाया अन्ते वा प्रविशति = रङ्गमञ्चे दृश्यते, रथाधिरूढः = रथे उपविष्टः, सशरचापहस्तः—शरेण बाणेन चापेन = धनुषा च सहितौ हस्तौ = करौ यस्य स सशरचापहस्तः = धनुर्बाणपाणिः मृगं = हरिणं, अनुसरन् = राजा = नृपतिः दुष्यन्तः, भरतपुत्रः सूतश्च । उभौ = सारथिश्च रङ्गे प्रविशत इत्यर्थः ।

**सूतः—**सूतः = सारथिः, राजानं = दुष्यन्तं मृगं हरिणं च अवलोक्य = दृष्ट्वा ब्रूते—आयुष्मन् = महाराज ! ।

**अन्वयः—**कृष्णसारे अधिज्यकार्मुके त्वयि च चक्षुः ददत् ( अहम् ) मृगानुसारिणं साक्षात् पिनाकिनं ( त्वां ) पश्यामि इव ।

कृष्णसारे इति । पुरो धावमाने कृष्णसारे = चित्राङ्गे हरिणे ज्यामधिगतमधिज्यम् अधिज्यं कार्मुकं = धनुर्यस्य स अधिज्यकार्मुकः तस्मिन् आधिज्यकार्मुके=अध्यारोपितधनुषि

एष पद के द्वारा अंगुलि से दिखाया गया है कि दुष्यन्त आदि सज्जाकक्ष से निकलकर अब रंगभूमि में पधार ही रहे हैं।

( प्रस्तावना के अनन्तर रथ पर बैठकर धनुर्बाण हाथ में लिए मृग का अनुसरण करते हुए राजा दुष्यन्त और सारथि का रंगमंच पर प्रवेश होता है। )

सारथी—( राजा तथा मृग की ओर देखकर ) आयुष्मन् !

इस कालेमृग को और चढ़े हुए धनुष को धारण किये हुए आपको देखकर मुझे यज्ञरूप मृग का पीछा करते हुए पिनाकपाणि भगवान् शङ्कर का स्मरण हो आता है। अर्थात् धनुषबाण हाथ में लेकर मृग का पीछा करते हुए आप मुझे साक्षात् शिव के समान मालूम पड़ रहे हैं ॥ ६ ॥

**विशेष—**भगवान् शिव का नाम यहां पिनाकी कहा गया है। जिसका तात्पर्य यह है कि महापुरुषों के शंख, वीणा और धनुष का विशेष नाम देखा जाता है। जैसे भगवान् विष्णु के धनुष का शार्ङ्ग, अर्जुन के धनुष का नाम गाण्डीव है और नारदजी की वीणा का नाम महती एवं सरस्वती की वीणा का नाम कच्छपी है। इसी प्रकार भगवान् शिव के धनुष का नाम पिनाक है।

साधारण राजकर्मचारी राजा की चाटुकारिता का अवसर देखा करते हैं। यहाँ सारथि राजा की प्रशंसा करते हुए कह रहा है कि आप रुद्र के समान भीषण हैं और आपका धनुष पिनाक के समान लक्ष्यसाधक है। इस उपमा से उस कथा का स्मरण हो जाता है, जिसके अनुसार भगवान् शिवजी ने मृग का रूप धारण कर भय से भागते हुए यज्ञपुरुष का पीछा किया था अथवा पाशुपतास्त्र की प्राप्ति के लिए इन्द्रकील पर्वत पर भगवान् शिव की तपस्या करने वाले अर्जुन के साथ मृग = वाराह का पीछा किरातरूपधारी महादेव ने किया था।

महाभारत के सौप्तिक पर्व में यह कथा आती है कि एक बार शिवजी के श्वसुर दक्ष प्रजापति ने


पाठा०—१. ततः प्रविशति मृगानुसारी सशरचापहस्तो राजा रथेन सूतश्च ।

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१४ अभिज्ञानशाकुन्तलम्

राजा—दूरममुना सारङ्गेण वयमाकृष्टाः¹। अयं² पुनरिदानीमपि—

ग्रीवाभङ्गाभिरामं मुहुरनुपतति स्यन्दने बद्धदृष्टिः
पश्चार्धेन प्रविष्टः शरपतनभयाद् भूयसा पूर्वकायम्।
दर्भैरर्धावलीढैः श्रमविवृतमुखभ्रंशिभिः कीर्णवर्त्मा
पश्योदग्रप्लुतत्वाद्वियति बहुतरं स्तोकमुर्व्यां प्रयाति ॥ ७ ॥

त्वयि = भवति च चक्षुः = लोचनं ददत् = निक्षिपन् अहं मृगानुसारिणं—मृगमनुसरति तच्छीलो मृगानुसारी तं मृगानुसारिणं = मृगरूपधरं दक्षप्रजापतियज्ञम् अनुसरन्तं साक्षात् पिनाकिनमिव = साक्षाद् धनुष्पाणि भगवन्तं सदाशिवमिव पश्यामि = विभावयामि, तर्कं. यामि इव, इति प्रतीयते दक्षप्रजापतियज्ञविध्वंसवेलायां सतीदाहेन क्रुद्धं पिनाकपाणिं भगवन्तं शिवमवलोक्य यज्ञो मृगरूपमास्थाय पलायाञ्चक्रे । तञ्च महता वेगेन सदा-शिवोऽनुससारेति पौराणिकी कथाऽत्रानुसन्धेया । अत्र विशेषालङ्कारो नोत्प्रेक्षा नवोपमा, अनुष्टुप् छन्दश्च ।

राजा—राजा = नृपो दुष्यन्तः कथयति—सारथे ! अमुना = पुरो धावमानेन अनेन सारङ्गेण = कृष्णमृगेण वयम् दूरं = दूरस्थानम् आकृष्टा = आकृष्य नीताः । अयं = असौ पुनः = तु इदानीम् = अधुनापि ।

अन्वयः— ( पश्य अयं पुनरिदानीमपि ) अनुपतति स्यन्दने मुहुः ग्रीवाभङ्गाभिरामं बद्धदृष्टिः ( सन् ) शरपतनभयात् भूयसा पश्चार्द्धेन पूर्वकायं प्रविष्टः ( सन् ) अर्धावलीढैः श्रमविवृतमुखभ्रंशिभिः दर्भैः कीर्णवर्त्मा ( सन् ) उदग्रप्लुतत्वात् वियति बहुतरम् उर्व्यां ( च ) स्तोकं प्रयाति ।

ग्रीवा इति । पश्य= अवलोकय अयं पुरो दृश्यमानः मृगः अनुपतति= स्वस्य पृष्ठे धावति स्यन्दने = अस्माकं रथे मुहुः = पुनः पुनः ग्रीवाभङ्गाभिरामं—ग्रीवायाः = कन्धरायाः भङ्गेन वलितेन अभिरामं = कमनीयम्, यथास्यात्तथा बद्धा = एकाग्रीकृता दृष्टिः = चक्षुः

यज्ञ किया, किन्तु वे ब्रह्मसभा में अपना अभ्युत्थान न करने से शिवजी पर क्रुद्ध थे । अतः उन्होंने अपने उस यज्ञ में न तो शिवजी को आमन्त्रित किया, न उनका भाग ही निकाला । यह देखकर दक्ष की पुत्री सती ने अपने पति के अपमान से दुःखित होकर यज्ञाग्नि से अपने शरीर को भस्म कर दिया । यह सुनकर शिवजी को अत्यन्त क्रोध हो आया । फलतः शिवजी ने यज्ञ का विध्वंस करना प्रारम्भ कर दिया, यज्ञ हरिण का रूपधारण कर भाग चला । शिवजी ने अपना पिनाक नामक धनुष लेकर उसका पीछा किया ।

राजा-- हे सारथे ! यह मृग हम लोगों को बहुत दूर खींच लाया है, फिर भी तो देखो—

यह हमारे रथ की ओर गर्दन घुमा-घुमाकर मनोहरतापूर्वक देखता हुआ बाण लगने की आशंका से अपने पीछे के भाग = पीठ को शरीर के पूर्वभाग = गर्दन की ओर समेट कर आधे चबाये हुए कुश के ग्रासों को परिश्रम के कारण खुले हुए अपने मुख से मार्ग में गिराता हुआ आकाश में छलांग मारता हुआ दौड़ ही रहा है । जमीन पर तो इसके पैर कभी-कभी पड़ते हैं ॥ ७ ॥

विशेष— यह पद्य बड़े सूक्ष्मनिरीक्षण से प्रस्तुत किया गया है । इसके प्रत्येक चरण में हरिण का एक स्वरूप व्यक्त किया गया है । विशेषरूप से दूसरे चरण में कही गई शरीर के सिकोड़ने की

पाठा०—सूत ! दूरममुना सारङ्गेण वयमाकृष्टाः । ३. सोऽयमिदानीमपि ।

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प्रथमोऽङ्कः १५

( सविस्मयम् । ) तदेष कथमनुपतत एव मे प्रयत्नप्रेक्षणीयः संवृत्तः ।

**सूतः—**आयुष्मन् ! १उद्घातिनी भूमिरिति मया रश्मिसंयमनाद्रथस्य मन्दीकृतो वेगः । तेन मृग एष विप्रकृष्टान्तर संवृत्तः । संप्रति २समदेशवर्तिनस्ते न दुरासदो भविष्यति ।


