अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
| २४२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ३ |
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ततोऽचिरेण सचिवैश्चतुर्भिः सहितो भयात् ॥ ५ ॥<br>त्वामेव भवमोक्षाय मुमुक्षुः शरणं गतः।<br>विभीषणवचः श्रुत्वा सुग्रीवो वाक्यमब्रवीत् ॥ ६ ॥ | अपने चार मन्त्रियोंके सहित संसार-पाशसे मुक्त होनेके लिये मुमुक्षु होकर आपकी ही शरणमें चला आया हूँ।”<br>विभीषणके ये वचन सुनकर सुग्रीवने कहा—॥ ५-६ ॥ “हे राम ! इस मायावी राक्षसाधमका कुछ विश्वासाहर्हो न ते राम मायावी राक्षसाधमः ।<br>सीताहर्तुर्विशेषेण रावणस्यानुजो बली ॥ ७ ॥ | विश्वास न करना चाहिये । ( यदि कोई और होता तब कोई विशेष चिन्ताकी बात भी नहीं थी किन्तु ) यह तो सीताका हरण करनेवाले रावणका ही छोटा भाई है और वैसे भी बहुत बलवान् दिखायी देता है ॥ ७॥ मन्त्रिभिः सायुधैरस्मान् विवरे निहनिष्यति ।<br>तदाज्ञापय मे देव वानरैर्हन्यतामयम् ॥ ८ ॥ | यह अपने सशस्त्र मन्त्रियोंके साथ किसी समय एकान्तमें हमें मार डालेगा । अतः हे प्रभो ! मुझे आज्ञा दीजिये मैं इसे वानरोंसे मरवा डालूँ ॥ ८ ॥ ममैवं भाति ते राम बुद्ध्या किं निश्चितं वद ।<br>श्रुत्वा सुग्रीववचनं रामः सस्मितमब्रवीत् ॥ ९ ॥ | हे राम ! मुझे तो ऐसा ही जँचता है, आपका इस विषयमें क्या निश्चय है, सो कहिये।” सुग्रीवके वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने मुसकाकर कहा—॥९॥ “हे कपिश्रेष्ठ ! यदीच्छामि कपिश्रेष्ठ लोकान्सर्वान्सहेश्वरान्।<br>निमिषार्धेन संहन्यां सृजामि निमिषार्धतः ॥१०॥ | यदि मेरी इच्छा हो तो मैं आधे निमेषमें ही लोकपालोंके सहित सम्पूर्ण लोकोंको नष्ट कर सकता हूँ और आधे निमेषमें ही सबको रच सकता हूँ, अतः ( तुम किसी अतो मयाऽभयं दत्तं शीघ्रमानय राक्षसम् ॥११॥ | प्रकारकी चिन्ता न करो ) मैं इस राक्षसको अभयदान देता हूँ, तुम इसे शीघ्र ही ले आओ ॥ १०-११ ॥ सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।<br>अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम ॥१२॥ | मेरा यह नियम है कि जो एक बार भी मेरी शरण आकर ‘मैं तुम्हारा हूँ’ ऐसा कहकर मुझसे अभय माँगता है उसे मैं समस्त प्राणियोंसे निर्भय कर देता हूँ” ॥१२॥ रामस्य वचनं श्रुत्वा सुग्रीवो हृष्टमानसः ।<br>विभीषणमथानाय्य दर्शयामास राघवम् ॥१३॥ | रामके ये वचन सुनकर सुग्रीवने अति प्रसन्नचित्तसे विभीषणको लाकर रघुनाथजीसे मिलाया ॥ १३ ॥ विभीषणस्तु साष्टाङ्गं प्रणिपत्य रघूत्तमम् ।<br>हर्षगद्गदया वाचा भक्त्या च परयान्वितः ॥१४॥ | विभीषणने रघुनाथजीको साष्टांग प्रणाम किया और हर्षसे गद्गदकण्ठ हो परम भक्तिपूर्वक हाथ जोड़- रामं श्यामं विशालाक्षं प्रसन्नमुखपङ्कजम् ।<br>धनुर्बाणधरं शान्तं लक्ष्मणेन समन्वितम् ॥१५॥<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा स्तोतुं समुपचक्रमे ॥१६॥ | कर शान्तमूर्ति प्रसन्नवदनारविन्द विशालनयन श्यामसुन्दर धनुर्बाणधारी भगवान् रामकी, लक्ष्मणजीके सहित, स्तुति करनी आरम्भ की ॥ १४-१६ ॥
विभीषण उवाच | विभीषण बोले— नमस्ते राम राजेन्द्र नमः सीतामनोरम ।<br>नमस्ते चण्डकोदण्ड नमस्ते भक्तवत्सल ॥१७॥ | “हे राजराजेश्वर राम ! आपको नमस्कार है। हे सीताके मनमें रमण करनेवाले ! आपको नमस्कार है । हे प्रचण्डधनुर्धर ! आपको नमस्कार है । हे भक्तवत्सल ! आपको बारम्बार नमस्कार है ॥ १७ ॥ नमोऽनन्ताय शान्ताय रामायामिततेजसे ।<br>सुग्रीवमित्राय च ते रघूणां पतये नमः ॥१८॥ | हे अनन्त, शान्त, अतुलतेजोमय, सुग्रीवसखा रघुकुलनायक भगवान् राम ! आपको नमस्कार है ॥१८॥ जगदुत्पत्तिनाशानां कारणाय महात्मने । | जो संसारकी उत्पत्ति और नाशके कारण हैं त्रिलोकी-
सर्ग ३ ]
युद्धकाण्डम्
२४३
| त्रैलोक्यगुरवेऽनादिगृहस्थाय नमोनमः ॥१९॥ | के गुरु और अनादिकालीन गृहस्थ* हैं उन महात्मा रामको बारम्बार नमस्कार है ॥ १९ ॥ हे राम ! आप |
| त्वमादिर्जगतां राम त्वमेव स्थितिकारणम् । | संसारकी उत्पत्ति और स्थितिके कारण हैं तथा अन्तमें- |
| त्वमन्ते निधनस्थानं स्वेच्छाचारस्त्वमेव हि ॥२०॥ | आप ही उसके लयस्थान हैं; आप अपनी इच्छानुसार विहार करनेवाले हैं ॥ २० ॥ हे राघव ! चराचर भूतों- |
| चराचराणां भूतानां बहिरन्तश्च राघव । | के भीतर और बाहर व्याप्य-व्यापक-रूपसे आप विश्वरूप |
| व्याप्यव्यापकरूपेण भवान् भाति जगन्मयः ॥२१॥ | ही भास रहे हैं ॥ २१ ॥ आपकी मायाने जिनका |
| त्वन्मायया हृतज्ञाना नष्टात्मानो विचेतसः। | सदसद्विवेक हर लिया है वे नष्ट-बुद्धि मूढ़ पुरुष अपने पाप-पुण्यके वशीभूत होकर संसारमें बारम्बार आते- |
| गतागतं प्रपद्यन्ते पापपुण्यवशात्सदा ॥२२॥ | जाते रहते हैं ॥ २२ ॥ जबतक मनुष्य एकाग्र |
| तावत्सत्यं जगद्भाति शुक्तिकारजतं यथा । | चित्तसे आपके ज्ञानस्वरूपको नहीं जानता तभीतक |
| यावन्न ज्ञायते ज्ञानं चेतसाऽनन्यगामिना ॥२३॥ | सीपीमें चाँदीके समान यह संसार सत्य प्रतीत होता है ॥ २३ ॥ हे विभो ! आपको न जाननेसे ही लोग पुत्र, स्त्री |
| त्वदज्ञानात्सदा युक्ताः पुत्रदारगृहादिषु । | और गृह आदिमें आसक्त होकर अन्तमें दुःख देनेवाले |
| रमन्ते विषयान्सर्वानन्ते दुःखप्रदान्विभो ॥२४॥ | विषयोंमें सुख मानते हैं ॥ २४ ॥ हे पुरुषोत्तम ! आप ही इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण और वायु हैं तथा आप |
| त्वमिन्द्रोऽग्निर्यमो रक्षो वरुणश्च तथानिलः । | ही कुबेर और रुद्र हैं ॥ २५ ॥ हे प्रभो ! आप अणु-से- |
| कुबेरश्च तथा रुद्रस्त्वमेव पुरुषोत्तम ॥२५॥ | अणु और महान्-से-महान् हैं तथा आप ही समस्त लोकोंके पिता, माता और धाता (धारण-पोषण करनेवाले) हैं |
| त्वमणोरप्यणीयांश्च स्थूलात् स्थूलतरः प्रभो । | ॥ २६ ॥ आप आदि, मध्य और अन्तसे रहित सर्वत्र परिपूर्ण |
| त्वं पिता सर्वलोकानां माता धाता त्वमेव हि ॥२६॥ | अच्युत और अविनाशी हैं । आप हाथ-पाँवसे रहित तथा नेत्र और कर्णहीन हैं ॥ २७ ॥ तथापि हे |
| आदिमध्यान्तरहितः परिपूर्णोऽच्युतोऽव्ययः । | खरान्तक ! आप सब कुछ देखनेवाले, सब कुछ सुनने- |
| त्वं पाणिपादरहितश्चक्षुःश्रोत्रविवर्जितः ॥२७॥ | वाले, सब कुछ ग्रहण करनेवाले और बड़े वेगवान् हैं । हे प्रभो ! आप अन्नमय आदि पाँचों कोशोंसे रहित तथा |
| श्रोता द्रष्टा ग्रहीता च जवनस्त्वं खरान्तक । | निर्गुण और निराश्रय हैं ॥ २८ ॥ आप निर्विकल्प, |
| कोशेभ्यो व्यतिरिक्तस्त्वं निर्गुणो निरूपाश्रयः ॥२८॥ | निर्विकार और निराकार हैं, आपका कोई प्रेरक नहीं |
| निर्विकल्पो निर्विकारो निराकारो निरीश्वरः । | है, आप (उत्पत्ति, वृद्धि, परिणाम, क्षय, जीर्णता और नाश—इन) छः भाव-विकारोंसे रहित हैं तथा |
| षड्भावरहितोऽनादिः पुरुषः प्रकृतेः परः ॥२९॥ | प्रकृतिसे अतीत अनादि पुरुष हैं ॥ २९ ॥ मायाके |
| मायया गृह्यमाणस्त्वं मनुष्य इव भाव्यसे । | कारण ही आप साधारण मनुष्यके समान प्रतीत होते हैं; वैष्णवजन आपको निर्गुण और अजन्मा जानकर मोक्ष |
