अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
पृष्ठ 256, कुल 423 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ५ ] सुन्दरकाण्ड २२९
[ संस्कृत मूल ]
वृक्षशाखान्तरे स्थित्वा सूक्ष्मरूपेण ते कथाम् ॥ ३९ ॥
जन्मारभ्य तदात्यर्थं दण्डकागमनं तथा ।
दशाननेन हरणं जानक्या रहिते त्वयि ॥ ४० ॥
सुग्रीवेण यथा मैत्री कृत्वा वालिनिबर्हणम् ।
मार्गणार्थं च वैदेह्याः सुग्रीवेण विसर्जिताः ॥ ४१ ॥
महाबला महासत्त्वा हरयो जितकाशिनः ।
गताः सर्वत्र सर्वे वै तत्रैकोऽहमिहागतः ॥ ४२ ॥
अहं सुग्रीवसचिवो दासोऽहं राघवस्य हि ।
दृष्टा यज्जानकी भाग्यात्प्रयासः फलितोऽद्य मे ॥ ४३ ॥
इत्युदीरितमाकर्ण्य सीता विस्फारितेक्षणा ।
केन वा कर्णपीयूषं श्रावितं मे शुभाक्षरम् ॥ ४४ ॥
यदि सत्यं तदायातु मदर्शनपथं तु सः ।
ततोऽहं वानराकारः सूक्ष्मरूपेण जानकीम् ॥ ४५ ॥
प्रणम्य प्राञ्जलिर्भूत्वा दूरादेव स्थितः प्रभो ।
पृष्टोऽहं सीतया कस्त्वमित्यादि बहुविस्तरम् ॥ ४६ ॥
मया सर्वं क्रमेणैव विज्ञापितमरिन्दम ।
पश्चान्मयार्पितं देव्यै भवद्दत्ताङ्गुलीयकम् ॥ ४७ ॥
तेन मामतिविश्वस्ता वचनं चेदमब्रवीत् ।
यथा दृष्टोऽस्मि हनुमन्पीड्यमाना दिवानिशम् ४८
राक्षसीनां तर्जनैस्तत्सर्वं कथय राघवे ।
मयोक्तं देवि रामोऽपि त्वच्चिन्तापरिनिष्ठितः ॥ ४९ ॥
परिशोचत्यहोरात्रं त्वद्वार्ता नाधिगम्य सः ।
इदानीमेव गत्वाऽहं स्थितिं रामाय ते ब्रुवे ॥ ५० ॥
रामः श्रवणमात्रेण सुग्रीवेण सलक्ष्मणः ।
वानरानीकपः सार्धमागमिष्यति तेऽन्तिकम् ॥ ५१ ॥
रावणं सकुलं हत्वा नेष्यति त्वां स्वकं पुरम् ।
अभिज्ञां देहि मे देवि यथा मां विश्वसेद्विभुः ॥ ५२ ॥
इत्युक्ता सा शिरोरत्नं चूडापाशे स्थितं प्रियम् ।
[ हिन्दी अनुवाद ]
में मैंने सीताजीको देखा और धीरे-धीरे उन्हें ढाँढ़स-बँधाया। वहाँ जाकर पहले मैंने सूक्ष्मरूपसे वृक्षके पत्तोंमें छिपे-छिपे संक्षेपमें आपकी सब कथा सुनायी, जिस प्रकार जन्मसे लेकर आपका दण्डकारण्यमें आना हुआ, आपकी अनुपस्थितिमें रावणने सीताजीको हरा, तथा जिस प्रकार सुग्रीवसे मित्रता कर आपने वालीको मारा— (वह सब सुनाकर फिर मैंने कहा कि) सुग्रीवद्वारा सीताजीकी खोजके लिये भेजे हुए बड़े बलवान्, पराक्रमी और विजयशाली वानरगण सब दिशाओंमें गये हैं और उनमेंसे एक मैं सुग्रीवका मन्त्री और रघुनाथजीका दास यहाँ आया हूँ। आज भाग्यवश मैने जानकीजीको देख लिया अतः मेरा प्रयास सफल हो गया ॥ ३७–४३ ॥
"मेरा यह कथन सुनकर सीताजीके नेत्र खिल गये और वे कहने लगीं— 'मुझे ये कर्णामृतरूप शुभ संवाद किसने सुनाया है? यदि यह सब सत्य है (—मुझे भ्रम नहीं हुआ है) तो इस संवादको सुनानेवाला मेरे सामने आवे।' हे प्रभो! तब मैं सूक्ष्मरूपसे बन्दरके आकारमें उनके सामने उपस्थित हुआ और दूरहीसे प्रणाम कर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। तब जानकीजीने मुझसे 'तुम कौन हो?' इत्यादि बहुत-सी बातें पूछीं ॥ ४४–४६ ॥ और हे शत्रुदमन! मैंने उन्हें क्रमशः सब बातें बतला दीं। इसके पश्चात् मैंने उन्हें आपकी दी हुई अँगूठी निवेदन की ॥ ४७ ॥ इससे उन्हें मुझपर पूर्ण विश्वास हो गया और वे मुझसे इस प्रकार कहने लगीं— 'हनुमन्! जिस प्रकार इन राक्षसियोंके त्राससे तुमने मुझे अहर्निश दुःख उठाते देखा है वह सब ज्यों-का-त्यों रघुनाथजीको सुना देना।' मैंने कहा— 'देवि! रघुनाथजी भी तुम्हारी ही चिन्तासे ग्रस्त रहते हैं, और तुम्हारा समाचार न मिलनेसे रात-दिन तुम्हारी ही चिन्ता करते रहते हैं। मैं अभी जाकर उन्हें तुम्हारी स्थिति सुनाऊँगा ॥ ४८–५० ॥ और रघुनाथजी उसे सुनते ही सुग्रीव, लक्ष्मण और अन्यान्य वानर सेनापतियोंके साथ तुम्हारे पास आयेंगे ॥ ५१ ॥ तथा रावणको कुटुम्बसहित मारकर तुम्हें अपनी राजधानी अयोध्याको ले जायेंगे। हे देवि! तुम मुझे कोई ऐसा चिह्न दो जिससे भगवान् मेरा विश्वास करें' ॥ ५२ ॥ मेरे इस प्रकार कहनेपर उन्होंने अपने केशपाशमें स्थित अपनी प्रिया चूडामणि दी और पहले