येन स बद्धदृष्टिः सन् शरपतनभयात्—शरस्य=अस्माभिर्मोक्ष्यमाणस्य बाणस्य यत् पतनं=प्रहारः तस्य भयात् = भीतेः बाणपातशङ्कया भूयसा = अधिकतरेण अपरोऽर्धः पश्चार्धः तेन पश्चार्द्धेन = अपरेण अर्द्धेन शरीरस्य पूर्वकायस्येति पूर्वकायं = अग्रवर्ति शरीरम्, प्रविष्टः = आगतः सन् अर्द्धावलीढैः = अर्द्धम् अपूर्णं यथास्यात्तथा अवलीढैः=भुक्तैः श्रमेण=धावनजन्यया क्लान्त्या विवृतात् उद्घाटितात् मुखात् = वदनात् भ्रंशिभिः=पतद्भिः दर्भैः=कुशैः कीर्णं = व्याप्तं, वर्त्म=मार्गः येन सः कीर्णवर्त्मा सन् उदग्रम्=उत्कटं च तत् प्लुतं=लम्फः यस्य स उदग्रप्लुतः तस्य भावः तत्वं तस्मात् उदग्रप्लुतत्वात् वियति = आकाशे बहुतरं = अधिकम् उर्व्यां = पृथिव्यां च स्तोकम् = अल्पम्, प्रयाति = गच्छति । तेन तूर्णं चोदयाश्वानिति भावः । अत्र स्वभावोक्तिरलङ्कारः स्रग्धरावृत्तं च ॥ ७ ॥

सविस्मयं = विस्मयसहितमाह—तदेषः = मृगः, अनुपतत एव = पश्चाद् धावत एव मे = मम प्रयत्नप्रेक्षणीयः-प्रयत्नेन=प्रयासेन प्रेक्षणीयः = दर्शनयोग्यः संवृत्तः = जातः । पूर्वं स्पष्टलक्ष्योऽपीदानीं कष्टलक्ष्यो जातः प्लवनचपलोऽयं मृगः कथमस्माभिर्व्यापादनीयः । मनागपि नास्य वेगोऽल्पीभवतीति राजाशयः ।

सूतः—आयुष्मन् ! = महाराज ! उद्घातिनी = उद्घातयति = पादस्खलनं जनयती-त्युद्घातिनी स्खलनप्रधाना निम्नोन्नता समविषमा, भूमिः = अत्रत्या भूः इति हेतोः मया= सारथिना रश्मिसंयमनात् = प्रग्रहस्याकर्षणात् रथस्य = स्यन्दनस्य वेगः = मन्दीकृतः = अल्पीकृतः तेन = कारणेन एष मृगो विप्रकृष्टं = सातिशय मन्तरम् = अवकाशो यस्य स विप्रकृष्टान्तरः = अतिदूरवर्ती संवृत्तः = सञ्जातः । सम्प्रति = इदानीम्, समे देशे वर्तते


क्रिया को चित्र की तरह प्रस्तुत किया गया है, बार-बार लम्बीकूद से इसका शरीर जमीन पर जरा सा आकाश में अधिक समय तक रहता है, जिससे चतुर्थचरण सार्थक प्रतीत होता है । पहले चरण में मृग का गर्दन मोड़-मोड़कर पीछे रथ को देखने का वर्णन स्वाभाविक है । भागता हुआ हरिण डर के मारे अपने पीछे-पीछे दौड़ने वाले रथ को घूम-घूम कर देख लेता है अतः यह पद्य स्वभावोक्ति अलंकार का उत्तम उदाहरण है ।

( आश्चर्य के साथ ) देखो-देखो इसके पीछे इतने वेग से दौड़ने पर भी यह मृग, आँखों से ओझल सा होता जा रहा है । अब तो यह बड़ी कठिनता से दीख रहा है । यह कैसे मारा जा सकता है ?

**सारथि—**महाराज ! ऊबड़ खाबड़ ( ऊँची नीची ) जमीन होने के कारण मैंने ही घोड़ों की लगाम खींचकर रथ का वेग कुछ कम कर दिया है । अतः यह मृग इतना दूर चला गया है, पर अब समतल भूमि आ गयी है । अब आपके लिए इसे पाना मुश्किल नहीं है ।

**विशेष—**ऊँची-नीची जमीन पर रथ तेज नहीं चल सकता । ऐसी जगहों पर सारथि घोड़ों की लगाम खींचकर वेग को कम कर देते हैं । मन्दीकृत से यही बताया गया है कि रथ की गति स्वाभाविक रूप से कम नहीं हुई है, बल्कि जानबूझकर कम कर दी गयी है । इसका उद्देश्य रथ


पाठ०--१. उत्खातिनी । २. समदेशवर्ती न ते ।

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१६अभिज्ञानशाकुन्तलम्

राजा—तेन हि मुच्यन्तामभीषवः।

सूतः—यथाऽऽज्ञापत्यायुष्मान् (रथवेगं निरूप्य) आयुष्मान् ! पश्य पश्य—

मुक्तेषु रश्मिषु निरायतपूर्वकाया
निष्कम्पचामरशिखा निभृतोर्ध्वकर्णाः।
आत्मोद्धतैरपि रजोभिरलङ्घनीया
धावन्त्यमी मृगजवाक्षमयेव रथ्याः ॥ ८ ॥

इति समदेशवर्ति तस्य समदेशवर्तिनः = समतलभूमिस्थस्य ते = तव दुरासदः = दुष्प्रापः न भविष्यति।

राजा—राजा कथयति यत् तेन = तस्मात् कारणात् हि = निश्चयेन अभीषवः = ऽग्रहाः मुच्यन्ताम् = शिथिलीक्रियन्ताम्। अश्वान् धावय मृगं हन्मीत्यर्थः।

सूतः—सूतः = सारथिः कथयति यत् यथा = उचितम्, आयुष्मान् = भवान् आज्ञापयति = आदिशति तथा करोमि, अश्वान् धावयामीत्यर्थः। रथस्य = स्यन्दनस्य वेगं = गतिं निरूप्य = नाटयित्वा, अभिनेय आयुष्मान् ! पश्य पश्य = अवलोकय अवलोकय, सम्भ्रमे द्विरुक्तिः।

अन्वयः—रश्मिषु मुक्तेषु निरायतपूर्वकायाः निष्कम्पचामरशिखाः निभृतोर्ध्वकर्णाः आत्मोद्धतैः अपि रजोभिः अलङ्घनीयाः अमी रथ्याः मृगजवाक्षमया इव धावन्ति।

मुक्तेषु इति—रश्मिषु = प्रग्रहेषु मुक्तेषु = शिथिलीकृतेषु सत्सु निरायतपूर्वकायाः नितरामायतो विस्तृतं निरायतः पूर्वमग्रकायस्येति पूर्वकायः निरायतः रथाकर्षणवेगात् पूर्वकायो येषां ते निरायतपूर्वकायाः = विस्तारितस्कन्धमुखपादप्रदेशाः। निष्कम्पचामरशिखाः चामराः = कर्णयोः भूषणार्थं दत्तानां चमरीपुच्छानां शिखाः = अग्राणि इति चामरशिखाः


के उलटने और घोड़ों को गिरने से बचाना है। इस प्रकार घोड़ों की चाल मन्द करने से मृग और रथ का अन्तर अधिक हो गया है। ऊँची-नीची जमीन मृग के लिए उतनी बाधक नहीं जितनी रथ के लिए होती है।

राजा—तो अब घोड़ों की लगाम ढीली कर दो और रथ को तेज कर दो। ताकि मृग को मार सकूँ।

सारथि—जो महाराज की आज्ञा (रथ के वेग को बढ़ाने का अभिनय करके) महाराज ! देखिए-देखिए—

लगाम ढीली करते ही रथ के घोड़े अपने शरीर के अग्रभाग को लम्बा करके और अपनी ग्रीवा के बालों को तथा कानों को निष्कम्प भाव से खड़ा करके, मानो दौड़ते हुए हरिण के वेग को नहीं सह सकने के कारण ही इतने वेग से भाग रहे हैं कि इनके पैरों से उड़ी हुई धूलि भी इन घोड़ों को नहीं पा सक रही है ॥ ८ ॥

विशेष—घोड़े जब वेग से दौड़ते हैं तब अपने कानों को उठा लेते हैं और अपनी देह को आगे की ओर बढ़ा देते हैं जिससे उनके कन्धे के बाल भी खड़े हो जाते हैं। रंगमंच पर घोड़ों के


पाठ०---१. स्वेषामपि प्रसरतां रजसामलङ्घ्या निष्कम्पचामरशिखाश्च्युतकर्णभङ्गाः।
आत्मोद्धतैरपि रजोभिरलङ्घनीया धावन्ति वर्त्मनि तरन्ति नु वाजिनस्ते ॥

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प्रथमोऽङ्कः १७

राजा—(सहर्षम् ) "सत्यमतीत्य हरितो हरींश्च वर्तन्ते वाजिनः । तथा हि—

यदालोके सूक्ष्मं व्रजति सहसा तद्विपुलतां यदर्द्धा^२ विच्छिन्नं भवति कृतसन्धानमिव तत् । प्रकृत्या यद् वक्रं तदपि समरेखं नयनयो र्न मे दूरे किञ्चित्क्षणमपि न पार्श्वे रथजवात् ॥ ९ ॥

निष्कम्याः = निश्चलाः चामरशिखा येषां ते निष्कम्पचामरशिखाः = निश्चलस्कन्धप्रदेशस्थकेधराग्रभागाः । निभृतोर्ध्वकर्णाः–निभृतौ = शान्तौ ऊर्ध्वौ = ऊर्ध्वंगतौ कर्णौ = श्रवणे येषां ते निभृतोर्ध्वकर्णाः । आत्मोद्धतैः–आत्मना = स्वेन उद्धतैः = उत्थापितैः अपि रजोभिः = खुराग्रधूलिभिः, अलङ्घनीयाः = लङ्घयितुमशक्याः अमी = एते ते रथ्याः—रथं वहन्तीति रथ्याः = वाजिनः मृगजवाक्षमया—मृगस्य = हरिणस्य जवे = वेगे अक्षमया = असहन्शीलतया धावमानहरिणवेगासहिष्णुतया इव = यथा धावन्ति = सत्वरं गच्छन्ति । इति पश्य गद्येन सह । किमिमेऽश्वा भूमौ चलन्ति, किं वा जलाशयसदृशे आकाशे प्लवन्ते इति वेगातिशयान्निर्णैतुं न शक्यते इत्यभिप्रायः । अत्र अद्भुतो रसः, स्वभावोक्तिः, उत्प्रेक्षा चालङ्कारः, वसन्ततिलकावृत्तञ्चावगन्तव्यम् ॥ ८ ॥