| ज्ञात्वा त्वां निर्गुणमजं वैष्णवा मोक्षगामिनः ॥३०॥ | प्राप्त करते हैं ॥ ३० ॥ हे राघव ! हे प्रभो ! मैं आप- |
| अहं त्वत्पादसद्भक्तिनिःश्रेणीं प्राप्य राघव । | के चरण-कमलकी विशुद्ध भक्तिरूप सीढ़ी पाकर ज्ञान- |
| इच्छामि ज्ञानयोगारूढं सौधमारोढुमीश्वर ॥३१॥ | योग नामक राजभवनके शिखरपर चढ़ना चाहता हूँ ॥ ३१ ॥ हे कारुणिकश्रेष्ठ सीताफ्ते राम ! आपको |
| नमः सीतापते राम नमः कारुणिकोत्तम । | नमस्कार है; हे रावणारे ! आपको बारम्बार नमस्कार |
| रावणारे नमस्तुभ्यं त्राहि मां भवसागरात् ॥३२॥ | है; आप इस संसार-सागरसे मेरी रक्षा कीजिये” ॥ ३२ ॥ |
* प्रकृतिरूपा पत्नीके साथ भगवान्का अनादि सम्बन्ध है, इसलिये वे अनादि गृहस्थ हैं ।
| २४४ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ३ |
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| ततः प्रसन्नः प्रोवाच श्रीरामो भक्तवत्सलः।<br>वरं वृणीष्व भद्रं ते वाञ्छितं वरदोऽस्म्यहम् ॥३३॥ | तब भक्तवत्सल भगवान् रामने प्रसन्न होकर कहा—<br>"विभीषण ! तेरा कल्याण हो, मैं तुझे वर देना चाहता<br>हूँ; अतः तेरी जो इच्छा हो वही वर माँग ले" ॥३३॥ |
| विभीषण उवाच | विभीषण बोले—"हे रघुनन्दन ! मैं तो आपके<br>चरणोंका दर्शन पाकर ही धन्य और कृतकृत्य हो<br>गया; मुझे जो कुछ पाना था वह मिल गया। अब तो<br>मैं निःसन्देह मुक्त हो गया ॥ ३४ ॥ हे राम ! आपकी<br>मनोहर मूर्तिकी दर्शन करनेसे आज मेरे समान कोई<br>धन्य और पवित्र नहीं है; अब इस संसारमें (किसी भी<br>प्रकार) मेरी समता करनेवाला कोई नहीं है ॥ ३५ ॥<br>हे रघुनन्दन ! कर्म-बन्धनको नष्ट करनेके लिये आप<br>मुझे अपनी भक्तिसे प्राप्त होनेवाला ज्ञान और अपने<br>परमार्थ-स्वरूपका साक्षात् करानेवाला ध्यान दीजिये<br>॥ ३६ ॥ हे राजराजेश्वर राम ! मुझे विषयजन्य सुखकी<br>इच्छा नहीं है; मैं तो यही चाहता हूँ कि आपके चरण-<br>कमलोंमें सर्वदा मेरी आसक्तिरूपा भक्ति बनी रहे"॥३७॥ |
| धन्योऽस्मि कृतकृत्योऽस्मि कृतकार्योऽस्मि राघव।<br>त्वत्पाददर्शनादेव विमुक्तोऽस्मि न संशयः ॥३४॥ | |
| नास्ति मत्सदृशो धन्यो नास्ति मत्सदृशः शुचिः।<br>नास्ति मत्सदृशो लोके राम त्वन्मूर्तिदर्शनात् ॥३५॥ | |
| कर्मबन्धविनाशाय त्वज्ज्ञानं भक्तिलक्षणम्।<br>त्वद्ध्यानं परमार्थं च देहि मे रघुनन्दन ॥३६॥ | |
| न याचे राम राजेन्द्र सुखं विषयसम्भवम्।<br>त्वत्पादकमले सक्ता भक्तिरेव सदास्तु मे ॥३७॥ | |
| ओमित्युक्त्वा पुनः प्रीतो रामः प्रोवाच राक्षसम्।<br>शृणु वक्ष्यामि ते भद्र रहस्यं मम निश्चितम् ॥३८॥ | तब रघुनाथजीने 'तथास्तु' कहकर विभीषणसे प्रसन्न<br>होकर कहा—"भद्र ! सुनो, मैं तुम्हें अपना निश्चित<br>रहस्य सुनाता हूँ ॥ ३८ ॥ जो मेरे शान्तस्वभाव, विरक्त<br>और योगनिष्ठ भक्त हैं, उनके हृदयमें मैं सीताजीके सहित<br>सदा रहता हूँ—इसमें सन्देह नहीं ॥ ३९ ॥ अतः तुम<br>सर्वदा शान्त और पापरहित रहकर मेरा ध्यान करनेसे<br>घोर संसार-सागरसे पार हो जाओगे ॥ ४० ॥ जो<br>पुरुष मुझे प्रसन्न करनेके लिये इस स्तोत्रको पढ़ता,<br>लिखता अथवा सुनता है वह मेरा प्रिय सारूप्यपद<br>प्राप्त करता है" ॥ ४१ ॥ |
| मद्भक्तानां प्रशान्तानां योगिनां वीतरागिणाम्।<br>हृदये सीतया नित्यं वसाम्यत्र न संशयः ॥३९॥ | |
| तस्मात्त्वं सर्वदा शान्तः सर्वकल्मषवर्जितः।<br>मां ध्यात्वा मोक्ष्यसे नित्यं घोरसंसारसागरात् ॥४०॥ | |
| स्तोत्रमेतत्पठेद्यस्तु लिखेद्वाः शृणुयादपि।<br>मत्प्रीतये समाभीष्टं सारूप्यं समवाप्नुयात् ॥४१॥ | |
| इत्युक्त्वा लक्ष्मणं प्राह श्रीरामो भक्तभक्तिमान्।<br>पश्यत्विदानीमेवैष मम सन्दर्शने फलम् ॥४२॥ | विभीषणसे ऐसा कह भक्तवत्सल श्रीरामने<br>लक्ष्मणजीसे कहा—"लक्ष्मण ! यह अभी मेरे दर्शनका<br>फल देखे ॥ ४२ ॥ तुम समुद्रसे जल ले आओ; मैं<br>इसे लंकाके राज्यपर अभिषिक्त किये देता हूँ। जबतक<br>चन्द्र-सूर्य और पृथिवीकी स्थिति है तथा जबतक लोकमें<br>मेरी कथा रहेगी तबतक यह लंकाका राज्य करेगा।" |
| लङ्काराज्येऽभिषेक्ष्यामि जलमानय सागरात्।<br>यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च यावत्तिष्ठति मेदिनी ॥४३॥ | |
| यावन्मम कथा लोके तावद्राज्यं करोत्वसौ।<br>इत्युक्त्वा लक्ष्मणेनाम्बु ह्यानाय्य कलशेन तम्॥४४॥ | ऐसा कह श्रीरमापतिने लक्ष्मणजीसे कलशमें जल<br>मँगवाया और मन्त्रियों तथा विशेषतः लक्ष्मणजीसे उसे<br>लंकाके राज्यपदपर अभिषिक्त कराया ॥ ४३-४५ ॥<br>उस समय समस्त वानर प्रसन्न होकर 'धन्य है, धन्य |
| लङ्काराज्याधिपत्यार्थमभिषेकं रमापतिः।<br>कारयामास सचिवैर्लक्ष्मणेन विशेषतः ॥४५॥ |
| सर्ग ३ ] | युद्धकाण्ड | २४५ |
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| साधुसाध्विति ते सर्वे वानरास्तुष्टुवुर्भृशम् ।<br>सुग्रीवोऽपि परिष्वज्य विभीषणमथाब्रवीत् ॥४६॥<br>विभीषण वयं सर्वे रामस्य परमात्मनः ।<br>किङ्करास्तत्र मुख्यस्त्वं भक्त्या रामपरिग्रहात् ।<br>श्रावणस्य विनाशे त्वं साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥४७॥ | है' ऐसा कहने लगे; और सुग्रीवने विभीषणको गले लगाकर कहा—॥ ४६ ॥ “विभीषण ! हम सब परमात्मा रामके दास हैं, तथापि तुम हम सबमें प्रधान हो क्योंकि तुमने केवल भक्तिसे ही उनकी शरण ली है। अब तुम्हें रावणका नाश करानेमें हमारी सहायता करनी चाहिये” ॥ ४७ ॥ |
| विभीषण उवाच<br>अहं कियान्सहायत्वे रामस्य परमात्मनः ।<br>किं तु दास्यं करिष्येऽहं भक्त्या शक्त्या ह्यमायया॥४८॥ | विभीषण बोले—“मैं परमात्मा रामकी क्या सहायता कर सकता हूँ, तथापि मुझसे जैसी कुछ बनेगी निष्कपट होकर भक्तिभावसे उनकी सेवा करता रहूँगा” ॥ ४८ ॥ |
| दशग्रीवेण सन्दिष्टः शुको नाम महासुरः ।<br>संस्थितो ह्यम्बरे वाक्यं सुग्रीवमिदमब्रवीत् ॥४९॥<br>त्वामाह रावणो राजा भ्रातरं राक्षसाधिपः ।<br>महाकुलप्रसूतस्त्वं राजाऽसि वनचारिणाम् ॥५०॥<br>मम भ्रातृसमानस्त्वं तव नास्त्यर्थविप्लवः ।<br>अहं यदहरं भार्यां राजपुत्रस्य किं तव ॥५१॥<br>किष्किन्धां याहि हरिभिर्लङ्का शक्या न दैवतैः।<br>प्राप्तुं किं मानुषैरल्पसत्त्वैर्वानरयूथपैः ॥५२॥<br>तं ज्ञापयन्तं वचनं तूर्णमुत्प्लुत्य वानराः ।<br>आपद्यन्त तदा क्षिप्रं निहन्तुं दृढमुष्टिभिः ॥५३॥<br>वानरैर्हन्यमानस्तु शुको राममथाब्रवीत् ।<br>न दूतान् घ्नन्ति राजेन्द्र वानरान्वारय प्रभो ॥५४॥<br>रामः श्रुत्वा तदा वाक्यं शुकस्य परिदेवितम् ।<br>मा वधिष्टेति रामस्तान्वारयामास वानरान् ॥५५॥<br>पुनरम्बरमासाद्य शुकः सुग्रीवमब्रवीत् ।<br>ब्रूहि राजेन्द्रदशग्रीवं किं वक्ष्यामि व्रजाम्यहम् ॥५६॥ | इसी समय रावणका भेजा हुआ शुक नामक महादैत्य आकाशमें स्थित होकर सुग्रीवसे इस प्रकार बोला—॥ ४९ ॥ “राक्षसराज रावण तुम्हें अपने भाईके समान मानते हैं, उन्होंने तुम्हारे लिये कहा है कि तुम बड़े कुलमें उत्पन्न हुए हो और वानरोंके राजा हो ॥ ५० ॥ तुम मेरे भाईके समान हो और तुम्हारा कोई कार्यघात भी नहीं हुआ है। यदि मैंने किसी राजकुमारकी स्त्रीको हर ही लिया तो उससे तुम्हें क्या ? ॥५१॥ अतः तुम अपने वानरोंके सहित किष्किन्धाको लौट जाओ। लंकाको पाना तो देवताओंके लिये भी कठिन है, फिर अल्पशक्ति मनुष्य और वानरयूथपोंकी तो बात ही क्या है ?” ॥५२॥ जिस समय शुक इस प्रकार सन्देश सुना रहा था, वानरोंने अपने सुदृढ घूँसोंसे मारनेके लिये उसे तुरन्त ही उछलकर पकड़ लिया ॥ ५३ ॥ वानरोंके मारनेपर शुकने श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—"हे राजेन्द्र ! (विज्ञजन) दूतको मारा नहीं करते, अतः हे प्रभो ! इन वानरोंको रोकिये” ॥ ५४ ॥ शुकका यह करुणा-युक्त वचन सुनकर रामने 'इसे मत मारो' ऐसा कहकर वानरोंको रोक दिया ॥ ५५ ॥ तब शुकने फिर आकाशमें चढ़कर सुग्रीवसे कहा—"हे राजन् ! मैं जाता हूँ; कहिये, रावणको आपकी ओरसे क्या उत्तर दूँ ?” ॥ ५६ ॥ |
