भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ३ ] | सुन्दरकाण्ड | २१७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
चित्रकूटगिरौ पूर्वमेकदा रहसि स्थितः ।<br>मदङ्के शिर आधाय निद्राति रघुनन्दनः ॥५३॥<br>ऐन्द्रः काकस्तदाऽऽगत्य नखैस्तुण्डेन चासकृत् ।<br>मत्पादाङ्गुष्ठमारक्तं विददारामिषाशया ॥५४॥<br>ततो रामः प्रबुद्ध्याथ दृष्ट्वा पादं कृतव्रणम् ।<br>केन भद्रे कृतं चैतद्विप्रियं मे दुरात्मना ॥५५॥<br>इत्युक्त्वा पुरतोऽपश्यद्वायसं मां पुनः पुनः ।<br>अभिद्रवन्तं रक्ताक्तनखतुण्डं चुकोप ह ॥५६॥<br>तृणमेकमुपादाय दिव्यास्त्रेणाभियोज्य तत् ।<br>चिक्षेप लीलया रामो वायसोपरि तज्ज्वलन्॥५७॥<br>अभ्यद्रवद्वायसञ्च भीतो लोकान् भ्रमन्पुनः ।<br>इन्द्रब्रह्मादिभिश्चापि न शक्यो रक्षितुं तदा ॥५८॥<br>रामस्य पादयोरग्रेऽपतद्भीत्या दयानिधेः ।<br>शरणागतमालोक्य रामस्तमिदमब्रवीत् ॥५९॥<br>अमोघमेतदस्त्रं मे दत्त्वैकाक्षमतो व्रज ।<br>सव्यं दत्त्वा गतः काक एवं पौरुषवानपि ॥६०॥<br>उपेक्षते किमर्थं मामिदानीं सोऽपि राघवः ।लिये एक बात और बतलाती हूँ—एक दिन चित्रकूट पर्वतपर श्रीरघुनाथजी एकान्तमें मेरी गोदमें शिर रखे सो रहे थे ॥५३॥ इसी समय इन्द्रका पुत्र (जयन्त) काक-वेषमें वहाँ आया और मांसके लोभसे मेरे पैरके लाल-लाल अँगूठेको अपनी चोंच तथा पञ्जोंसे फाड़ डाला ॥५४॥ तदनन्तर जब श्रीरामचन्द्रजी जागे तो मेरे पैरमें घाव हुआ देखकर बोले—“प्रिये ! किस दुरात्माने मेरा यह अप्रिय किया है ?” ॥५५॥ वे यह कह ही रहे थे कि उन्होंने अपने सामने उस कौएको बारम्बार मेरी ओर आते देखा । उसकी चोंच और पञ्जे रुधिरसे सने हुए थे। उसे देखकर उन्हें बड़ा क्रोध हुआ ॥५६॥ उन्होंने तुरन्त ही एक तृण उठाकर उसपर दिव्यास्त्रका प्रयोग किया और उसे लीलासे ही उस कौएकी ओर फेंक दिया । उसके तापसे सन्तप्त हो वह काक भयभीत होकर त्रिलोकीमें भटकता फिरा किन्तु जब इन्द्र, ब्रह्मा आदिसे भी उसकी रक्षा न हो सकी तो बहुत ही डरता-डरता दयानिधान भगवान् रामके चरणोंमें गिरा । उसे शरणागत देख श्रीरामचन्द्रजीने उससे कहा—॥५७–५९॥ “मेरा यह अस्त्र अमोघ है। (यह कभी व्यर्थ नहीं जा सकता)। अतः तू केवल अपनी एक आँख देकर यहाँसे चला जा। तब वह काक अपनी बायीं आँख देकर चला गया। जो ऐसे पुरुषार्थी हैं वे ही श्रीरघुनाथजी न जाने इस समय क्यों मेरी उपेक्षा कर रहे हैं ?”
हनूमानपि तामाह श्रुत्वा सीतानुभाषितम् ॥६१॥<br>देवि त्वां यदि जानाति स्थितामत्र रघूत्तमः ।<br>करिष्यति क्षणाद्भस्म लङ्कां राक्षसमण्डिताम्॥६२॥सीताजीका यह कथन सुनकर हनुमान्जीने कहा—<br>“देवि ! जिस समय श्रीरघुनाथजीको तुम्हारे यहाँ होनेका पता चलेगा उस समय इस राक्षस-मण्डल-मण्डिता लंकाको वे एक क्षणमें ही भस्म कर डालेंगे” ॥६०-६२॥
जानकी प्राह तं वत्स कथं त्वं योत्स्यसेऽसुरैः ।<br>अतिसूक्ष्मवपुः सर्वे वानराश्च भवादृशाः ॥६३॥जानकीजीने कहा—"वत्स ! तुम अत्यन्त सूक्ष्म शरीरवाले हो, अतः राक्षसोंसे कैसे लड़ सकोगे ? और सब वानर भी तो तुम्हारे ही समान होंगे ? ॥६३॥
श्रुत्वा तद्वचनं देव्यै पूर्वरूपमदर्शयत् ।<br>मेरुमन्दरसङ्काशं रक्षोगणविभीषणम् ॥६४॥<br>दृष्ट्वा सीता हनूमन्तं महापर्वतसन्निभम् ।देवी जानकीजीके ये वचन सुनकर हनुमान्जीने उन्हें अपना पूर्वरूप दिखलाया। जो मेरु और मन्दर पर्वतके समान अति विशाल और राक्षसोंको भय उत्पन्न करनेवाला था ॥६४॥ हनुमान्जीको महापर्वतके समान विशालकाय देखकर सीताजीको अपार