राजा— नृपो दुष्यन्तः कथयति सहर्षम् = प्रसन्नतां प्रकटयित्वा, सत्य = तथ्यम्, वाजिनः = मदीया अश्वाः अतीत्य = अतिक्रम्य, ( उत्प्लुत्य ), हरितः = सूर्यस्य अश्वान्, हरीन् = इन्द्रस्याश्वान् च वर्तन्ते सन्ति, तथाहि तत्र प्रमाणं वक्ष्यते—

अन्वयः— रथजवात् यत् आलोके सूक्ष्मं (दृश्यते) तत् सहसा विपुलतां व्रजति । यत् अर्द्धे विच्छिन्नं ( भवति ) तत् कृतसन्धानमिव भवति । यत् प्रकृत्या वक्रं ( भवति ) तत् अपि नयनयोः समरेखं भवति । क्षणमपि न किञ्चित् ( वस्तु ) मे दूरे, न ( च ) पार्श्वे ( अस्ति ) ।

यदालोके इति । रथजवात् = स्यन्दनवेगात् यत्—किमपि वस्तु वृक्ष-गिरि-शृङ्गादिकम् आलोके = दर्शनसमये सूक्ष्मं = तनुतरम् दृश्यते तत् सहसा = द्रागेव विपुलतां = स्थूलतां व्रजति = प्राप्नोति । दूरेण यत् सूक्ष्मं वस्तु दृश्यते तदेव रथवेगात् तत्क्षणं समीपमागतं सत्


साथ रथ को दौड़ाना संभव न होने से लगाम ढीली कर अभिनयमात्र किया जाता है। पश्य-पश्य की आवृत्ति से कौतुक बताया जाता है । इस स्वभावोक्ति में अच्छे नस्ल के घोड़े बागडोर हिलाने पर किस तरह दौड़ते हैं यह दिखाया गया है। यहाँ घोड़ों ने हरिण को पराजित करने के निमित्त सारा जोर लगा दिया है, जिससे उनकी टापों से उड़ी धूलि पीछे रह गई और घोड़े आगे बढ़ गये ।

राजा—( प्रसन्नता से ) निश्चय ही इन घोड़ों का वेग मृग के वेग से बढ़ा हुआ है क्योंकि—

वृक्ष आदि जो वस्तु पहले छोटी दिखाई देती है, वही एकाएक बड़ी हो जाती है । जो वृक्ष-पंक्ति आदि वस्तु बीच में खण्डित है, वह भी रथ के वेग से मिली हुई सी दिखाई देती है और जो स्वभाव से टेढ़ी-मेढ़ी है, वह वस्तु भी आँखों को सीधी दिखाई पड़ती है । अधिक क्या कहूँ इस रथ के वेग के कारण कोई वस्तु मेरे से दूर नहीं तथा न कोई वस्तु मेरे पास ही ठहरती है । अर्थात् रथ के वेग के कारण जो वस्तु पास में है, वही क्षण भर में दूर चली जाती है ॥ ९ ॥

विशेष— इस पद्य के द्वारा बिलकुल स्वाभाविक वर्णन किया गया है, क्योंकि रथ के वेग से


पाठ०—१. ( क ) नूनमतीत्य हरिणं हरयो वर्तन्ते । ( ख ) कथमतीत्य । २. यदर्द्धे ।

२ शाकु०

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१८ | अभिज्ञानशाकुन्तलम्

सूत ! पश्यैनं व्यापाद्यमानम्¹ ( ²शरसन्धानं नाटयति ) ।
( नेपथ्ये ) भो भो राजन् आश्रममृगोऽयं न हन्तव्यो न हन्तव्यः।
सूतः—( आकर्ण्यविलोक्य च ) आयुष्मन् ! अस्य खलु ते ³बाणपथवर्त्तिनः कृष्णसारस्यान्तरे ⁴तपस्विन उपस्थिताः ।

स्थूलं लक्ष्यते इति भावः । यद् वस्तु नदीस्रोतःप्रभृति अर्द्धै = अर्द्धभागे विच्छिन्नं = त्रुटितं तत् सहसा कृतसन्धानमिव — कृतं सन्धानं = योजना यस्य तदिव भवति । यत् पूर्वं छिन्नं तत्तस्मिन्नेव क्षणे इति एकमिव दृश्यते इत्यर्थः । यत् वस्तु गिरितट-नदीकूलादि प्रकृत्या = स्वभावतः वक्रं = कुटिलं तदपि नयनयोः = नेत्रयोः सम्बन्धे समरेखं-समा = ऋज्वी रेखा यस्य तत् समरेखं = सरलं भवति क्षणमपि किञ्चिद्वस्तु न दूरे तिष्ठति नापि पार्श्वे = समीपे, तिष्ठति । अर्थात् रथवेगातिशयवशात् यद् वस्तु दूरतः सूक्ष्मं दृष्टं तदेव समीपमागतं स्थूलं दृश्यते । यत् मध्ये व्यवहितं तदेव कृतसन्धानं दृश्यते । एवं स्वभावतो वक्रं तदपि दूरतः समरेखं दृश्यते । तस्मात् किमपि वस्तु मम न दूरे, नापि समीपे क्षणमप्यवतिष्ठते, यदिदानीं दूरे तदेव क्षणान्तरेण समीपे, यच्चेदानीं समीपे तदेव निमेषमात्रेण दूरे भवतीत्यर्थः । अत्र काव्यलिङ्गपर्यायोक्त-विरोधाभासोत्प्रेक्षास्वभावोक्तयोऽलङ्काराः, शिखरिणी नाम वृत्तं च ॥ ९ ॥

सूत इति । सूत !=सारथे ! एवं पलायमानं मृगं व्यापाद्यमानं = मया हन्यमानं, पश्य = वीक्षस्व, इत्युक्त्वा ( शरसन्धानं = बाणसन्धानं निरूपयति = नाटयति नृपः ) । नेपथ्ये = जवनिकान्तरे भो भो राजन् ! = हे हे नृप ! अयम् = एषः आश्रममृगः = कण्वर्षिणा पालितः तपोवनहरिणः अतस्त्वया न हन्तव्यः, न हन्तव्यः = न मारणयोग्यः, न मारण-योग्यः । अत्र द्विरुक्तिरावेगेन । अन्तरायसन्धिश्च, प्रकृतार्थसूचनात् । तदुक्तं मातृगुप्ताचार्यैः—

स्वप्नो दूतश्च लेखश्च नेपथ्योक्तिस्तथैव च ।
आकाशवचनं चेति ज्ञेया ह्यन्तरसन्धयः ॥

सूतः—( आकर्ण्य अवलोक्य च = श्रुत्वा दृष्ट्वा च ) कथयति यद् आयुष्मन् !

जो वस्तु दूर से सूक्ष्म दिखाई देती है, वही पास से स्थूल के रूप में दीखती है तथा जो वस्तु वस्तुतः स्थूल है वही रथ के दूर चले जाने पर सूक्ष्म दीखती है। जो पास में पृथक्-पृथक् हैं, वही दूर से सटी दीखती है। जो वास्तविक टेढ़ी है वह दूर से सीधी दीखती है । इसी प्रकार जो वस्तु दूर है वह क्षण भर में समीप आ जाती हैं तथा जो पास है वह दूर चली जाती है ।

सूत ! इस मृग को मेरे द्वारा मारा जाता हुआ देखो, ( धनुष पर बाण चढ़ाकर निशाना साधने का अभिनय करते हैं ) ।

( नेपथ्य में ) अरे राजन् ! यह आश्रम का मृग हैं । अतः यह अवध्य है। आपके मारने योग्य नहीं है। आप इसे न मारें, न मारें।

विशेष— राजा दुष्यन्त के शरसन्धानकर ज्योंही मृग को मारना चाहा कि नेपथ्य से आवाज आई कि राजन् ! आश्रम के मृग अवध्य होते हैं, अतः इसे न मारें। ऋषियों के द्वारा दुष्यन्त के लिए राजन ! यह सम्बोधन भरत के नाट्यशास्त्र के अनुसार है, क्योंकि वहाँ निर्देश है— 'राजनित्यृषिभिर्वाच्यः'

सारथि—( सुनकर और सामने देखकर ) महाराज ! आपके बाण मारने के मध्य में


पाठा०--१. व्यापाद्यम् । २. राजा शरसन्धानं नाटयति, इति शरसन्धानं नाटयति । ३. बाणपातपथवर्तिनः । ४. अन्तरायौ द्वौ तपस्विनौ संवृत्तौ ।

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प्रथमोऽङ्कः १९

राजा—( ससंभ्रमम् । ) तेन हि प्रगृह्यन्तां वाजिनः¹ ।
सूतः—²तथा ( इति रथं स्थापयति ) ।
( ततः सशिष्यः प्रविशत्यात्मना तृतीयो वैखानसः )
वैखानसः—( हस्तमुद्यम्य ) राजन् ! आश्रममृगोऽयं न हन्तव्यो न हन्तव्यः ।


महाराज ! अस्य = एतस्य मृगस्य खलु = निश्चयेन ते = तव बाणपातवर्तिनः—पतन्त्यस्मिन्निति पातः = पतनोचितो देशः बाणस्य यः पातः तत्र वर्तते तच्छीलो बाणपातवर्ती तस्य बाणपातवर्तिनः। यद्वा बाणपातपथवर्तिन इति पाठे तु बाणस्य यः पातः तस्य यः पन्थाः तस्मिन् वर्तते तच्छीलः बाणपातपथवर्ती तस्य बाणपातपथवर्तिनः = अतिनिकटवर्तिनः कृष्णसारस्य = कृष्णमृगस्यास्य अन्तरे = मृगस्य रथस्य च मध्ये तपस्विनः=तापसा उपस्थिताः = प्राप्ताः ।