| सुग्रीव उवाच<br>यथा वाली मम भ्राता तथा त्वं राक्षसाधम ।<br>हन्तव्यस्त्वं मया यालात्सपुत्रबलवाहनः ॥५७॥ | **सुग्रीवने कहा—**उससे कहना, जिस प्रकार मैंने अपने भाई वालीको मारा था, हे राक्षसाधम ! उसी प्रकार तू भी अपने पुत्र, सेना और वाहनादिके सहित |
| २४६ | अध्यात्मरामायणे | [ सर्ग ३ |
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| ब्रूहि मे रामचन्द्रस्य भार्या हृत्वा क्व यास्यसि ।<br>ततो राजाज्ञया धृत्वा शुकं बध्वान्वरक्षयत् ॥५८॥ | मेरे हाथसे मारा जायगा। तू हमारे रामचन्द्रजीकी भार्याका हरण करके अब कहाँ जा सकता है ? तदनन्तर भगवान् रामकी आज्ञासे शुकको पकड़ उन्होंने बन्धनमें डालकर वानरोंकी रक्षामें छोड़ दिया॥५७-५८॥ |
| शार्दूलोऽपि ततः पूर्वं दृष्ट्वा कपिवलं महत् ।<br>यथावत्कथयामास रावणाय स राक्षसः ॥५९॥ | शुकसे पहले ही शार्दूल नामक राक्षसने वानरोंकी महान् सेना देखकर रावणसे उसका यथावत् वर्णन कर दिया था ॥ ५९ ॥ यह सब सुनकर रावणको बड़ी चिन्ता हुई और वह दीर्घ निःश्वास छोड़ता अपने महलमें बैठा रहा। इसी समय भगवान् रामने समुद्रकी ओर देखकर क्रोधसे नेत्र लाल कर कहा— |
| दीर्घचिन्तापरो भूत्वा निःश्वसन्नास मन्दिरे ।<br>ततः समुद्रमावेक्ष्य रामो रक्तान्तलोचनः ॥६०॥ | ॥ ६० ॥ “लक्ष्मण ! देखो, यह समुद्र कैसा दुष्ट है ? मैं इसके तीरपर आया हूँ किन्तु हे अनघ ! इस दुरात्माने दर्शन करके भी मेरा अभिनन्दन नहीं किया ॥ ६१ ॥ यह समझता है, ‘यह एक मनुष्य ही तो है, वानरोंके साथ मिलकर भी यह मेरा क्या कर सकता है ?’ सो हे महाबाहो ! देखो, आज मैं इसे सुखाये डालता हूँ ॥ ६२ ॥ फिर वानरगण निश्चिन्त होकर पैदल ही इसके पार चले जायेंगे।” ऐसा कह भगवान् रामने क्रोधसे नेत्र लाल कर अपना धनुष चढ़ाया और तूणीरसे एक कालाग्निके समान तेजोमय वाण निकालकर उसे धनुषपर रखकर खींचते हुए कहा—॥६३-६४॥ “समस्त प्राणी रामके वाणका पराक्रम देखें; मैं इसी समय नदीपति समुद्रको भस्म किये डालता हूँ” ॥६५॥ |
| पश्य लक्ष्मण दुष्टोऽसौ वारिधिर्मामुपागतम् ।<br>नाभिनन्दति दुष्टात्मा दर्शनार्थं समानघ ॥६१॥ | |
| जानाति मानुषोऽयं मे किं करिष्यति वानरैः ।<br>अद्य पश्य महाबाहो शोषयिष्यामि वारिधिम् ॥६२॥ | |
| पादेनैव गमिष्यन्ति वानरा विगतज्वराः ।<br>इत्युक्त्वा क्रोधताम्राक्ष आरोपितधनुर्धरः ॥६३॥ | |
| तूणीराद्वाणमादाय कालाग्निसदृशप्रभम् ।<br>सन्धाय चापमाकृष्य रामो वाक्यमथाब्रवीत् ॥६४॥ | |
| पश्यन्तु सर्वभूतानि रामस्य शरविक्रमम् ।<br>इदानीं भस्मसात्कुर्यां समुद्रं सरितां पतिम् ॥६५॥ | |
| एवं ब्रुवति रामे तु सशैलवनकानना ।<br>चचाल वसुधा द्यौश्च दिशश्च तमसाऽऽवृताः ॥६६॥ | भगवान् रामके ऐसा कहते ही वन और पर्वतादिके सहित सम्पूर्ण पृथिवी हिलने लगी तथा आकाश और दिशाओंमें अन्धकार छा गया ॥६६॥ समुद्र क्षुभित हो गया और भयके कारण अपने तटसे एक योजन आगे बढ़ आया; तथा बड़े-बड़े मत्स्य, नाके, मकर और मछलियाँ सन्तप्त होकर भयभीत हो गये ॥ ६७ ॥ |
| चुक्षुभे सागरो वेलां भयाद्योजनमत्यगात् ।<br>तिमीनक्रझषा मीनाः प्रतप्ताः परित्रत्रसुः ॥६७॥ | |
| एतस्मिन्नन्तरे साक्षात्सागरो दिव्यरूपधृक् ।<br>दिव्याभरणसम्पन्नः स्वभासा भासयन् दिशः ॥६८॥ | इसी समय नाना प्रकारके दिव्य आभूषण धारण किये दिव्यरूपधारी समुद्र, हाथोंमें अपने ही भीतर स्थित दिव्य रत्न लिये, अपने प्रकाशसे दशों दिशाओंको प्रकाशित करता, स्वयं उपस्थित हुआ और भगवान् रामचन्द्रजीके चरणोंके आगे नाना प्रकारके उपहार रख, जिनके नेत्रोंके मध्यभाग क्रोधसे लाल |
| स्वान्तःस्थदिव्यरत्नानि कराभ्यां परिगृह्य सः ।<br>पादयोः पुरतः क्षिप्त्वा रामस्योपायनं बहु ॥६९॥ | |
| दण्डवत्प्रणिपत्याह रामं रक्तान्तलोचनम् । |
सर्ग ३ ] युद्धकाण्ड २४७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| त्राहि त्राहि जगन्नाथ राम त्रैलोक्यरक्षक ॥७०॥<br><br>जडोऽहं राम ते सृष्टः सृजता निखिलं जगत् ।<br>स्वभावमन्यथा कर्तुं कः शक्तो देवनिर्मितम् ॥७१॥<br><br>स्थूलानि पञ्चभूतानि जडान्येव स्वभावतः ।<br>कृतानि भवतैतानि त्वदाज्ञां लङ्घयन्ति न ॥७२॥<br><br>तामसादहमो राम भूतानि प्रभवन्ति हि ।<br>कारणानुगमात्तेषां जडत्वं तामसं स्वतः ॥७३॥<br><br>निर्गुणस्त्वं निराकारो यदा मायागुणान्प्रभो ।<br>लीलयाङ्गीकरोषि त्वं तदा वैराजनामवान् ॥७४॥<br><br>गुणात्मनो विराजश्च सत्त्वाद्देवा बभूविरे ।<br>रजोगुणात्प्रजेशाद्या मन्योर्भूतपतिस्तव ॥७५॥<br><br>त्वामहं मायया छन्नं लीलया मानुषाकृतिम् ॥७६॥<br><br>जडबुद्धिर्जडो मूर्खः कथं जानामि निर्गुणम् ।<br>दण्ड एव हि मूर्खाणां सन्मार्गप्रापकः प्रभो ॥७७॥<br><br>भूतानाममरश्रेष्ठ पशूनां लगुडो यथा ।<br>शरणं ते व्रजामीश शरण्यं भक्तवत्सल ।<br>अभयं देहि मे राम लङ्कामार्गं ददामि ते ॥७८॥ | हो रहे हैं उन रघुनाथजीको साष्टाङ्ग दण्डवत् कर बोला—"हे त्रैलोक्यरक्षक जगत्पति राम ! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो ॥ ६८-७० ॥ हे राम ! सम्पूर्ण संसारकी रचना करते समय आपने मुझे जड ही बनाया था; फिर आपके बनाये स्वभावको कोई कैसे बदल सकता है ? ॥ ७१ ॥ पाँचों स्थूल भूतोंको आपने स्वभावसे जड ही बनाया है, वे आपकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं कर सकते ॥ ७२ ॥ हे राम ! भूत तामस अहंकारसे उत्पन्न होते हैं, अतः अपने कारणका अनुगमन करनेसे उनमें तमोरूप जडत्व तो स्वतःसिद्ध है ॥ ७३ ॥ हे प्रभो ! आप निर्गुण और निराकार हैं। जिस समय आप लीलासे ही मायिक गुणोंको अङ्गीकार करते हैं उस समय आपका नाम 'वैराज' पड़ जाता है ॥ ७४ ॥ उस गुणमय विराट्के सात्त्विकांशसे देवगण, राजसांशसे प्रजापतिगण और तामसांशसे रुद्रगण उत्पन्न होते हैं। ॥ ७५ ॥ हे नाथ ! लीलावश मायासे आच्छन्न होकर मनुष्यरूप हुए आप निर्गुण परमात्माको मैं जडबुद्धि मूर्ख कैसे जान सकता हूँ ? हे अमरश्रेष्ठ प्रभो ! पशुओंको जैसे लाठी ठीक-ठीक मार्गमें ले जाती है उसी प्रकार (मुझ-जैसे) मूर्ख जीवोंके लिये तो दण्ड ही सन्मार्गपर लानेवाला होता है। हे भक्तवत्सल भगवान् राम ! आप शरणागतरक्षककी मैं शरण हूँ। आप मुझे अभयदान दीजिये। मैं आपको लंकामें जानेका मार्ग दूँगा" ॥ ७६-७८ ॥ |
