भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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२४२अध्यात्मरामायण[ सर्ग ३

ततोऽचिरेण सचिवैश्चतुर्भिः सहितो भयात् ॥ ५ ॥<br>त्वामेव भवमोक्षाय मुमुक्षुः शरणं गतः।<br>विभीषणवचः श्रुत्वा सुग्रीवो वाक्यमब्रवीत् ॥ ६ ॥ | अपने चार मन्त्रियोंके सहित संसार-पाशसे मुक्त होनेके लिये मुमुक्षु होकर आपकी ही शरणमें चला आया हूँ।”<br>विभीषणके ये वचन सुनकर सुग्रीवने कहा—॥ ५-६ ॥ “हे राम ! इस मायावी राक्षसाधमका कुछ विश्वासाहर्हो न ते राम मायावी राक्षसाधमः ।<br>सीताहर्तुर्विशेषेण रावणस्यानुजो बली ॥ ७ ॥ | विश्वास न करना चाहिये । ( यदि कोई और होता तब कोई विशेष चिन्ताकी बात भी नहीं थी किन्तु ) यह तो सीताका हरण करनेवाले रावणका ही छोटा भाई है और वैसे भी बहुत बलवान् दिखायी देता है ॥ ७॥ मन्त्रिभिः सायुधैरस्मान् विवरे निहनिष्यति ।<br>तदाज्ञापय मे देव वानरैर्हन्यतामयम् ॥ ८ ॥ | यह अपने सशस्त्र मन्त्रियोंके साथ किसी समय एकान्तमें हमें मार डालेगा । अतः हे प्रभो ! मुझे आज्ञा दीजिये मैं इसे वानरोंसे मरवा डालूँ ॥ ८ ॥ ममैवं भाति ते राम बुद्ध्या किं निश्चितं वद ।<br>श्रुत्वा सुग्रीववचनं रामः सस्मितमब्रवीत् ॥ ९ ॥ | हे राम ! मुझे तो ऐसा ही जँचता है, आपका इस विषयमें क्या निश्चय है, सो कहिये।” सुग्रीवके वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने मुसकाकर कहा—॥९॥ “हे कपिश्रेष्ठ ! यदीच्छामि कपिश्रेष्ठ लोकान्सर्वान्सहेश्वरान्।<br>निमिषार्धेन संहन्यां सृजामि निमिषार्धतः ॥१०॥ | यदि मेरी इच्छा हो तो मैं आधे निमेषमें ही लोकपालोंके सहित सम्पूर्ण लोकोंको नष्ट कर सकता हूँ और आधे निमेषमें ही सबको रच सकता हूँ, अतः ( तुम किसी अतो मयाऽभयं दत्तं शीघ्रमानय राक्षसम् ॥११॥ | प्रकारकी चिन्ता न करो ) मैं इस राक्षसको अभयदान देता हूँ, तुम इसे शीघ्र ही ले आओ ॥ १०-११ ॥ सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।<br>अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम ॥१२॥ | मेरा यह नियम है कि जो एक बार भी मेरी शरण आकर ‘मैं तुम्हारा हूँ’ ऐसा कहकर मुझसे अभय माँगता है उसे मैं समस्त प्राणियोंसे निर्भय कर देता हूँ” ॥१२॥ रामस्य वचनं श्रुत्वा सुग्रीवो हृष्टमानसः ।<br>विभीषणमथानाय्य दर्शयामास राघवम् ॥१३॥ | रामके ये वचन सुनकर सुग्रीवने अति प्रसन्नचित्तसे विभीषणको लाकर रघुनाथजीसे मिलाया ॥ १३ ॥ विभीषणस्तु साष्टाङ्गं प्रणिपत्य रघूत्तमम् ।<br>हर्षगद्गदया वाचा भक्त्या च परयान्वितः ॥१४॥ | विभीषणने रघुनाथजीको साष्टांग प्रणाम किया और हर्षसे गद्गदकण्ठ हो परम भक्तिपूर्वक हाथ जोड़- रामं श्यामं विशालाक्षं प्रसन्नमुखपङ्कजम् ।<br>धनुर्बाणधरं शान्तं लक्ष्मणेन समन्वितम् ॥१५॥<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा स्तोतुं समुपचक्रमे ॥१६॥ | कर शान्तमूर्ति प्रसन्नवदनारविन्द विशालनयन श्यामसुन्दर धनुर्बाणधारी भगवान् रामकी, लक्ष्मणजीके सहित, स्तुति करनी आरम्भ की ॥ १४-१६ ॥

विभीषण उवाच | विभीषण बोले— नमस्ते राम राजेन्द्र नमः सीतामनोरम ।<br>नमस्ते चण्डकोदण्ड नमस्ते भक्तवत्सल ॥१७॥ | “हे राजराजेश्वर राम ! आपको नमस्कार है। हे सीताके मनमें रमण करनेवाले ! आपको नमस्कार है । हे प्रचण्डधनुर्धर ! आपको नमस्कार है । हे भक्तवत्सल ! आपको बारम्बार नमस्कार है ॥ १७ ॥ नमोऽनन्ताय शान्ताय रामायामिततेजसे ।<br>सुग्रीवमित्राय च ते रघूणां पतये नमः ॥१८॥ | हे अनन्त, शान्त, अतुलतेजोमय, सुग्रीवसखा रघुकुलनायक भगवान् राम ! आपको नमस्कार है ॥१८॥ जगदुत्पत्तिनाशानां कारणाय महात्मने । | जो संसारकी उत्पत्ति और नाशके कारण हैं त्रिलोकी-

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