विप्राग्न्योर्विप्रयोरन्योर्दम्पत्योरिषुलक्षयोः ।
नान्तराशमनं कुर्यान्न देवबलिपीठयोः ॥

इति निषेधे विद्यमानेऽपि यत्तपस्विनामिषुलक्षयोर्मध्ये समागमनं तन्मृगरक्षार्थमेव प्रतिभातीति ब्रह्महत्याभयात् सहसा शरमोक्षणं माकार्षीरिति भावः ।

राजा—राजा = दुष्यन्तः ( ससंभ्रमं = संभ्रमेण सहितं यथा स्यात्तथा = सत्वरम् ) सूतम् आदिशति यत् तेन = तस्मात् = कारणात् वाजिनः=अश्वाः प्रगृह्यन्तां = नियम्यन्तां, स्थिरीक्रियन्तां त्वया रथः स्थापनीय इत्यर्थः ।

सूतः—यथा आयुष्मान् भवान् आज्ञापयति = आदिशति तथैव स्यात् इति उक्त्वा = कथयित्वा तथा करोति = रथमवस्थापयति ।

( ततः = तदनन्तरं सशिष्यः-शिष्याभ्यां सहितः सशिष्यः आत्मना तृतीयः प्रविशति = रङ्गमञ्चे आविर्भवति वैखानसः=तापसविशेषः । ) तथाहि वैजयन्ती—'वैखानसो वनेवासी वानप्रस्थश्च तापसः ।' वैखानसस्यापि संस्कृतमेव पाठ्यम् । तदुक्तम्—

परिव्राण् मुनिशाक्येषु तापसश्रोत्रियेषु च ।
द्विजा ये चैव लिङ्गस्थाः संस्कृतं तेषु योजयेत् ॥

समिदाहरणाय प्रस्थितो वैखानसो मध्यमार्गं जिघांसया मृगमनुसरन्तं राजानमवलोक्य निषिद्धाचरणात्निवारयितुं हस्तं = करम् उद्यम्य = उत्थाप्य, ऊर्ध्वबाहुः सन् तमुवाच—


विघ्नरूप में तपस्वी आकर खड़े हो गये हैं। ( इन पर प्रहार करने से ब्रह्महत्या का दोष लगेगा अतः बाण न छोड़िए ) ।

राजा—( घबराहट के साथ ) घोड़ों की लगाम कड़ी करो और रथ को रोक लो ।
सारथी—महाराज की जैसी आज्ञा ( घोड़ों की लगाम खींचकर रथ को रोकता है ) ।
( उसके बाद शिष्यों के सहित वैखानस=तपस्वी का प्रवेश )
तपस्वी—( हाथ उठाकर ) अरे राजन् ! यह आश्रम का मृग है, वन का नहीं । अतः यह अवध्य है, इसे आप मत मारिये ।


पाठा०—१. इषवः ।
२. यथा शरणमत्यायुष्मान् ( इति तथा करोति ), इति रथं स्थापयति ।

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२०

अभिज्ञानशाकुन्तलम्

न खलु न खलु बाणः सन्निपात्योऽयमस्मिन्
मृदुनि मृगशरीरे पुष्पराशाविवाग्निः ।
क्व बत हरिणकानां जीवितं चातिलोलं
क्व च निशितनिपाताः वज्रसाराः शरास्ते ॥ १० ॥

तत्साधुकृतसन्धानं प्रतिसंहर सायकम् ।
आर्त्तत्राणाय वः शस्त्रं न प्रहर्तुमनागसि ॥ ११ ॥


राजन् ! = नृप ! आश्रममृगोऽयं = एष हरिण आश्रमवासिमुनिजनपालितोऽस्ति, न वन्यौ मृगोऽस्ति । तस्मादयं न हन्तव्यः = न मारणयोग्यः इति भावः ।

अन्वयः— मृदुनि अस्मिन् मृगशरीरे अयं बाणः पुष्पराशौ अग्निः इव न खलु न खलु सन्निपात्यः, बत क्व च अतिलोलं हरिणकानां जीवितं क्व च निशितनिपाताः वज्र-साराः ते शराः ।

न खल्विति । मृदुनि = कोमले अस्मिन् = पुरोदृश्यमाने मृगशरीरे = हरिणवपुषि अयं बाणः = एष तव शरः तुलराशौ = कार्पासपुञ्जे, किं वा पुष्पराशौ = कुसुमसमूहे अग्निः = वह्निः इव = यथा न खलु न खलु = नैव किल संन्निपात्यः = प्रहरणीयः, पातनीयो भवता, बत = हन्त क्व च = कुत्र च अतिलोलम् = अतिचञ्चलम् अनुकम्पिता हरिणा एव हरिणकाः तेषां हरिणकानां = अनुकम्पितानां मृगाणां जीवितं = जीवनम्, क्व = कुत्र च निशितनिपाताः— निशितः तीक्ष्णः निपातः प्रहारो येषां ते = तीक्ष्णप्रहाराः वज्रसाराः = वज्रस्य = कुलिशस्य सारः = काठिन्यमिव सारो येषां ते = वज्रकठोराः ते = तव शराः = बाणाश्चेत्युभयोर्महद्वैषम्यम् । उपमामूलको विषमोऽलङ्कारः, मालिनी च वृत्तम् ॥ १० ॥

अन्वयः— तत् साधु कृतसन्धानं सायकं प्रतिसंहर वः शस्त्रम् आर्तत्राणाय अनागसि प्रहर्तुं न ।

तत्साधु इति । तत् = तस्मात् अनौचित्यात् साधु = सुष्ठु कृतं = विहितं सन्धानं = धनुषि


आप हरिण के कोमल शरीर पर वह बाण फूल को ढेर पर या रूई को पुञ्ज पर आग के समान मत छोड़िए, मत छोड़िए, क्योंकि कहाँ इन बेचारे हरिणों के अत्यन्त कोमल शरीर एवं प्राण और कहाँ वज्र के समान कठोर एवं तीक्ष्ण ये आपके बाण। अर्थात् आपके बाणों का लक्ष्य तो सिंह, व्याघ्र आदि होने चाहिए न कि कोमल प्राण ये मृग। अतः कृपया आप इसे मत मारिए ॥ १० ॥

विशेष— न के साथ खलु लगने पर निषेधार्थ निवेदन होता है । न खलु का दो बार प्रयोग आवेग व्यक्त करता है । इस पद्य में पुष्पराशि से आश्रम मृग को और अग्नि से बाण की तुलना की गई है । इसका तात्पर्य यह है जिस प्रकार कोमल फूल की ढेर पर आग छोड़ना अनुचित है उसी प्रकार आश्रमतृग पर बाण प्रहार सर्वथा अनुचित है । मृग कोमल पशु है, जो साधारण प्रहार से मर सकता है । इसलिए इसके जीवन को चञ्चल बताया गया है । वज्रसार कहने का आशय है जैसे कुलिशधारी इन्द्र का साधारण पशु मारना अनुचित है वैसे ही राजा को कमजोर जानवर मृग को मारना उचित नहीं ।

इसलिए आप अनुसन्धान किये हुए अपने बाण को धनुष से उतार लें, क्योंकि आपका यह शस्त्र पीड़ित प्राणियों की रक्षा के लिए ही है, निरपराध जीवों को मारने के लिए नहीं ॥ ११ ॥

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प्रथमोऽङ्कः ३१

**राजा—**एष प्रतिसंहृतः ( इति यथोक्तं करोति ) ।

वैखानसः—( सहर्षम् ) सदृशमेतत् पुरुवंशप्रदीपस्य भवतः ।

जन्म यस्य पुरोर्वंशे युक्तरूपमिदं तव । पुत्रमेवं गुणोपेतं चक्रवर्तिनमाप्नुहि ॥ १२ ॥

स्थापनं यस्य तत् साधुकृतसन्धानम्, सायकं = बाणं आशु = त्वरितं प्रतिसंहर = तूणीरं प्रत्यानय वः = युष्माकं क्षत्रियाणां शस्त्रम् = आयुधम् आर्तानां = पीडितानां त्राणाय = रक्षणाय विपन्नप्रतिपालनाय अस्ति, अनागसि = निरपराधे प्रहर्तुं = प्रहारकरणाय न = नहि ( अस्ति ) अतो निरपराधं मृगं मा प्रहर, मुञ्चैनमिति भावः । अत्र छेक-श्रुत्यनुप्रासौ अलङ्कारौ, अनुष्टुप् च छन्दः ॥ ११ ॥

**राजा—**सप्रणामं = सादरं प्रणामं कृत्वा नृपः कथयति—एषः = अयं बाणः प्रतिसंहृतः = धनुषोऽवतारितः । इति = एवं कथयित्वा यथोक्तं करोति = स्ववचनानुसारं शरं निषङ्गे निक्षिपति ।

**वैखानसः—**वैखानसः = तापसः पुरुवंशप्रदीपस्य = पुरोः ययातिपुत्रस्य यो वंशः तस्य यः प्रदीपः = प्रदीपवदुद्भासकः तस्य = पुरुवंशभूषणस्य भवतः = आयुष्मतः एतत् = ब्राह्मणानुवर्तित्वं तापसवचनपालनं सदृशं योग्यम् । पौरवा हि राजानः सदैव ब्राह्मणानामनुकूला आज्ञाकराश्च । अथ राज्ञः उचितकारित्वेन तत्प्रशंसापुरःसरमभिलषितं वस्तु आशास्ते ।

**अन्वयः—**यस्य पुरोः वंशे जन्म ( तस्य ) तव इदं युक्तरूपम् । एवं गुणोपेतं चक्रवर्तिनं पुत्रमवाप्नुहि ।

जन्मेति । यस्य = भवतो दुष्यन्तस्य पुरोः = ययातिपुत्रस्य पितृभक्तशिरोमणेः राजर्षेः वंशे = अन्वये, कुले जन्म = उत्पत्तिरस्ति तस्य तव = भवतः कृते इदम् = एतद् तापसा-