| श्रीराम उवाच<br>अमोघोऽयं महाबाणः कस्मिन्देशे निपात्यताम्।<br>लक्ष्यं दर्शय मे शीघ्रं बाणस्यामोघपातिनः ॥७९॥ | **श्रीरामचन्द्रजी बोले—**मेरा यह महाबाण व्यर्थ जानेवाला नहीं है; अतः शीघ्र ही मुझे इस अमोघ बाणका लक्ष्य बताओ । ॥ ७९ ॥ |
| रामस्य वचनं श्रुत्वा करे दृष्ट्वा महाशरम् ।<br>महोदधिर्महातेजा राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥८०॥<br><br>रामोत्तरप्रदेशे तु द्रुमकुल्य इति श्रुतः ।<br>प्रदेशस्तत्र बहवः पापात्मानो दिवानिशम् ॥८१॥<br><br>बाधन्ते मां रघुश्रेष्ठ तत्र ते पात्यतां शरः ।<br>रामेण सृष्टो बाणस्तु क्षणादाभीरमण्डलम् ॥८२॥<br><br>हत्वा पुनः समागत्य तूणीरे पूर्ववत्स्थितः । | रामका यह वचन सुनकर और उनके हाथमें वह महाबाण देखकर महातेजस्वी समुद्रने रघुनाथजीसे कहा—॥ ८० ॥ "हे राम ! उत्तरकी ओर एक 'द्रुमकुल्य' नामक देश है। वहाँ बहुत-से पापी रहते हैं। वे मुझे रात-दिन पीड़ा पहुँचाते हैं। हे रघुश्रेष्ठ ! आप अपना यह बाण वहीं गिराइये।" तदनन्तर रामका छोड़ा हुआ वह बाण एक क्षणमें ही समस्त आभीरमण्डलको मारकर फिर पूर्ववत् तरकशमें लौट आया। तब समुद्रने रघुनाथजीसे अति विनीत भावसे कहा— |
युद्धकाण्ड - सर्ग ४: समुद्र-तरण, लङ्का-निरीक्षण तथा रावण-शुक-संवाद
| २४८ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ४ |
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ततोऽब्रवीद्रघुश्रेष्ठं सागरो विनयान्वितः ॥८३॥
नलः सेतुं करोत्वस्मिन् जले मे विश्वकर्मणः ।
सुतो धीमान् समर्थोऽस्मिन्कार्ये लब्धवरो हरिः॥८४॥
कीर्तिं जानन्तु ते लोकाः सर्वलोकमलापहाम् ।
इत्युक्त्वा राघवं नत्वा ययौ सिन्धुरदृश्यताम्॥८५॥
ततो रामस्तु सुग्रीवलक्ष्मणाभ्यां समन्वितः ।
नलमाज्ञापयच्छीघ्रं वानरैः सेतुबन्धने ॥८६॥
ततोऽतिहृष्टः प्लवगेन्द्रयूथपै-
र्महानगेन्द्रप्रतिमैर्यतो नलः ।
बबन्ध सेतुं शतयोजनायतं
सुविस्तृतं पर्वतपादपैर्दृढम् ॥८७॥
॥ ८१-८३ ॥ "हे राम ! विश्वकर्माका पुत्र नल मेरे जलपर पुल निर्माण करे । वह चतुर वानर वरके प्रभावसे इस कार्यको करनेमें समर्थ है ॥ ८४ ॥ इससे सब लोग आपकी संसार-मलापहारिणी कीर्ति जान जायँगे ।" रघुनाथजीसे इस प्रकार कह समुद्र उन्हें प्रणाम कर अन्तर्धान हो गया ॥ ८५ ॥
तदनन्तर, सुग्रीव और लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजीने नलको वानरोंकी सहायतासे तुरन्त पुल बाँधनेकी आज्ञा दी ॥ ८६ ॥ तब नलने, महापर्वतके समान अन्य वानरयूथपतियोंके साथ, अति प्रसन्नतापूर्वक पर्वत और वृक्षादिकोंसे एक सौ योजन लम्बा अति विस्तीर्ण और सुदृढ पुल बनाया ॥८७॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥३॥
चतुर्थ सर्ग
समुद्र-तरण, लङ्का-निरीक्षण तथा रावण-शुकसंवाद ।
श्रीमहादेव उवाच
सेतुमारभमाणस्तु तत्र रामेश्वरं शिवम् ।
संस्थाप्य पूजयित्वाऽऽह रामो लोकहिताय च ॥१॥
प्रणमेत्सेतुबन्धं यो दृष्ट्वा रामेश्वरं शिवम् ।
ब्रह्महत्यादिपापेभ्यो मुच्यते मदनुग्रहात् ॥ २ ॥
सेतुबन्धे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा रामेश्वरं हरम् ।
सङ्कल्पानियतो भूत्वा गत्वा वाराणसीं नरः॥ ३ ॥
आनीय गङ्गासलिलं रामेशमभिषिच्य च ।
समुद्रे क्षिप्ततद्भारो ब्रह्म प्राप्नोत्यसंशयम् ॥ ४ ॥
श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! सेतुबन्धके आरम्भ होनेपर भगवान् रामने रामेश्वर महादेवकी स्थापना कर उनका पूजन करते हुए लोकहितके लिये इस प्रकार कहा—॥ १॥ "जो पुरुष रामेश्वर शिवका दर्शन कर सेतुबन्धको प्रणाम करेगा वह मेरी कृपासे ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्त हो जायगा ॥ २ ॥ यदि कोई पुरुष सेतुबन्धमें स्नान कर रामेश्वर महादेवके दर्शन करे और फिर संकल्पपूर्वक काशी जाकर वहाँ से गंगाजल लावे तथा उससे रामेश्वरका अभिषेक कर उस जलके पात्रको समुद्रमें डाल दे तो वह निःसन्देह ब्रह्मको प्राप्त कर लेता है" ॥ ३-४ ॥
कृतानि प्रथमेनाह्ना योजनानि चतुर्दश ।
द्वितीयेन तथा चाह्ना योजनानि तु विंशतिः ॥ ५ ॥
तृतीयेन तथा चाह्ना योजनान्येकविंशतिः ।
चतुर्थेन तथा चाह्ना द्वाविंशतिरिति श्रुतम् ॥ ६ ॥
पञ्चमेन त्रयोविंशद्योजनानि समन्ततः ।
बबन्ध सागरे सेतुं नलो वानरसत्तमः ॥ ७ ॥
तेनैव जग्मुः कपयो योजनानां शतं द्रुतम् ।
असङ्ख्याताः सुवेलाद्रिं रुरुधुः प्लवगोत्तमाः ॥ ८ ॥
सुना जाता है, वानरश्रेष्ठ नलने पहले दिन चौदह योजन, दूसरे दिन बीस योजन, तीसरे दिन इक्कीस योजन, चौथे दिन बाईस योजन और पाँचवें दिन तेईस योजन समुद्रपर पुल बाँधा ॥ ५-७ ॥ उसी पुलसे वानरगण तुरन्त ही सौ योजन समुद्रके उसपार चले गये । और फिर असंख्य वानरवीरोंने सुवेल-पर्वतको घेर लिया ॥ ८ ॥
सर्ग ४ ] युद्धकाण्ड २४९
आरुह्य मारुतिं रामो लक्ष्मणोऽप्यङ्गदं तथा।
दिदृक्षू राघवो लङ्कामारुरोहाचलं महत् ॥ ९ ॥
दृष्ट्वा लङ्कां सुविस्तीर्णां नानाचित्रध्वजाकुलाम् ।
चित्रप्रासादसम्बाधां स्वर्णप्राकारतोरणाम् ॥ १० ॥
परिखाभिः शतघ्नीभिः सङ्क्रमैश्च विराजिताम् ।
प्रासादोपरि विस्तीर्णप्रदेशे दशकन्धरः ॥ ११ ॥
मन्त्रिभिः सहितो वीरैः किरीटदशकोज्ज्वलः।
नीलाद्रिशिखराकारः कालमेघसमप्रभः ॥ १२ ॥
रत्नदण्डैः सितच्छत्रैरनेकौः परिशोभितः ।
एतस्मिन्नन्तरे बद्धो मुक्तो रामेण वै शुकः ॥ १३ ॥
वानरैस्ताडितः सम्यक् दशाननमुपागतः ।
प्रहसन् रावणः प्राह पीडितः किं परैः शुक॥ १४ ॥
रावणस्य वचः श्रुत्वा शुको वचनमब्रवीत् ।
सागरस्योत्तरे तीरेऽब्रुवं ते वचनं यथा ॥
तत उत्प्लुत्य कपयो गृहीत्वा मां क्षणात्ततः ॥ १५ ॥
मुष्टिभिर्नखदन्तैश्च हन्तुं लोप्तुं प्रचक्रमुः ।
ततो मां राम रक्षेति क्रोशन्तं रघुपुङ्गवः ॥ १६ ॥
विसृज्यतामिति प्राह विसृष्टोऽहं कपीश्वरैः।
ततोऽहमागतो भीत्या दृष्ट्वा तद्वानरं बलम् ॥ १७ ॥
राक्षसानां बलौघस्य वानरेन्द्रबलस्य च ।
नैतयोर्विद्यते सन्धिर्देवदानवयोरिव ॥ १८ ॥
पुरप्राकारमायान्ति क्षिप्रमेकतरं कुरु ।
सीतां वाऽस्मै प्रयच्छाशु युद्धं वा दीयतां प्रभो ॥ १९ ॥
मामाह रामस्त्वं ब्रूहि रावणं मद्वचः शुक ।
यद्बलं च समाश्रित्य सीतां मे हृतवानसि ॥ २० ॥
तद्दर्शय यथाकामं ससैन्यः सहवान्धवः ।
फिर, श्रीरामकी लंका देखनेकी इच्छा होनेपर रामचन्द्रजी हनुमान्के और लक्ष्मणजी अङ्गदके ऊपर बैठकर उस महान् पर्वतपर चढ़ गये ॥ ९ ॥ उन्होंने देखा कि लङ्कापुरी अति विस्तीर्ण है। वह नाना प्रकारकी ध्वजाओं, विचित्र प्रासादों तथा सुवर्णनिर्मित परकोटों और तोरणोंसे सुसज्जित है ॥ १० ॥ वह (सब ओरसे) खाइयों, तोपों और संक्रमों (सुरंगों) से सुशोभित है। उसके एक राजभवनके ऊपर अति विस्तृत भागमें अपने वीर मन्त्रियोंके सहित रावण बैठा है। उसके शिरोंपर दश मुकुट सुशोभित हैं, वह नीलाचलके शिखरके समान आकारवाला एवं श्याम मेघकी-सी आभावाला है ॥ ११-१२ ॥ नाना प्रकारके रत्नदण्डयुक्त श्वेत छत्रोंसे उसकी अपूर्व शोभा हो रही है। इसी समय भगवान् रामद्वारा बाँधकर छोड़ा हुआ शुकनामक दैत्य वानरोंसे भली प्रकार मार खाकर रावणके पास पहुँचा। उसे देखकर रावणने हँसते हुए पूछा—"शुक ! क्या शत्रुओंने तुम्हें कुछ कष्ट पहुँचाया है ?" ॥ १३-१४ ॥
