भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ४ ] सुन्दरकाण्ड २२५


तूर्यघोषैर्घोषयन्तस्ताडयन्तो मुहुर्मुहुः ॥३८॥ हनूमताऽपि तत्सर्वं सोढं किञ्चिच्चिकीर्षुणा । गत्वा तु पश्चिमद्वारसमीपं तत्र मारुतिः ॥३९॥ सूक्ष्मो बभूव बन्धेभ्यो निःसृतः पुनरप्यसौ । बभूव पर्वताकारस्तत उत्प्लुत्य गोपुरम् ॥४०॥ तत्रैकं स्तम्भमादाय हत्वा तान् रक्षिणः क्षणात् । विचार्य कार्यशेषं स प्रासादाग्राद्गृहद्गृहम् ॥४१॥ उत्प्लुत्योत्प्लुत्य सन्दीप्तपुच्छेन महता कपिः । ददाह लङ्कामखिलां साट्टप्रासादतोरणाम् ॥४२॥ हा तात पुत्र नाथेति क्रन्दमानाः समन्ततः । व्याप्ताःप्रासादशिखरेऽप्यारूढा दैत्ययोषितः॥४३॥ देवता इव दृश्यन्ते पतन्त्यः पावकेऽखिलाः । विभीषणगृहं त्यक्त्वा सर्वं भस्मीकृतं पुरम् ॥४४॥ तत उत्प्लुत्य जलधौ हनूमान्मारुतात्मजः । लाङ्गूलं मज्जयित्वान्तः स्वस्थचित्तो बभूव सः ॥४५॥ वायोः प्रियसखित्वाच्च सीतया प्रार्थितोऽनलः । न ददाह हरेः पुच्छं बभूवात्यन्तशीतलः ॥४६॥ यन्नामसंस्मरणधूतसमस्तपापा- स्तापत्रयानलमपीह तरन्ति सद्यः । तस्यैव किं रघुवरस्य विशिष्टदूतः सन्तप्यते कथमसौ प्रकृतानलेन ॥४७॥

बजाकर यह कहते हुए कि 'यह चोर है' नगरमें सब ओर घुमाने लगे ॥ ३६-३८ ॥ हनुमान्‌जीने भी कुछ कौतुक करनेकी इच्छासे यह सब सहन कर लिया । जिस समय वे पश्चिमद्वारपर पहुँचे उस समय तुरन्त ही सूक्ष्मरूप होकर उन बन्धनोंमेंसे निकल गये और फिर पर्वताकार हो उछलकर द्वारके कँगूरेपर चढ़ गये ॥ ३९-४० ॥ वहाँसे उन्होंने एक स्तम्भ उखाड़कर एक क्षणमें ही उन समस्त रक्षकोंको मार डाला और फिर अपना शेष कार्य निश्चय कर उस प्रासादके अग्रभागसे एक घरसे दूसरे घरपर छलाँग मारते हुए अपनी जलती हुई लम्बी पूँछसे महल, अटारी और बन्दनवारादिसे युक्त समस्त लंकापुरीमें आग लगा दी ॥ ४१-४२ ॥ उस समय 'हा तात ! हा पुत्र ! हा नाथ !' कहकर सब ओर फैली हुई, महलोंके ऊपर भी चढ़ी हुई तथा अग्निमें गिरती हुई समस्त दैत्यस्त्रियाँ देवताओंके समान मालूम होती थीं। इस प्रकार हनुमान्‌जीने विभीषणके घरको छोड़कर और सारा नगर भस्म कर डाला ॥ ४३-४४ ॥ तदनन्तर पवनात्मज हनुमान्‌जी उछलकर समुद्रमें कूद पड़े और अपनी पूँछ बुझाकर स्वस्थचित्त हो गये ॥ ४५ ॥ सीताजीकी प्रार्थनासे तथा वायुका प्रिय मित्र होनेके कारण अग्निने हनुमान्‌जीकी पूँछ नहीं जलायी । उनके लिये वह अत्यन्त शीतल हो गया ॥ ४६ ॥

जिनके नाम-स्मरणसे मनुष्य समस्त पापोंसे छूटकर तुरन्त ही तापत्रयरूप अग्निको पार कर जाते हैं उन्हीं श्रीरघुनाथजीके विशिष्ट दूतको यह प्राकृत अग्नि भला किस प्रकार ताप पहुँचा सकता था ? ॥ ४७ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे सुन्दरकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