**विशेष—**इस पद्य में सन्धान और प्रतिसंहार शब्दों का क्रमशः पारिभाषिक अर्थ है—धनुष पर बाण को चढ़ाना और उतारना । यहाँ तापस ने राजा को उपदेश दिया है कि आपका आयुष आर्तों की रक्षा करने के लिए है, न कि निरपराध पशुओं पर प्रहार करने के लिए । अतः बाण चढ़ा लेने पर उसे उतारना प्रतिष्ठा का प्रश्न न मानिए, निरपराधी जीवों पर दया करना आप जैसे कुलीन राजाओं का परमधर्म हैं । यहाँ अस्त्र उठाने का उद्देश्य अति सुन्दरता से बताया गया है कि अस्त्र उठाने का उद्देश्य पीड़ित प्राणियों की रक्षा करना है, न कि उन्हें मारना । इसीलिए कवि ने दुष्यन्त के लिए वः ( युष्माकम् ) का प्रयोग किया है ।

**राजा—**मैंने अपना बाण वापस कर लिया ( बाण को धनुष पर से उतारते हैं ) ।

तपस्वी—( प्रसन्नतापूर्वक ) पुरुवंश के प्रदीप स्वरूप आपके लिए यह आश्रम की मर्यादा का रक्षण करना आपके कुल की मर्यादा के अनुरूप ही है ।

जिसका जन्म पितृभक्त शिरोमणि राजर्षि पुरु के वंश में हुआ है, ऐसे आपके लिए इस आश्रम को अभयदान देना तथा तपस्वियों की आज्ञा को मानना सर्वथा उचित ही है । इसलिये हे राजन् ! आपको आपके ही सदृश सर्वगुणसम्पन्न चक्रवर्ती पुत्र प्राप्त हो ॥ १२ ॥

**विशेष—**इस पद्य में पुरोर्वंशे के स्थान पर षष्ठी तत्पुरुष समास करके पुरुवंश का प्रयोग भी

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२२अभिज्ञानशाकुन्तलम्

इतरौ—( १बाहू उद्यम्य ) सर्वथा चक्रवर्तिनं पुत्रम् आप्नुहि ।

राजा—( सप्रणामम् ) प्रतिगृहीतम् ।

वैखानसः—राजन् ! समिदाहरणाय २प्रस्थिता वयम् । ३एषः खलु कण्वस्य कुलपतेरनुमालिनीतीरमाश्रमो दृश्यते । न चेदन्यकार्यातिपातः प्रविश्य प्रतिगृह्यतामातिथेयः सत्कारः । अपि च—

नुरोधपालनारूपं कार्यं युक्तरूपं = उचितमेव, एवं गुणोपेतं = एवंविधैः गुणैः उपेतमेवं गुणोपेतम् = ईदृशगुणयुक्तं स्वानुरूपं सकलगुणगणोपेतं चक्रवर्तिनं चक्रे = राजसमूहे वर्तयितुं चालयितुं प्रशासितुं वा शीलमस्येति चक्रवर्ती, यद्वा चक्रं = सैन्यं वर्तयितुं सर्वभूमौ चालयितुं शीलमस्येति चक्रवर्ती, अथवा चक्रे = भूमण्डले वर्तते = विद्योतते इति चक्रवर्ती तं चक्रवर्तिनं = सार्वभौमं पुत्रं = पुन्नाम्नो नरकात् त्रायते इति पुत्रस्तं पुत्रं = तनयम् आप्नुहि = अस्मद्वचनमहिम्ना लभस्वेत्याशीः । अत्र काव्यलिङ्गालङ्कारोऽनुष्टुप्छन्दश्च ।। १२ ।।

इतराविति—इतरौ = अन्यौ वैखानसेन सहागतौ शिष्यौ बाहू = हस्तौ उद्यम्य = सर्वथा = नूनं चक्रवर्तिनं = सार्वभौमं पुत्रं = तनयम् आप्नुहि = लभस्व ।

राजा—प्रणामेन = नत्या सह सप्रणामं = प्रणामपूर्वकम् कथयति—प्रतिगृहीतम् = अङ्गीकृतम्, भवतामाशीर्वचनं शिरोधार्यमस्ति ।

वैखानसः—वैखानसः = तपोधनः कथयति—राजन् ! = हे भूपते ! वयं = तापसाः

किया जा सकता था । इसका आशय यह है कि तत्पुरुष समास में उत्तरपद की प्रधानता होती है, किन्तु यहाँ कवि का तात्पर्य उत्तर पद वंश की प्रधानता में नहीं है, यह तो यहाँ पूर्वपद पुरु की विशेषता बताना चाहता है, क्योंकि समास न करने से पूर्व पद स्वतन्त्र होकर अपने गौरव को व्यक्त कर रहा है । पुरु की धार्मिकता और पितृभक्ति का प्रदर्शन कवि को यहाँ अभिप्रेत है । पुरु की पितृ भक्ति की कथा पुराणों से जाननी चाहिए । इन्होंने पिता राजा ययाति की आज्ञा में श्रद्धा रखकर उन्हें अपना यौवन दे दिया और उनको बुढ़ाई ले ली थी ।

यहाँ तपस्वियों के अनुरोध की रक्षा कर गुरुभक्ति का परिचय देने से पुरुवंश की परम्परा स्मरण हो आया है । चक्रवर्ती पुत्र की प्राप्ति के आशीर्वाद से प्रतीति होता है कि अभी तक उन्हें कोई सन्तान न थी । तपस्वियों ने उन्हें पुत्र लाभ का आशीर्वाद देकर आगे की परम्परा चलाने में पूर्ण सहयोग किया । पिता के लिए पुत्र की प्राप्ति का आशीर्वाद सर्वोत्तम माना जाता है । इन तपस्वियों के आशीर्वाद स्वरूप दुष्यन्त को सर्वदमन भरत जैसा सर्वगुणसम्पन्न पुत्र प्राप्त हुआ ।

विशिष्ट राजाओं के लिए चक्रवर्ती शब्द पारिभाषिक है, जिसका अर्थ होता है भूमण्डल का सञ्चालक राजा या राज्यमण्डल का शासक शास्त्रों में चक्रवर्ती सम्राट् राजाओं का लक्षण इस प्रकार किया गया है—

सर्वेभ्यः क्षितिपालेभ्यो नित्यं गृह्णाति वै करम् ।
स सम्राडिति विज्ञेयश्चक्रवर्ती स एव हि ।। १२ ।।

दोनों—राजन् ! आप अवश्य पुत्र प्राप्त करें ।

राजा—( प्रणाम करते हुए ) आपलोगों का आशीर्वाद शिरोधार्य है ।

तपस्वी—हे राजन् ! हमलोग तो हवन के उपकरण लकड़ी कुश आदि लाने के निमित्त


पाठा०--१. हस्तमुद्यम्य । २. प्रस्थितावावाम् । ३. एष चास्मद्गुरोः साधिदैवतं इव ( एष ) शकुन्तलया ।

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प्रथमोऽङ्कः

^१रम्यास्तपोधनानां प्रतिहतविघ्नाः क्रियाः ^२समवलोक्य।
ज्ञास्यसि कियद् भुजो मे रक्षति मौर्वीकिणाङ्क इति ॥ १३ ॥

समिदाहरणाय = समिधामाहरणं तस्मै समिदाहरणाय = यज्ञोपकरणेन्धनकुशादिसंग्रहाय प्रस्थिताः = प्रचलिताः। एषः = समीपवर्ती पुरोदृश्यमानः खलु = निश्चयेन कण्वस्य = कण्वनाम्नः कुलपतेः = दशसहस्रच्छात्राध्यापकस्य मुनिकुलेश्वरस्य मालिन्या = मालिनीनामिकाया नद्याः = तीरे तटे इति अनुमालिनीतीरम् आश्रमः = मुनिनिवासस्थलं दृश्यते = अवलोक्यते। न चेत् = यदि न अन्यकार्यातिपातःअन्यस्य = अपरस्य कार्यस्य = कृत्यस्य अतिपातः = व्याघातः इति अन्यकार्यातिपातः = न इतरकार्यविलम्बः तर्हि प्रविश्य = आश्रमान्तः गत्वा आतिथेयःअतिथौ साधुः आतिथेयः सत्कारः = अतिथिपूजा, प्रतिगृह्यतां = स्वीक्रियताम्। अथ आश्रमं प्राप्य आतिथ्यपरिग्रहे न केवलं तापसप्रीत्या श्रेयः प्रत्युत अन्यथापि ते तत्र गमनमुपकरिष्यतीत्याहअपि च = अन्यच्च।

अन्वयःरम्याः प्रतिहतविघ्नाः ( च ) तपोधनानां क्रियाः समवलोक्य (त्वं) ज्ञास्यसि मौर्वी किणाङ्कः मे भुजः कियत् रक्षति इति ज्ञास्यसि।

रम्या इति। रम्याः = रमणीयाः प्रतिहतविघ्नाःप्रतिहताः = निरस्ताः विघ्नाः = प्रत्यवायाः यासां तादृश्यः प्रतिहतविघ्नाः = निरस्तान्तरायाः तपोधनानां = तपः = तपस्या


वन में जा रहे हैं। देखिए, यह सामने ही हमारे गुरुवर कुलपति महर्षि कण्व का मालिनी नदी के तीर पर आश्रम दीख रहा है। यदि आपके किसी आवश्यक कार्य की हानि न हो तो, आप इस आश्रम में पधार कर अतिथि सत्कार ग्रहण करें। और भी--

तप ही जिनका धन है ऐसे तपस्वियों की रमणीय एवं निर्विघ्न क्रिया को देखकर आप स्वयं जान जायेंगे कि मेरी धनुष की डोरी के चिह्न से अङ्कित भुजा कितनी और कहां तक रक्षा करती है ॥ १३ ॥