रावणके वचन सुनकर शुकने कहा—"समुद्रके उत्तरतटपर जाकर ज्यों ही मैं आपका सन्देश सुनाने लगा त्यों ही कुछ वानरोंने उछलकर मुझे तत्क्षण पकड़ लिया ॥ १५ ॥ और मुझे घूँसों, नखों एवं दाँतोंसे मारने तथा लुप्त करनेका आयोजन करने लगे। तब, 'हे राम ! मेरी रक्षा करो' इस प्रकार मुझे पुकारते सुन रघुश्रेष्ठ रामने कहा, "इसे छोड़दो।" इससे उन वानरोंने मुझे छोड़ दिया। तब मैं वानरोंकी सेना देखकर बड़ा डरता-डरता यहाँ आया हूँ ॥ १६-१७ ॥ मेरे विचारसे देव और दानवोंके समान राक्षसोंके दलबल और वानरोंकी सेनामें किसी प्रकार मेल नहीं हो सकता ॥ १८ ॥ हे प्रभो ! वे शीघ्र ही नगरके परकोटपर आनेवाले हैं, आप दोनोंमेंसे कोई एक काम कीजिये—या तो उन्हें सीता दे दीजिये और या उनके साथ युद्ध कीजिये ॥ १९ ॥ रामने मुझसे कहा है कि 'शुक ! रावणसे मेरी ओरसे कहना कि जिस शक्तिके भरोसे तुमने हमारी जानकीको हरा है उसे भली प्रकार अपनी सेना और बन्धु-बान्धवोंके सहित मुझे दिखलाना। तू कल ही प्रकार और
२५० अध्यात्मरामायण [ सर्ग ४ ]
श्वःकाले नगरीं लङ्कां सप्राकारां सतोरणाम् ॥२१॥
राक्षसं च बलं पश्य शरैर्विध्वंसितं मया ।
घोररोषमहं मोक्ष्ये बलं धारय रावण ॥२२॥
इत्युक्त्वोपररामाथ रामः कमलोचनः ।
एकस्थानगता यत्र चत्वारः पुरुषर्षभाः ॥२३॥
श्रीरामो लक्ष्मणश्चैव सुग्रीवश्च विभीषणः ।
एत एव समर्थास्ते लङ्कां नाशयितुं प्रभो ॥२४॥
उत्पाट्य भस्मीकरणे सर्वे तिष्ठन्तु वानराः ।
तस्य यादृग् बलं दृष्टं रूपं प्रहरणानि च ॥२५॥
वधिष्यति पुरं सर्वमेकास्तिष्ठन्तु ते त्रयः ।
पश्य वानरसेनां तामसङ्ख्यातां प्रपूरिताम् ॥२६॥
गर्जन्ति वानरास्तत्र पश्य पर्वतसन्निभाः ।
न शक्यास्ते गणयितुं प्राधान्येन ब्रवीमि ते॥२७॥
एष योऽभिमुखो लङ्कां नदंस्तिष्ठति वानरः ।
यूथपानां सहस्राणां शतेन परिवारितः ॥२८॥
सुग्रीवसेनाधिपतिर्नीलो नामाग्निनन्दनः ।
एष पर्वतशृङ्गाभः पद्मकिञ्जल्कसन्निभः ॥२९॥
स्फोटयत्यभिसंरब्धो लाङ्गूलं च पुनः पुनः ।
युवराजोऽङ्गदो नाम वालिपुत्रोऽतिवीर्यवान् ॥३०॥
येन दृष्टा जनकजा रामस्यातीववल्लभा ।
हनूमानेष विख्यातो हतो येन तवात्मजः ॥३१॥
श्वेतो रजतसङ्काशो महाबुद्धिपराक्रमः ।
तूर्णं सुग्रीवमागम्य पुनर्गच्छति वानरः ॥३२॥
यस्त्वेष सिंहसङ्काशः पश्यत्यतुलविक्रमः ।
रम्भो नाम महासत्त्वो लङ्कां नाशयितुं क्षमः ॥३३॥
एष पश्यति वै लङ्कां दिधक्षन्निव वानरः ।
शरभो नाम राजेन्द्र कोटियूथपनायकः ॥३४॥
पनसश्च महावीर्यो मैन्दश्च द्विविदस्तथा ।
नलश्च सेतुकर्ताऽसौ विश्वकर्मसुतो बली ॥३५॥
तोरणादिके सहित लंकापुरी और राक्षसोंकी सेनाको मेरे बाणोंसे विध्वस्त हुई देखेगा। रावण! उस समय मैं भयंकर क्रोध छोड़ूँगा, तू अपने वलको स्थिर रखना' ॥२०–२२॥ ऐसा कहकर कमलनयन भगवान् राम चुप हो गये।
'हे प्रभो! और सब वानर एक ओर रहें तो भी, एक साथ मिल जानेपर, लंकाको जड़से उखाड़कर उसे भस्म और नष्ट करनेमें तो राम, लक्ष्मण, सुग्रीव और विभीषण ये चार पुरुषश्रेष्ठ ही पर्याप्त हैं। और मैंने, जैसे उनके बल, रूप और अस्त्र-शस्त्रादि देखे हैं उससे तो यही मालूम होता है कि और तीनों अन्यत्र रहें, अकेले राम ही समस्त नगर-को नष्ट कर सकते हैं। अब, सब ओर फैली हुई वानरोंकी उस असंख्य सेनाको देखिये ॥२३–२६॥ देखिये, ये पर्वतसदृश वानर वीर कैसे गर्ज रहे हैं। इन्हें गिना नहीं जा सकता, इसलिये मैं आपको इनमेंसे प्रधान-प्रधान बतलाता हूँ ॥२७॥ यह वानर, जो लंकाकी ओर देखकर बारम्बार गर्ज रहा है और एक लाख यूथपतियोंसे घिरा हुआ है, वानरराज सुग्रीवका सेनापति अग्निनन्दन 'नील' है। जो कमल-केशरकी-सी आभावाला तथा पर्वत-शिखरके समान विशालकाय है एवं रोषपूर्वक बारम्बार अपनी पूँछ पटक रहा है वह अति वीर्यवान् वालिपुत्र युवराज 'अंगद' है ॥ २८–३० ॥ जिसने रामकी अत्यन्त प्रिया जनक-नन्दिनी सीताको देखा और आपके पुत्रका वध किया, यह वही विख्यात वीर 'हनुमान्' है ॥ ३१ ॥ जिसकी कान्ति चाँदी-के समान शुक्ल वर्ण है, जो बड़ी शीघ्रतासे सुग्रीवके पास आकर फिर लौट जाता है तथा जो महाबुद्धिमान् पुरुषार्थी और सिंहके समान अतुलित पराक्रमी वानर इधर देख रहा है वह 'रम्भ' है। लंकाको नष्ट करनेमें यह अकेला ही समर्थ है ॥ ३२–३३ ॥ हे राजेश्वर ! यह दूसरा वानर, जो लंकाकी ओर इस प्रकार देखता है मानो जला ही डालेगा, करोड़ यूथपतियोंका नायक 'शरभ' है ॥ ३४ ॥ इनके अतिरिक्त महापराक्रमी पनस, मैन्द, द्विविद और सेतु बाँधनेवाला विश्वकर्माका पुत्र महा-बली नल—ये सब भी प्रधान-प्रधान योद्धा हैं ॥३५॥
सर्ग ४ ] युद्धकाण्ड २५१
वानराणां वर्णने वा सङ्ख्याने वा क ईश्वरः ।
शूराः सर्वे महाकायाः सर्वे युद्धाभिकाङ्क्षिणः ॥३६॥
शक्ताः सर्वे चूर्णयितुं लङ्कां रक्षोगणैः सह ।
एतेषां बलसङ्ख्यानं प्रत्येकं वच्मि ते शृणु ॥३७॥
एषां कोटिसहस्राणि नव पञ्च च सप्त च ।
तथा शङ्खसहस्राणि तथार्बुदशतानि च ॥३८॥
सुग्रीवसचिवानां ते बलमेतत्प्रकीर्तितम् ।
अन्येषां तु बलं नाहं वक्तुं शक्तोऽस्मि रावण ॥३९॥
रामो न मानुषः साक्षादादिनारायणः परः ।
सीता साक्षाज्जगद्धेतुश्चिच्छक्तिर्जगदात्मिका ॥४०॥
ताभ्यामेव समुत्पन्नं जगत्स्थावरजङ्गमम् ।
तस्माद्रामश्च सीता च जगतस्तस्थुषश्च तौ ॥४१॥
पितरौ पृथिवीपाल तयोर्वैरी कथं भवेत् ।
अज्ञानता त्वयाऽऽनीता जगन्मातैव जानकी ॥४२॥
क्षणनाशिनि संसारे शरीरे क्षणभङ्गुंरे ।
पञ्चभूतात्मके राजंश्चतुर्विंशतितत्त्वके ॥४३॥
मलमांसास्थिदुर्गन्धभूयिष्ठेऽहङ्कृतालये ।
कैवास्था व्यतिरिक्तस्य काये तव जडात्मके ॥४४॥
यत्कृते ब्रह्महत्यादिपातकानि कृतानि ते ।
भोगभोक्ता तु यो देहः स देहोऽत्र पतिष्यति ॥४५॥
पुण्यपापे समायातो जीवेन सुखदुःखयोः ।
कारणे देहयोगादिनाऽऽत्मनः कुरुतोऽनिशम् ॥४६॥
यावद्देहोऽस्मि कर्तास्मीत्यात्माऽहङ्कुरुतेऽवशः ।
अध्यासात्तावदेव स्याज्जन्मनाशादिसम्भवः ॥४७॥
इन वानरोंका वर्णन करने और गिननेकी सामर्थ्य किसमें है। ये सभी बड़े शूरवीर, विशालकाय और युद्धके लिये उत्सुक हैं ॥३६॥ राक्षसोंके सहित लंकाको चूर्ण करनेमें ये सभी समर्थ हैं। अब मैं इनमेंसे प्रत्येककी सेनाकी संख्या बतलाता हूँ, सावधान होकर सुनिये ॥ ३७ ॥ इनमेंसे प्रत्येकके नीचे इक्कीस हजार करोड़, हजारों शंख और सैकड़ों अरब सेना है॥३८॥
"हे रावण ! यह तो मैंने सुग्रीवके मन्त्रियोंकी ही सेना बतायी है; उनके अतिरिक्त औरोंकी सेना गिनानेमें तो मैं सर्वथा असमर्थ हूँ ॥ ३९ ॥ राम भी कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं, वे साक्षात् आदिनारायण परमात्मा हैं; और सीताजी जगत्की कारणरूपा साक्षात् जगद्रूपिणी चित्-शक्ति हैं ॥ ४० ॥ इन दोनोंसे ही समस्त स्थावर-जंगम संसार उत्पन्न हुआ है, अतः राम और सीता स्थावर-जंगम जगत्के माता-पिता हैं। हे पृथिवीपते ! सोचो तो, उनका वैरी कोई कैसे हो सकता है ? आप जिस जानकीको अनजानमें ले आये हैं वह साक्षात् जगन्माता ही हैं ॥४१-४२॥ हे राजन् ! क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाले संसारमें चौबीस तत्त्वों*के समूहरूप इस क्षणभंगुर पाञ्चभौतिक शरीरमें जिसमें मल, मांस, अस्थि आदि दुर्गन्धयुक्त पदार्थोंकी ही अधिकता है और जो अहंकारका आश्रय-स्थान तथा जडरूप है आप क्या आस्था करते हैं ? आप तो इससे सर्वथा पृथक् हैं ॥ ४३-४४॥ हाय ! जिस शरीरके लिये आपने ब्रह्महत्यादि अनेकों पाप किये हैं, सम्पूर्ण भोगोंका भोक्ता वह शरीर तो यहीं पड़ा रह जायगा ! ॥ ४५ ॥ सुख-दुःखके कारणरूप (पूर्वजन्मकृत) पाप-पुण्य जीवके साथ ही आते हैं और वे ही देह-सम्बन्ध आदिके द्वारा जीवको अहर्निश सुख-दुःखकी प्राप्ति कराते हैं ॥ ४६ ॥ जबतक अज्ञानजन्य अध्यासके कारण जीव 'मैं देह हूँ, मैं कर्त्ता हूँ' ऐसा अभिमान करता है तभीतक उसे विवश होकर जन्म-मृत्यु आदि भोगने पड़ते हैं