विशेष—यहाँ तपस्वियों ने राजा दुष्यन्त के अनुकूल आचरण से प्रभावित होकर अपने कुलपति महर्षि कण्व के आश्रम पर अतिथि सत्कार स्वीकार का अनुरोध किया। कुलपति शब्द पारिभाषिक है। यहाँ इसका मुनिवंश के स्वामी से तात्पर्य है। जो विद्वान् १००० एक हजार मुनियों को अन्न-पान से पालन करता हुआ पढ़ाता है, उसे कुलपति कहते हैं—

मुनीनां दशसाहस्रं योऽन्नपानादिपोषणात्।
अध्यापयति विप्रर्षिरसौ कुलपतिः स्मृतः ॥

पद्मपुराण में तो कुलपति को दश हजार शिष्यों का आचार्य, मुनिप्रमुख और प्रचुरव्रत, यज्ञ आदि कर्म करने वाला कहा गया है—

आचार्यो बहुशिष्याणां मुनीनामग्रणीस्तु यः।
व्रतयज्ञादिकर्माढ्यः स वै कुलपतिः स्मृतः॥

मनुस्मृति में मनुजी ने एक रात रहने वाले व्यक्ति को अस्थायी निवास के कारण अतिथि कहा है—

एकरात्रं तु निवसन्नतिथिर्ब्राह्मणः स्मृतः।
अनित्यो हि स्थितो यस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते ॥ ३।१०२


पाठ०—१. धर्म्याः। २. समभिवीक्ष्य।

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२४ अभिज्ञानशाकुन्तलम्

राजा—अपि ¹संनिहितोऽत्र कुलपतिः।
वैखानसः—इदानीमेव दुहितरं शकुन्तलामतिथिसत्काराय² नियुज्य³ दैवमस्याः प्रतिकूलं शमयितुं सोमतीर्थं गतः।
राजा—भवतु। ⁴तामेव द्रक्ष्यामि। सा खलु विदितभक्तिं मां महर्षेः कथयिष्यति।


धनं = वित्तं येषां तेषां तपोधनानां = तपस्विनां क्रियाः = यज्ञादि क्रियाः कृत्यानि समवलोक्य = दृष्ट्वा त्वं = भवान् ज्ञास्यसि = अवगमिष्यसि, **मौर्वीकिणाङ्कः—**मौर्व्याः = धनुर्गुणस्य किणः = चिह्नम् अङ्कः = भूषणम् यस्य स मौर्वीकिणाङ्कः ज्याघातव्रणभूषितः मे = मम भुजः = बाहुः कियत् = किं परिमाणं रक्षति = अवति इति = एतत् ज्ञास्यसि = अनुभविष्यसि। अत्र प्रस्तुताङ्कुरः, पर्यायोक्तं, काव्यलिङ्गं विरोधाभासश्चालङ्काराः आर्या च वृत्तम् ।। १३ ।।

**राजा—**अथ तेषामनुरोधेन आश्रमगमनं विचिन्वन् कुलपतिदर्शनौत्सुक्येन तत्सान्निध्यं पृच्छन्नाह—अपि सन्निहितोऽत्र कुलपतिः = अत्र = आश्रमे कुलपतिः महर्षिः कण्वः सन्निहितः = आत्मना उपस्थितः किमिति प्रश्नः।

वैखानसः—इदानीम् = अधुना, एव दुहितरं = धर्मकन्यां शकुन्तलां = शकुन्तलाख्याम् अतिथिसत्काराय = अविद्यमाना = आगमनस्य तिथिः = दिवसः यस्य सोऽतिथिः तस्यातिथेः = अभ्यागतस्य सत्काराय = अतिथिसत्काराय = अतिथिसत्काररूपकार्यसम्पादनाय, आदिश्य = नियुज्य अस्याः = शकुन्तलायाः प्रतिकूलं = अशुभं, विवाहादि प्रतिबन्धकं दैवम् = अदृष्टं शमयितुं = शान्त्यादिना प्रतिविधातुं सोमतीर्थं = तदाख्यं तीर्थविशेषं चन्द्रकूपं गतः = यातोऽस्ति।

राजा—भवतु = अस्त्वेवम्, **तामेव—**पूर्ववर्णितां शकुन्तलामेव द्रक्ष्यामि = प्रेक्षिष्ये


इसकी टीका करते हुए कुल्लूकभट्ट ने कहा है कि अस्थायी निवास के कारण जिस व्यक्ति के रहने की दूसरी तिथि न आने पावे वह अतिथि कहलाता है—

'अनित्यावस्थानान्न विद्यते द्वितीया तिथिरस्येत्यतिथिरुच्यते'।

राजा—क्या कुलपति महर्षि कण्व इस समय आश्रम पर विराजमान हैं ?

तपस्वी—अभी थोड़ा समय हुआ कि कुलपति जी अपनी कन्या शकुन्तला को अतिथि सत्कार का भार देकर इस कन्या के प्रतिकूल अदृष्ट शान्ति के लिए सोमतीर्थ में गये हुए हैं।

विशेष—प्रतिकूल अदृष्ट का तात्पर्य है कि शकुन्तला के विवाह तथा पतिसुख में विघ्न करने वाले ग्रहों से है। सोमतीर्थ काठियावाड में प्रसिद्ध सोमनाथ मन्दिर के पास है। इसे वाराह पुराण में प्रभासतीर्थ भी कहा गया है, जहाँ दक्ष के शाप से चन्द्रमा को क्षयरोग से मुक्ति मिली थी। इस तीर्थ की महिमा अपूर्व है। किसी के मत से कुरुक्षेत्रान्तर्गत जींदराज्य में पाण्डुपिण्डरा नाम का महान् तीर्थ सोमतीर्थ है। कोई नारनौल पटियाला ढोसी पर्वत पर स्थित चन्द्रतीर्थ को सोमतीर्थ कहता है।

राजा—अच्छा तो मैं फिर कुलपति की कन्या शकुन्तला का ही दर्शन करूँ। वही मुनि के प्रति मेरी भक्ति और श्रद्धा की सूचना मुनि के आनेपर उन्हें दे देगी।

पाठा०—१. सन्निहितस्तत्र । २. अतिथिसत्कारार्थम् । ३. आदिश्य । ४. तां द्रक्ष्यामि ।

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प्रथमोऽङ्कः

वैखानसः— ^१साधयामस्तावत् । ( सशिष्यो निष्क्रान्तः । )
राजा— सूत ! नोदयाश्वान् । पुण्याश्रमदर्शनेन तावदात्मानं पुनीमहे ।
सूतः— यदाज्ञापयत्यायुष्मान् । ( ^२भूयो रथवेगं निरूपयति । )
सूतः— ( समन्तादवलोक्य ) सूत ! अकथितोऽपि ज्ञायत एव यथायमाभोगस्तपोवनस्येति ।
सूतः— कथमिव ।
राजा— किं न पश्यति भवान् । इह हि ।


सा खलु = निश्चयेन विदितभक्तिः = विदिता = स्फुटा भक्तिः = श्रद्धा यया सा विदितभक्तिः यद्वा विदिता भक्तिः यस्य सः तं विदितभक्तिं मां महर्षेः = कण्वस्य कुलपतेः समक्षं कथयिष्यति = निवेदयिष्यति ।
वैखानसः—साधयामस्तावत् = गच्छामस्तावत् ( इति एवमुक्त्वा सशिष्यः = शिष्याभ्यां साकं निष्क्रान्तः = रङ्गात्रिःसृतः रङ्गमञ्चादपगत इत्यर्थः । )
राजा—सूत ! अश्वान् = रथ्यान् नोदय = प्रेरय । पुण्याश्रमदर्शनेन = पुण्यश्चासावाश्रमश्चेति पुण्याश्रमः तस्य दर्शनं तेन पुण्याश्रमदर्शनेन दर्शनेन = अवलोकनेन तावत् आत्मानं = स्वं मनो वा । तथाहि—

आत्माकंचन्द्रवातादि जीवेषु परमात्मनि ।
देहे यत्ने धृतौ कीर्तौ बुद्धौ मनसि च श्रुतः ॥

पुनीमहे = पवित्रीकुर्महे ।
सूतः—आयुष्मान् यद् आज्ञापयति = तत् करोमि, अश्वान् नोदयामीत्यर्थः । ( इति भूयः = पुनरपि रथस्य वेग = सत्वरगमनं निरूपयति = नाटयति, हस्तसञ्चालनादिना वेगाभिनयं करोतीत्यर्थः । )
राजा—समन्तात् = सर्वतश्चतुर्दिक्षु अवलोक्य = दृष्ट्वा अवलोकनेन इदं तपोवनमिति निश्चित्य कथयति—सूत ! अकथितोऽपि = अन्येनावेदितोऽपि अयं = पुरोदृश्यमानः तपोवनस्य = आश्रमस्य आभोगः— आभुज्यते इत्याभोगः = परिसरप्रदेशः ज्ञायते = अवगम्यते ।
सूतः—सारथिः कथयति यत् कथमिव = केन प्रकारेण ज्ञायते यदयमाश्रमप्रदेशः ।
राजा—नृपः कथयति यत् किन्न पश्यसि भवान् = त्वम् इह = अत्र स्थाने हि = निश्चयेन ।


तपस्वी— अच्छा तो हमलोग जाते हैं ( रंगमंच से शिष्य के साथ चला जाता है । )
राजा— सारथे ! घोड़ों को हाँकों, चलो, इस आश्रम में चलकर पुण्यतम आश्रम आदि के दर्शन से अपने को पवित्र करें ।
सारथि— महाराज की जो आज्ञा ( रथ को तेजी से हाँकने का अभिनय करता है । )
राजा—( चारों ओर देखकर ) सारथे ! बिना कहे हुए भी स्पष्ट ही मालूम पड़ता है कि यह आश्रम की समीपवर्ती प्रदेश है ।
सारथि— कैसे ?
राजा— क्या आप नहीं देख रहे हैं, यहाँ—


पाठा०—साधयावः । २. इति भूयः ।

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२६ | अभिज्ञानशाकुन्तलम्

नीवाराः ^१शुकगर्भकोटरमुखभ्रष्टास्तरूणामधः
प्रस्निग्धाः क्वचिदिङ्गुदीफलभिदः सूच्यन्त एवोपलाः ।
विश्वासोपगमादभिन्नगतयः शब्दं सहन्ते मृगा-
स्तोयाधारपथाश्च वल्कलशिखानिष्यन्दरेखाङ्किताः ॥ १४ ॥

अन्वयः—(क्वचित्) तरूणाम् अधः शुकगर्भकोटरमुखभ्रष्टाः नीवाराः (विद्यन्ते) क्वचित् प्रस्निग्धाः उपला इङ्गुदीफलभिदः सूच्यन्ते एव (क्वचित्) विश्वासोपगमात् अभिन्नगतयः मृगाः शब्दं सहन्ते (क्वचित्) तोयाधरपथाः च वल्कलशिखानिष्यन्दरेखाङ्किताः (दृश्यन्ते)

नीवारा इति । इह हि क्वचित् = कस्मिंश्चिद्भूभागे तरूणां = वृक्षाणाम् अधः = तलेषु शुकगर्भकोटरमुखभ्रष्टाः शुकाः = कीराः गर्भे = मध्ये येषां तानि यानि कोटराणि तेषां मुखानि = अग्रभागाः तेभ्यः भ्रष्टाः = अधः पतिता इति शुकगर्भकोटरमुखभ्रष्टाः = यद्वा शुकानां कोटरेषु स्थिता ये अर्भका नीडस्था अजातपक्षाः शावकास्तेषां मुखेभ्यो भ्रष्टाः = कीरकुलायावस्थितशावकवदनच्युताः नीवाराः = मुनिधान्यकणाः विद्यन्ते ।

क्वचित् = कुत्रापि इङ्गुदीनां = तापसतरूणां फलानि स्नेहोत्पादनार्थं भिद्यन्ते एभिरिति इङ्गुदीफलभिदः यद्वा इङ्गुदीफलानि = तापसफलानि भिन्दन्ति = छिन्दन्ति इतीङ्गुदीफलभिदः तापसतरुफलभेदकाः अत एव प्रस्निग्धाः = प्रकर्षेण स्निग्धाः प्रस्निग्धाः चिक्कणाः इङ्गुदीतैलाक्ताः उपला = पाषाणखण्डाः सूच्यन्ते = ज्ञायन्ते एव । प्रस्निग्धत्वादिङ्गुदीफलभेदका एते ज्ञायन्ते इत्यर्थः । तापसा उपलैरैव भित्वा इङ्गुदीफलेभ्यः तैलमाकर्षन्तीति प्रसिद्धम्, क्वचित् = कस्मिंश्चिद्भागे विश्वासोपगमात् = विश्वासस्योपगमो विश्वासोपगमः तस्माद् विश्वासोपगमात् = विश्वासलाभात् जातविश्वासाः अत एव **अभिन्नगतयः—**अभिन्ना गतिः येषां ते अभिन्नगतयः = निर्भयगमनाः मृगाः = हरिणाः, शब्दं = रथशब्दं, रथनेमिध्वनि सहन्ते = सधैर्यं शृण्वन्ति । तमसहमानाः ततो न प्लवन्ते इति भावः ।

क्वचित् प्रदेशे तोयाधारपथाः—तोयस्य = जलस्य आधाराः = अधिकरणभूताः जलाशयाः तेषां पन्थानः = मार्गाः इति तोयाधारपथाः = जलयानमार्गाः च वल्कलानां =


मुनियों का अन्न नीवार वृक्षों के नीचे इधर-उधर बिखरा हुआ दिखाई दे रहा है, जो घोसलों में बैठे हुए सुग्गों के बच्चों के मुख से गिरे हुए प्रतीत हो रहे हैं । यहाँ पर जगह-जगह इङ्गुदी के फल पीसने से चिकने हुए पत्थर के टुकड़े पड़े हुए हैं । यहाँ के मृग पक्षी आदि रथ की ध्वनि की आहट से भी डर कर भागते नहीं । और स्नान कर आने वाले मुनि गणों के वल्कलवस्त्रों से टपकते हुए जल की रेखाएँ जलाशयों के भागों पर दिखाई दे रही हैं । इससे स्पष्ट मालूम पड़ता है कि अब हमलोग आश्रम की सीमा में पहुँच गये हैं ॥ १४ ॥

**विशेष—**मुन्यन्न नीवार, इङ्गुदीफल तैल से चिकने पत्थरों के टुकड़े निर्भय मृग-पक्षी तथा जलाशयों से आने-जाने के चिह्न तपोवन का सूचक हैं । नीवार धान्य मुनियों का भोज्य पदार्थ है। नीवार बिना जोते बोये होनेवाला अन्न है । आश्रमस्थ मुनि लोग इङ्गुदी के फलों को पीसकर उससे तेल निकाल कर लगाते हैं और कुश से हरिण के बच्चों की जीभ छिल जाने पर लगा देते हैं, तपोवन के आश्रमों में पशु-पक्षी निर्भय रहते हैं क्योंकि उनको किसी से हिंसा का भय नहीं । ऋषि लोग


पाठ०—१. शुककोटरार्भकमुख ।

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प्रथमोऽङ्कः २७

अपि च—

¹कुल्याम्भोभिः पवनचपलैः शाखिनो धौतमूला भिन्नो रागः किसलयरुचामाज्यधूमोद्गमेन । एते चार्वागुपवनभुविच्छिन्नदर्भाङ्कुरायां नष्टाशङ्का हरिणशिशवो मन्दमन्दं चरन्ति ॥ १५ ॥

वृक्षत्वग्वस्त्राणां शिखाभ्यः = अग्रेभ्यः यः निष्यन्दः = जलस्रावः तस्य या रेखा पङ्क्तिः तया अङ्किताः चिह्निता इति वल्कलशिखा निष्यन्दरेखाङ्किताः = वल्कलाग्रपरिश्रुतजला-धाररेखाविभूषिताः दृश्यन्ते । वैखानसानां तापसानां च वस्त्रनिष्पीडननिषेधात् सद्यः स्नानेन त्वग्वस्त्रस्रुत्तवारिकणैः सैकतभूभागाः चिह्निता भवन्ति । तस्मादेभिलक्षणैरयमा-श्रमस्यैवाभोग एवानुमीयते भावः । अत्र काव्यलिङ्गम्, अनुमानं-स्वभावोक्तिश्चालङ्काराः शार्दूलविक्रीडितं च वृत्तम्, इति ॥ १४ ॥

अन्वयः—पवनचपलैः कुल्याम्भोभिः शाखिनः धौतमूलाः किसलयरुचां रागः आज्य-धूमोद्गमेन भिन्नः अर्वाक् च एते नष्टशङ्काः हरिणशिशवः छिन्नदर्भाङ्कुरायां उपवनभुवि मन्दं मन्दं चरन्ति ।

कुल्याम्भोभिः इति । पवनचपलैः = पवनेन = वायुना चपलैः = वाताहतैः चञ्चलैः = कुल्याम्भोभिः = कुल्यायाः = कृत्रिमायाः खाताया अम्भोभिः = जलैः आलवालवारिभिः = धौतानि = प्रक्षालितानि मूलानि = अधोभागा येषां ते धौतमूलाः = क्षालितमूलाः किसलयरुचां = किसलयानां = पल्लवानां रुचां = प्रभायाम् = पल्लवद्युतीनां रागः = लौहित्यं, आज्यधूमोद्गमेन = आज्यस्य = घृतस्य यो धूमः तस्य उद्गमेन = उद्भवेन = हविर्धूम-

हरिणों के बच्चों को बड़ा प्यार करते हैं। आश्रम के वृक्षों पर लटका कर सुखाने के लिए गीला-वल्कल वस्त्र ले जाते समय जलाशयों से पर्णकुटी तक जाने का मार्ग चिह्नित हो जाता है। तोते अपने बच्चों को चुगाने के निमित्त नीवार की बालें खेतों से लाते हैं, चुगाते समय उनके मुख से दाने गिर जाते हैं तथा मुनियों के अतिरिक्त कोई नीवार खाता नहीं। ये सब पूर्वोक्त बातें मुनियों के आश्रम में ही संभव होने के कारण राजा दुष्यन्त ने आश्रम पर पहुँच जाने का अन्दाजा कर लिया।

और भी देखो—

वायु से चञ्चल कृत्रिम क्यारियों में जल से भरे हुए वृक्षों की जड़ें धुल गयी हैं। अग्निहोत्र के आज्यधूम से वृक्षों के कोमल पल्लवों का रंग भी धूमिल हो गये हैं और छोटे-छोटे हरिणों के बच्चे निर्भय होकर कुशाओं के उखाड़ लेने से निष्कण्टक हुए उपवन के भूभाग में घूम-फिर रहे हैं। इससे स्पष्ट ही ज्ञात होता है कि यह आश्रम का ही प्रदेश है ॥ १५ ॥

विशेष—पूर्वश्लोक में वृक्षों के नीचे गिरे हुए नीवार, हिंगोट के तेल से सने पत्थर के टुकड़े मृगों के मन्द गमन और जलाशयों से आश्रम तक पानी की बूँदों से सिञ्चित भूमि से राजा ने आश्रमभूमि का अन्दाजा किया था, किन्तु अब इस श्लोक में वर्णित वायु से चंचल आलवालों के जल से वृक्षों की जड़ों के धुलने से, अग्निहोत्र के धुयें से पल्लवों के रंगपरिवर्तन से तथा कटे हुए कुशवाली समीपवर्ती भूमिपर मन्द गति से निर्भय चलने वाले हरिण शावकों से राजा को निश्चय हो गया कि यह आश्रम की पवित्रतम भूमि है।