* प्रकृति, बुद्धि, अहंकार, ग्यारह इन्द्रियाँ, पञ्चभूत और शब्द-स्पर्शा आदि उनके पाँच विषय—ये सब मिलाकर चौबीस तत्त्व कहलाते हैं ।
२५२ अध्यात्मरामायण [सर्ग ४
तस्मात्त्वं त्यज देहादावभिमानं महामते ।
आत्माऽतिनिर्मलः शुद्धो विज्ञानात्माऽचलोऽव्ययः
स्वाज्ञानवशतो बन्धं प्रतिपद्य विमुह्यति ।
तस्मात्त्वं शुद्धभावेन ज्ञात्वाऽऽत्मानं सदा स्मर ॥४९॥
विरतिं भज सर्वत्र पुत्रदारगृहादिषु ।
निरयेष्वपि भोगः स्याच्छ्वशूकरतनावपि ॥५०॥
देहं लब्ध्वा विवेकाढ्यं द्विजत्वं च विशेषतः ।
तत्रापि भारते वर्षे कर्मभूमौ सुदुर्लभम् ॥५१॥
को विद्वानात्मसात्कृत्वा देहं भोगानुगो भवेत् ।
अतस्त्वं ब्राह्मणो भूत्वा पौलस्त्यतनयश्च सन् ॥५२॥
अज्ञानीव सदा भोगाननुधावसि किं मुधा ।
इतः परं वा त्यक्त्वा त्वं सर्वसङ्गं समाश्रय ॥५३॥
राममेव परात्मानं भक्तिभावेन सर्वदा ।
सीतां समर्प्य रामाय तत्पादानुचरो भव ॥५४॥
विमुक्तः सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं प्रयास्यसि ।
नो चेद्गमिष्यसेऽधोऽधः पुनरावृत्तिवर्जितः ।
अङ्गीकुरुष्व मद्वाक्यं हितमेव वदामि ते ॥५५॥
सत्सङ्गतिं कुरु भजस्व हरिं शरण्यं
श्रीराघवं मरकतोपलकान्तिकान्तम् ।
सीतासमेतमनिशं धृतचापबाणं
सुग्रीवलक्ष्मणविभीषणसेविताङ्घ्रिम् ॥५६॥
अर्थ / हिन्दी टीका:
॥ ४७ ॥ अतः हे महामते ! आप देह आदिमें अभिमान छोड़िये । आत्मा तो अत्यन्त निर्मल, शुद्धस्वरूप, विज्ञानमय, अविचल और अविकारी है ॥ ४८ ॥ अपने अज्ञानके कारण ही वह बन्धनमें पड़कर मोहको प्राप्त होता है । अतः आप आत्माको शुद्ध भावसे जानकर नित्य उसीका स्मरण कीजिये ॥ ४९ ॥ पुत्र, स्त्री और गृह आदि सभीसे उपराम हो जाइये क्योंकि भोग तो कुत्ते और शूक्रादिकी योनिमें तथा नरकादिमें भी मिल सकते हैं ॥ ५० ॥ सदसद्विवेक-बुद्धिसे युक्त मनुष्य-शरीर पाकर, उसमें भी विशेषतः द्विजत्व पाकर और अति दुर्लभ कर्मभूमि भारतवर्षमें जन्म ग्रहण कर, ऐसा कौन बुद्धिमान् होगा जो देहमें आत्मबुद्धि कर भोगोंका सेवन करेगा ?
"अतः आप ब्राह्मण-शरीर और सो भी पुलस्त्य-नन्दन विश्रवाके पुत्र होकर अज्ञानीके समान सदा ही इन भोगोंकी ओर व्यर्थ क्यों दौड़ते हैं ? आजसे आप सब प्रकारका संग छोड़कर अति भक्तिभावसे सदा परमात्मा रामका ही आश्रय लीजिये और श्रीसीताजीको भगवान् रामके अर्पण कर उनके चरणकमलोंकी सेवा कीजिये ॥ ५१–५४ ॥ यदि आप ऐसा करेंगे तो सब पापोंसे छूटकर विष्णुलोक प्राप्त करेंगे, नहीं तो पुनः ऊपर लौटनेसे वञ्चित रहकर उत्तरोत्तर नीचेके लोकोंमें ही जाते रहेंगे । मैं आपके हितकी ही बात कहता हूँ, आप इसे स्वीकार कीजिये ॥ ५५ ॥ हे रावण ! आप अहर्निश सत्संग कीजिये और जिनके शरीरकी कान्ति मरकतमणिके समान है तथा सुग्रीव, लक्ष्मण और विभीषण जिनके चरणकमलोंकी सेवा कर रहे हैं उन शरणागतवत्सल, धनुर्बाणधारी श्रीरघुनाथजीका सीताजीके सहित भजन कीजिये” ॥ ५६ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
युद्धकाण्ड - सर्ग ५: शुकका पूर्व-चरित्र, माल्यवान्का रावणको समझाना तथा संग्राम
| सर्ग ५ ] | युद्धकाण्ड | २५३ |
|---|
पञ्चम सर्ग
शुकका पूर्व-चरित्र, माल्यवान्का रावणको समझाना तथा वानर-राक्षस-संग्राम ।
| श्रीमहादेव उवाच | **श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! शुकके मुखसे निकले हुए इन अज्ञाननाशक वचनोंको सुनकर रावण क्रोधसे मानो जलता हुआ उससे आँखें लाल करके बोला—॥१॥ “अरे दुर्बुद्धे ! मेरे ही टुकड़ोंसे पलकर तू इस प्रकार गुरुकी भाँति कैसे बोलता है ? तीनों लोकोंका शासन करनेवाला तो मैं हूँ, मुझे उपदेश देते हुए तुझको लज्जा नहीं आती ? ॥ २ ॥ तू यद्यपि वध करनेयोग्य है और मैं तुझे अभी मार डालता, परन्तु तेरे पूर्व-कृत्योंको याद करके मैं तुझे छोड़े देता हूँ ॥ ३ ॥ अरे मूढ़ ! तू तुरन्त यहाँसे टल जा, मैं ऐसी बातें नहीं सुनना चाहता ।” रावणके ये वचन सुनकर शुक 'महाराजकी बड़ी कृपा है' ऐसा कहकर काँपता हुआ अपने घर चला गया ॥ ४ ॥ |
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| श्रुत्वा शुकमुखोद्गीतं वाक्यमज्ञाननाशनम् ।<br>रावणः क्रोधताम्राक्षो दहन्निव तमब्रवीत् ॥ १ ॥ | |
| अनुजीव्य सुदुर्बुद्धे गुरुवद्भाषसे कथम् ।<br>शासिताऽहं त्रिजगतां त्वं मां शिक्षन्न लज्जसे ॥ २ ॥ | |
| इदानीमेव हन्मि त्वां किन्तु पूर्वकृतं तव ।<br>स्मरामि तेन रक्षामि त्वां यद्यपि वधोचितम् ॥ ३ ॥ | |
| इतो गच्छ विमूढ त्वमेवं श्रोतुं न मे क्षमम् ।<br>महाप्रसाद इत्युक्त्वा वेपमानो गृहं ययौ ॥ ४ ॥ | |
| शुकोऽपि ब्राह्मणः पूर्वं ब्रह्मिष्ठो ब्रह्मवित्तमः।<br>वानप्रस्थविधानेन वने तिष्ठन् स्वकर्मकृत् ॥ ५ ॥ | पूर्व-जन्ममें शुक एक वेदज्ञ और ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण था, तथा वानप्रस्थ-विधिसे अपने धर्म-कर्ममें तत्पर हुआ वनमें रहता था ॥ ५ ॥ इस महामतिने देवताओंकी वृद्धि और दैत्योंके नाशके लिये लगातार बहुत-से बड़े-बड़े यज्ञ किये ॥ ६ ॥ अतः देवताओंके हितमें लगे रहने-के कारण शुकका राक्षसोंसे विरोध हो गया । उस समय वज्रदंष्ट्र नामक एक महान् राक्षस शुकका अपकार करनेपर उतारू होकर अवसर देखने लगा । |
| देवानांमभिवृद्ध्यर्थं विनाशाय सुरद्विषाम् ।<br>चकार यज्ञविततिमाविच्छिन्नां महामतिः ॥ ६ ॥ | |
| राक्षसानां विरोधोऽभूच्छुको देवहितोद्यतः ।<br>वज्रदंष्ट्र इति ख्यातस्तत्रैको राक्षसो महान् ॥ ७ ॥ | |
| अन्तरं प्रेप्सुरतिष्ठच्छुकापकरणोद्यतः ।<br>कदाचिदागतोऽगस्त्यस्तस्याश्रमपदं मुनेः ॥ ८ ॥ | एक दिन मुनिवर शुकके आश्रममें महर्षि अगस्त्य पधारे ॥७-८॥ शुकने अगस्त्यजीकी पूजा कर उन्हें भोजन के लिये निमन्त्रित किया । जिस समय महर्षि अगस्त्य स्नानके लिये गये हुए थे उस राक्षस (वज्रदंष्ट्र) ने अपना मौका देखकर अगस्त्यका रूप बनाया और शुकसे कहा—"हे ब्रह्मन् ! यदि तुम मुझे भोजन कराना चाहते हो तो मांसयुक्त अन्न खिलाओ ॥ ९-१० ॥ मैंने बहुत दिनोंसे छाग (बकरे) का मांस नहीं खाया है ।” तब शुकने 'जो आज्ञा' कह बड़ी तैयारीसे मांसमय भोजन बनवाया ॥ ११ ॥ |
| तेन सम्पूजितोऽगस्त्यो भोजनार्थं निमन्त्रितः ।<br>गते स्नातुं मुनौ कुम्भसम्भवे प्राप्य चान्तरम् ॥ ९॥ | |
| अगस्त्यरूपधृक् सोऽपि राक्षसः शुकमब्रवीत् ।<br>यदि दास्यसि मे ब्रह्मन् भोजनं देहि सामिषम् ॥१०॥ | |