पाठा०—१. अयं श्लोको हि क्वचिन्न्न वर्तते ।

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२८अभिज्ञानशाकुन्तलम्

सूतः--सर्वमुपपन्नम् !
राजा-- (स्तोकमन्तरं गत्वा ।) ¹तपोवननिवासिनामुपरोधो मा भूत् । ²एतावत्येव रथं स्थापय यावदवतरामि ।
सूतः--धृताः प्रग्रहाः । अवतरत्वायुष्मान् ।
राजा--( अवतीर्य³ ) सूत ! विनीतवेषेण प्रवेष्टव्यानि तपोवनानि नाम । ⁴इदं तावत् गृह्यताम् ( सूतस्याभरणानि धनुश्चोपनय ) सूत यावदाश्रमवासिनः प्रत्यवेक्ष्याहमुपावर्ते तावदार्द्रपृष्ठाः क्रियन्तां वाजिनः ।


पटलोद्गमेन भिन्नः = परिवर्तितः अर्वाक् = समीपे च एते = इमे पुरोदृश्यमानाः नष्टा = दूरीभूता आशङ्का भयं येषां ते नष्टशङ्काः = निर्भयाः हरिणानां = मृगाणां शिशवः = शावकाः अर्भकाः छिन्नाः = लूनाः दर्भाणां = कुशानां, अङ्कुराः = अग्रभागा यस्याः सा तस्यां छिन्नदर्भाङ्कुरायां = लूनदर्भायां उपवनभुवि = उपवनस्य = उद्यानस्थ भुवि = भूमौ आरामभूभागे मन्दमन्दं = शनैः शनैः चरन्ति = चलन्ति, खेलन्तीत्यर्थः । अतोऽयमाश्रमप्रदेश एवाशयः । अत्र काव्यलिङ्ग-अनुमान-समुच्चय-स्वभावोक्तिवृत्त्यनुप्रासा अलङ्काराः सन्ति वृत्तञ्च मन्दाक्रान्ताऽस्ति ॥ १५ ॥

**सूतः--**सारथिः कथयति यत् राजन् ! सर्वं = सकलम् उपपन्नं = युक्तमुक्तं भवता । नूनं तपोवनाभोग एवायमित्यर्थः ।

**राजा--**राजा = दुष्यन्तः स्तोकं = अल्पम् अन्तरम् = अभ्यन्तरं गत्वा = उपस्थाय, तपोवननिवासिनां = पुण्याश्रमवासिनाम्, उपरोधः = मर्यादाभङ्गः शान्तिभङ्गः मा भूत् = मा भवतु, एतावति = आश्रमावधिभूतेऽस्मिन्नेव प्रदेशे, आश्रमबहिर्मार्गे रथं = स्यन्दनं स्थापय = स्थिरीकुरु । अवतरामि = रथादवरोहामि अवतीर्य पद्भ्यामेव गच्छामि ।

**सूतः--**धृताः प्रग्रहाः = रश्मयः संचयिताः आकृष्टा रथोऽवस्थित इति भावः । आयुष्मान् = भवान् अवतरतु = रथात् नीचेः गच्छतु ।

**राजा--**राजा = नृपतिः दुष्यन्तः ( अवतीर्य=रथात् अधः आगत्य ) सूत !=सारथे ! विनीतवेषेण =विनीतश्चासौ वेषो विनीतवेषः तेन विनीतवेषेण=अनुद्धतेन वेषेण तपोवनानि=


**सारथि--**आपका तर्क सर्वथा युक्तिसंगत है अर्थात् यह आश्रम का ही प्रदेश है ।

राजा--( कुछ दूर और चलकर ) सारथे ! इस आश्रम की मर्यादा भंग न हो इसलिए तुम रथ को यहीं रोक लो, जिससे मैं रथ से यहीं उतर जाऊँ। ( अब उतर कर पैदल ही चलूँगा )।

**सारथि--**महाराज ! घोड़ों की लगाम खींचकर मैंने रथ को खड़ा कर दिया है । श्रीमान् अब रथ से नीचे उतरें ।

राजा--( रथ से उतरकर ) सारथे ! आश्रम में विनीत वेष से ही जाना चाहिए । अतः मेरे इन आभूषणों और धनुष को तुम यहीं रख लो (आभूषण एवं धनुष सारथि को देकर) सारथे ! जबतक मैं आश्रमवासियों के दर्शन करके आता हूँ तबतक तुम इन घोड़ों को रथ से खोलकर इनकी पीठ ठण्डी कर लो और खरहरा कर घास-पानी देकर उन्हें ताजा कर लो ।

**विशेष--**मुनियों के आश्रम पर ठाट-बाट से जाना उचित नहीं, वहाँ तो बड़े सादगी वेश और


पाठा०—१. आश्रमोपरोधो मा भूदिति । २. तदिहैव । ३. अवतीर्य आत्मानं चावलोक्य । ४. तदिमानि तावद् गृह्णन्तामाभरणानि धनुश्च ( इति सूतायार्पयति ) ।

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प्रथमोऽङ्कः२९

सूतः--यदाज्ञापयति देवः । ( निष्क्रान्तः )
राजा--( परिक्रम्यावलोक्य च ) इदमाश्रमद्वारम् । यावत् प्रविशामि । ( प्रविश्य निमित्तं सूचयन् ) ।

शान्तमिदमाश्रमपदं स्फुरति च बाहुः कुतः फलमिहास्य ।
अथवा भवितव्यानां द्वाराणि भवन्ति सर्वत्र ॥ १६ ॥


मुनीनां पवित्रा आश्रमाः प्रवेष्टव्यानि प्रवेशयोग्यानि नाम = निश्चयेन, इदम् = एतत् तावत् गृह्यन्तां = गृहीत्वा रक्ष्यन्ताम् इत्युक्त्वा सूतस्य = सूताय आभरणानि = आभूषणानि धनुः = कार्मुकं च उपनीय = उपहृत्य अर्पयति = ददाति, आदिशच्च । सूत ! = सारथे ! तावत् = यावत्पर्यन्तम्, आश्रमवासिनः—ऋषिजनान् प्रत्यवेक्ष्य = योगक्षेमपर्यालोचन-पूर्वकंमवेक्षणं कृत्वा अहम् = दुष्यन्तः उपावर्ते = प्रत्यागच्छामि तावत् = तावत्पर्यन्तं वाजिनः = अश्वाः, आर्द्रपृष्ठाः—आर्द्राणि स्नानेन क्लिन्नानि पृष्ठानि पृष्ठभागाः ते आर्द्र-पृष्ठाः क्रियन्तां = विधीयन्ताम् ( अश्वानां पृष्ठप्रक्षालनं हि विशेषतः श्रमहरम् ) ।

सूतः—निष्क्रान्तः । सूतः सारथिः तथा एवम् इति कथयित्वा । निष्क्रान्तः = रङ्गमञ्चाद् बहिर्गतः ।

राजा—राजा = दुष्यन्तः परिक्रम्य = रङ्गमञ्चे परितः कतिचित् पदानि गत्वा, अवलोक्य = दृष्ट्वा च इदम् = एतत् आश्रमद्वारं = आश्रमस्य = तपोवनस्य द्वारं = मुखम् इति आश्रमद्वार = आश्रमस्थानम् वर्तते यावत् = तत् प्रविशामि = अभ्यन्तरं गच्छामि प्रविश्य = आश्रमाभ्यन्तरं गत्वा निमित्तं = शकुनं सूचयन् = नाटयन् । पुरुषस्य दक्षिणाङ्ग-स्फुरणं शुभसूचकं निमित्तं दक्षिणबाहुस्पन्दनं, फलं चास्य कलत्रावाप्तिः ।

अन्वयः—इदम् आश्रमपदं शान्तं, बाहुश्च स्फुरति, इह अस्य फलं कुतः, अथवा भवितव्यानां द्वाराणि सर्वत्र भवन्ति ।

शान्तमिदमिति । इदं = पुरोदृश्यमानम्, आश्रमपदं = तपोवनस्थानम् शान्तं = शम-प्रधानम्, बाहुश्च = दक्षिणो बाहुः यथा विक्रमोर्वशीये—अयमास्पन्दितैः बाहुराश्वासयति दक्षिणः । स्फुरति = कान्तालाभार्थमवच्छिन्नं स्पन्दते, इह = शान्तेऽस्मिन्नाश्रमपदे अस्य


विनम्र भाव से जाना चाहिए । क्योंकि मनुस्मृति में मनुजी ने निरीक्षण के समय विनीतभाव और आभूषण रहित होकर आश्रमों में जाने का आदेश दिया है—
विनीतवेषाभरणः पश्येत् कार्यं कार्यिणाम् । = ८।२
इसी सिद्धान्त के अनुसार आजकल भी लोग पूजनीय व्यक्तियों के स्थानों पर टोपी जूता उतार-कर और छड़ी रखकर जाते-आते हैं ।

सारथि—महाराज की जो आज्ञा ( निकल जाता है । )

राजा—( थोड़ा आगे चलकर और सामने देखकर ) यह आश्रम का प्रवेश है । अच्छा, अब मैं इसमें प्रवेश करता हूँ । ( आश्रम के द्वार में प्रवेश कर दाहिनी भुजा का फड़कना सूचित करते हुए । )

यह आश्रम तो शान्तस्थान है, परन्तु मेरी दाहिनी भुजा फड़क रही है, भला इस तपोवन में इस शुभ शकुन का फल कैसे संभव हो सकता है ? या हो भी सकता है, भावी के द्वार सर्वत्र हैं ॥ १६ ॥

विशेष—शकुन शास्त्र में पुरुष की दाहिनी भुजा का फड़कना शुभ तथा सुन्दरी स्त्री का लाभ बताया है—'वामेतरकरस्पन्दो वरस्त्रीलाभदायकः' इस शकुन के सम्बन्ध में राजा सोचता है