| बहुकालं न भुक्तं मे मांसं छागाङ्गसम्भवम् ।<br>तथेति कारयामास मांसभोज्यं सविस्तरम् ॥ ११॥ |
| २५४ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ५ |
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उपविष्टे मुनौ भोक्तुं राक्षसोऽतीव सुन्दरम् ।
शुकभार्यावपुर्धृत्वा तां चान्तर्मोहयन् खलः ॥१२॥
नरमांसं ददौ तस्मै सुपक्वं बहुविस्तरम् ।
दत्त्वैवान्तर्दधे रक्षस्ततो दृष्ट्वा चुकोप सः ॥१३॥
अमेध्यं मानुषं मांसमगस्त्यः शुकमब्रवीत् ।
अभक्ष्यं मानुषं मांसं दत्तवानसि दुर्मते ॥१४॥
मह्यं त्वं राक्षसो भूत्वा तिष्ठ त्वं मानुषाशनः ।
इति शप्तः शुको भीत्या प्राह्ागस्त्यं मुने त्वया ॥१५॥
इदानीं भाषितं मेऽद्य मांसं देहीति विस्तरम् ।
तथैव दत्तं मे देव किं मे शापं प्रदास्यसि ॥१६॥
श्रुत्वा शुकस्य वचनं मुहूर्तं ध्यानमास्थितः ।
ज्ञात्वा रक्षःकृतं सर्वं ततः प्राह शुकं सुधीः ॥१७॥
तवापकारिणा सर्वं राक्षसेन कृतं त्विदम् ।
अविचार्यैव मे दत्तः शापस्ते मुनिसत्तम ॥१८॥
तथापि मे वचोऽमोघमेवमेव भविष्यति ।
राक्षसं वपुरास्थाय रावणस्य सहायकृत् ॥१९॥
तिष्ठ तावद्यदा रामो दशाननवधाय हि ।
आगमिष्यति लङ्कायाः समीपं वानरैः सह ॥२०॥
प्रेषितो रावणेन त्वं चारो भूत्वा रघूत्तमम् ।
दृष्ट्वा शापाद्विनिर्मुक्तो बोधयित्वा च रावणम् ॥२१॥
तत्त्वज्ञानं ततो मुक्तः परं पदमवाप्स्यसि ।
इत्युक्तोऽगस्त्यमुनिना शुको ब्राह्मणसत्तमः ॥२२॥
बभूव राक्षसः सद्यो रावणं प्राप्य संस्थितः ।
इदानीं चाररूपेण दृष्ट्वा रामं सहानुजम् ॥२३॥
रावणं तत्त्वविज्ञानं बोधयित्वा पुनर्द्रुतम् ।
पूर्ववद्ब्राह्मणो भूत्वा स्थितो वैखानसैः सह ॥२४॥
जिस समय मुनि भोजन करने बैठे उस दुष्ट राक्षसने शुककी पत्नीका अति सुन्दर रूप धारण किया, और उसे (शुककी स्त्रीको) आश्रमके भीतर ही मूर्च्छित कर मुनिवरको नाना प्रकारसे बनाया हुआ नरमांस परोसा। उसे परोसकर वह राक्षस अन्तर्धान हो गया। मुनिवर अगस्त्य अपने आगे अभक्ष्य नरमांस देखकर अति क्रोधित हुए और शुकसे बोले—"हे दुर्मते! तुमने मुझे अभक्ष्य नरमांस खानेको दिया है, अतः तुम मनुष्यभोजी राक्षस होकर रहो।" अगस्त्यजीके इस प्रकार शाप देनेपर शुकने डरते-डरते कहा—"मुने! आपने अभी कहा था कि आज मुझे नाना प्रकारका मांस खानेको दो; हे देव! मैंने आपकी आज्ञानुसार ही आपको मांस दिया है फिर आप मुझे शाप क्यों देते हैं?" ॥ १२–१६ ॥
शुकके वचन सुनकर महाबुद्धिमान् अगस्त्यजीने एक मुहूर्ततक ध्यानस्थ होकर राक्षसकी सब करतूत जान ली। तब वे शुकसे बोले ॥ १७ ॥ "हे मुनिश्रेष्ठ! यह सब करतूत तुम्हारे अपकार-कर्त्ता राक्षसकी है, मैंने तुम्हें बिना विचारे ही शाप दे दिया ॥ १८ ॥ तथापि मेरा वचन वृथा जानेवाला नहीं है, इसलिये होगा ऐसा ही। तुम राक्षसका शरीर धारण कर रावणकी तबतक सहायता करते रहो जबतक कि उसका नाश करनेके लिये श्रीरामचन्द्रजी वानरोंके सहित लंकाके समीप न आयें ॥ १९–२० ॥ इसके पश्चात् तुम रावणके भेजनेसे उसके दूत होकर रघुनाथजीके पास जाओगे और उनका दर्शन कर शापसे मुक्त हो जाओगे, फिर रावणको तत्त्वज्ञानका उपदेश कर मुक्त होकर परमपद प्राप्त करोगे।"
मुनिवर अगस्त्यके ऐसा कहनेपर विप्रवर शुक राक्षस होकर तुरन्त रावणके पास आकर रहने लगे। इस समय रावणके दूतरूपसे लक्ष्मणसहित भगवान् रामका दर्शन कर तथा रावणको तत्त्वज्ञानका उपदेश दे वे फिर शीघ्र ही पूर्ववत् ब्राह्मण-शरीर हो वानप्रस्थोंके साथ रहने लगे ॥ २१–२४ ॥
सर्ग ५ ] युद्धकाण्ड २५५
| ततः समागमद्वृद्धो माल्यवान् राक्षसो महान् ।<br>बुद्धिमान्नीतिनिपुणो राज्ञो मातुःप्रियः पिता ॥२५॥ | ( शुकके चले जानेपर ) राजा रावणकी माताका प्रिय पिता अति बुद्धिमान् और नीतिनिपुण वृद्ध राक्षस माल्यवान् वहाँ आया ॥ २५ ॥ |
| प्राह तं राक्षसं वीरं प्रशान्तेनान्तरात्मना ।<br>शृणु राजन्वचो मेऽद्य श्रुत्वा कुरु यथेप्सितम् ॥२६॥ | वह शान्त-चित्तसे उस राक्षसवीर ( रावण ) से बोला—"हे राजन् ! मेरी प्रार्थना सुनिये, फिर आपकी जैसी इच्छा हो वह करना ॥ २६ ॥ |
| यदा प्रविष्टा नगरीं जानकी रामवल्लभा ।<br>तदादि पुर्यां दृश्यन्ते निमित्तानि दशानन ॥२७॥<br>घोराणि नाशहेतूनि तानि मे वदतः शृणु ।<br>खरस्तनितनिर्घोषा मेघा अतिभयङ्कराः ॥२८॥<br>शोणितेनाभिवर्षन्ति लङ्काममुष्णेन सर्वदा ।<br>रुदन्ति देवलिङ्गानि खिद्यन्ति प्रचलन्ति च ॥२९॥ | हे दशानन ! जबसे नगरमें राम-भार्या जानकीका प्रवेश हुआ है तभीसे यहाँ बड़े भयंकर नाशकारी हेतु दिखायी दे रहे हैं, सो मैं आपको बतलाता हूँ, सुनिये—अति भयंकर मेघगण तीक्ष्ण कड़कके साथ गर्जते हैं और सर्वदा लंकाके ऊपर गर्म-गर्म रक्तकी वर्षा करते हैं । देवमूर्तियाँ रोती हैं, उनके शरीरमें पसीना आ जाता है और वे अपने स्थानसे स्खलित हो जाती हैं ॥ २७-२९ ॥ |
| कालिका पाण्डुरैर्दन्तैः प्रहसन्त्यग्रतः स्थिता ।<br>खरा गोषु प्रजायन्ते मूषका नकुलैः सह ॥३०॥<br>मार्जारैण तु युध्यन्ति पन्नगा गरुडेन तु ।<br>करालो विकटो मुण्डः पुरुषः कृष्णपिङ्गलः ॥३१॥<br>कालो गृहाणि सर्वेषां काले काले त्ववेक्षते ।<br>एतान्यन्यानि दृश्यन्ते निमित्तान्युद्भवन्ति च ॥३२॥ | कालिकाएँ राक्षसोंके आगे अपने पीले-पीले दाँत निकालकर हँसती हैं, गौओंके गधे उत्पन्न होते हैं और चूहे न्यौले तथा बिल्लीसे एवं सर्प गरुडसे युद्ध करते हैं । समस्त राक्षसोंके घरोंको समय-समयपर काले और पीले रंगका एक महाभयंकर विकरालवदन मुण्डित-केश कालपुरुष देखा करता है । इस प्रकार ये तथा और भी बहुत-से अपशकुन उत्पन्न होते और दिखायी देते हैं ॥ ३०-३२ ॥ |
| अतः कुलस्य रक्षार्थं शान्तिं कुरु दशानन ।<br>सीतां सत्कृत्य सधनां रामायाशु प्रयच्छ भोः ॥३३॥ | अतः हे दशशीश ! अपने कुलकी रक्षाके लिये इनकी शान्ति कीजिये और तुरन्त ही सीताको सत्कारपूर्वक बहुत-से धनके सहित रघुनाथजीको दे दीजिये ॥ ३३ ॥ |
| रामं नारायणं विद्धि विद्वेषं त्यज राघवे ।<br>यत्पादपोतमाश्रित्य ज्ञानिनो भवसागरम् ॥३४॥<br>तरन्ति भक्तिपूतान्तास्ततो रामो न मानुषः ।<br>भजस्व भक्तिभावेन रामं सर्वहृदालयम् ॥३५॥ | रामको आप साक्षात् नारायण समझिये, इसलिये उनमें द्वेषभाव छोड़ दीजिये । इन रघुनाथजीके चरण-कमल-रूप नौकाका आश्रय लेकर भक्तिसे पवित्र अन्तःकरण हुए योगिजन संसारसागरको पार कर जाते हैं। अतः ये कोई साधारण पुरुष नहीं हैं । ये सबके अन्तःकरणोंमें विराजमान हैं, आप भक्तिभावसे इन रघुनाथजीका भजन कीजिये ॥ ३४-३५ ॥ |
| यद्यपि त्वं दुराचारो भक्त्या पूतो भविष्यसि ।<br>मद्वाक्यं कुरु राजेन्द्र कुलकौशलहेतवे ॥३६॥ | यद्यपि आपका आचरण अच्छा नहीं है, तथापि उनकी भक्तिसे आप पवित्र हो जायेंगे । हे राजेन्द्र ! अपने कुलकी कुशलताके लिये मेरा यह वचन मान लीजिये” ॥ ३६ ॥ |
| तत्त माल्यवतो वाक्यं हितमुक्तं दशाननः ।<br>न मर्षयति दुष्टात्मा कालस्य वशमागतः ॥३७॥ | किन्तु माल्यवान्के ये हितकर वाक्य दुष्टचित्त रावणको सहन न हुए, क्योंकि वह कालके वशीभूत हो रहा था॥३७॥ वह बोला—‘इस बेचारे एक तुच्छ |
युद्धकाण्ड - सर्ग ६: लक्ष्मण-मूर्च्छा, राम-रावण-संग्राम, हनुमान्जीका ओषधि लेने जाना...
| २५६ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ५ |
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मानवं कृपणं राममेकं शाखामृगाश्रयम् ।<br>समर्थं मन्यसे केन हीनं पित्रा मुनिप्रियम् ॥३८॥<br>रामेण प्रेषितो नूनं भाषसे त्वमनर्गलम् ।<br>गच्छ वृद्धोऽसि बन्धुस्त्वं सोढं सर्वं त्वयोदितम् ३९<br>इतो मत्कर्णपदवीं दहेत्येतद्वचस्तव ।<br>इत्युक्त्वा सर्वसचिवैः सहितः प्रस्थितस्तदा ॥४०॥<br>प्रासादाग्रे समासीनः पश्यन्वानरसैनिकान् ।<br>युद्धाययोजयत्सर्वराक्षसान्समुपस्थितान् ॥४१॥ | मनुष्य रामको, जिसने बन्दरका आश्रय लिया हुआ है और जिसे उसके पिताने भी निकाल दिया है, तुम किस बातमें समर्थ मानते हो ? वह तो केवल वनवासी मुनिजनोंका ही प्यारा है ॥ ३८ ॥ मालूम होता है, तुम्हें रामने ही भेजा है इसीलिये तुम इस प्रकार ऊटपटांग बातें बनाते हो । जाओ, तुम बूढ़े और अपने सगे-सम्बन्धी हो इसलिये मैंने तुम्हारी सब बातें सहन कर लीं हैं ॥ ३९ ॥ किन्तु अब तुम्हारे वचन मेरे कानोंको जलाते हैं ।” ऐसा कहकर वह अपने समस्त मन्त्रियोंसहित वहाँसे चल दिया ॥ ४० ॥ और अपने राजभवनके सर्वोच्च तलपर बैठकर वानर-सैनिकों- को देखता हुआ अपने आस-पास बैठे हुए राक्षसोंको युद्धके लिये नियुक्त करने लगा ॥ ४१ ॥ रामोऽपि धनुरादाय लक्ष्मणेन समाहृतम् ।<br>दृष्ट्वा रावणमासीनं कोपेन कलुषीकृतः ॥४२॥<br>किरीटिनं समासीनं मन्त्रिभिः परिवेष्टितम् ।<br>शशाङ्कार्धनिभेनेव बाणेनैकेन राघवः ॥४३॥<br>श्वेतच्छत्रसहस्राणि किरीटदशकं तथा ।<br>चिच्छेद निमिषार्धेन तदद्भुतमिवाभवत् ॥४४॥<br>लज्जितो रावणस्तूर्णं विवेश भवनं स्वकम् ।<br>आहूय राक्षसान् सर्वान्प्रहस्तप्रमुखान् खलः॥४५॥<br>वानरैः सह युद्धाय नोदयामास सत्वरः । | इधर, रामचन्द्रजीने रावणको बैठा देख अति क्रोधातुर हो लक्ष्मणजीका लाया हुआ धनुष उठाया ॥ ४२ ॥ वह शिरपर मुकुट धारण किये अपने अनेकों मन्त्रियोंसे घिरा हुआ बैठा था भगवान् रामने आधे निमेषमें ही एक अर्धचन्द्राकार बाणसे उसके हजारों श्वेत छत्र और दसों मुकुट काट डाले । यह बड़ा आश्चर्य-सा हो गया ॥ ४३-४४ ॥ इससे लज्जित होकर रावण तुरन्त अपने घरमें घुस गया; और उस दुष्टने शीघ्र ही प्रहस्त आदि मुख्य-मुख्य राक्षसोंको बुलाकर वानरोंके साथ युद्ध करनेकी आज्ञा दी । ततो भेरीमृदङ्गाद्यैः पणवानकगोमुखैः ॥४६॥<br>महिषोष्ट्रैः खरैः सिंहैर्द्दीपिभिः कृतवाहनाः ।<br>खड्गशूलधनुःपाशयष्टितोमरशक्तिभिः ॥४७॥<br>लक्षिताः सर्वतो लङ्कां प्रतिद्वारमुपाययुः ।<br>तत्पूर्वमेव रामेण नोदिता वानरर्षभाः ॥४८॥<br>उद्यम्य गिरिशृङ्गाणि शिखराणि महान्ति च ।<br>तरूंश्चोत्पाट्य विविधान्युद्धाय हरियूथपाः ॥४९॥<br>प्रेक्षमाणा रावणस्य तान्यनीकानि भागशः ।<br>राघवप्रियकामार्थं लङ्कामारुरुहुस्तदा ॥५०॥<br>ते द्रुमैः पर्वताग्रैश्च मुष्टिभिश्च प्लवङ्गमाः ।<br>ततः सहस्रयूथाश्च कोटियूथाश्च यूथपाः ॥५१॥ | तब राक्षसलोग भेरी, मृदंग, पणव, आनक और गोमुख आदि बाजे बजाते भैंसों, ऊँटों, गधों, सिंहों और हाथियोंपर चढ़कर खड्ग, शूल, धनुष, पाश, यष्टि (डण्डे), तोमर और शक्ति आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो लङ्काके प्रत्येक द्वारपर आ गये । भगवान् रामने वानरोंको पहले ही आज्ञा दे दी थी ॥४५-४८॥ अतः वे पर्वतोंकी शिलाएँ तथा बड़े-बड़े शिखर उठ कर और नाना प्रकारके वृक्ष उखाड़कर युद्धके लिये चले और रावणकी वह पृथक्-पृथक् सेना देखकर रघुनाथजीका प्रिय कार्य करनेके लिये लंकापर चढ़ गये ॥ ४९-५० ॥ उनमेंसे कोई सहस्रयूथपति, कोई कोटियूथप और कोई शतकोटि-यूथनायकथे। उन वानरों ने उछलते-कूदते और गर्जते हुए
सर्ग ५ ] युद्धकाण्ड २५७
| कोटीशतयुताश्चान्ये रुरुधुर्नगरं भृशम् ।<br>आप्लवन्तः प्लवन्तश्च गर्जन्तश्च प्लवङ्गमाः ॥५२॥<br>रामो जयत्यतिबलो लक्ष्मणश्च महाबलः ।<br>राजा जयति सुग्रीवो राघवेणानुपालितः ॥५३॥<br>इत्येवं घोषयन्तश्च समं युयुधिरेऽरिभिः ।<br>हनूमानङ्गदश्चैव कुमुदो नील एव च ॥५४॥<br>नलश्च शरभश्चैव मैन्दो द्विविद एव च ।<br>जाम्बवान्दधिवक्त्रश्च केसरी तार एव च ॥५५॥<br>अन्ये च बलिनः सर्वे यूथपाश्च प्लवङ्गमाः ।<br>द्वाराण्युत्प्लुत्य लङ्कायाः सर्वतो रुरुधुर्भृशम् ।<br>तदा वृक्षैर्महाकायाः पर्वताग्रैश्च वानराः ॥५६॥<br>निजघ्नुस्तानि रक्षांसि नखैर्दन्तैश्च वेगिताः ।<br><br>राक्षसाश्च तदा भीमा द्वारेभ्यः सर्वतो रुषा ॥५७॥<br>निर्गत्य भिन्दिपालैश्च खड्गैः शूलैः परश्वधैः ।<br>निजघ्नुर्वानरानीकं महाकाया महाबलाः ॥५८॥<br>राक्षसांश्च तथा जघ्नुर्वानरा जितकाशिनः ।<br>तदा बभूव समरो मांसशोणितकर्दमः ॥५९॥<br>रक्षांसां वानराणां च सम्प्रभूवाद्वुतोपमः ।<br>ते हयैश्च गजैश्चैव रथैः काञ्चनसंनिभैः ॥६०॥<br>रक्षोव्याघ्रा युयुधिरे नादयन्तो दिशो दश ।<br>राक्षसाश्च कपीन्द्राश्च परस्परजयैषिणः ॥६१॥<br>राक्षसान्वानरा जघ्नुर्वानरांश्चैव राक्षसाः ।<br>रामेण विष्णुना दृष्टा हरयो दिविजांशजाः ॥६२॥<br>बभूवुर्बलिनो हृष्टास्तदा पीतामृता इव ।<br>सीताभिमर्शपापेन रावणेनाभिपालितान् ॥६३॥<br>हृतश्रीकान्हतबलान् राक्षसान् जघ्नुरोजसा ।<br>चतुर्थांशावशेषेण निहतं राक्षसं बलम् ॥६४॥<br>स्वसैन्यं निहतं दृष्ट्वा मेघनादोऽथ दुष्टधीः ।<br>ब्रह्मदत्तवरः श्रीमानन्तर्धानं गतोऽसुरः ॥६५॥ | वृक्ष, पर्वतशिखर और मुट्ठियाँ तानकर नगरको सब ओर-<br>से घेर लिया ॥५१-५२॥ 'महाबली राम और वीरवर<br>लक्ष्मणकी जय हो, रघुनाथजीसे सुरक्षित राजा सुग्रीवकी<br>जय हो' इस प्रकार शब्द करते हुए वे शत्रुओंसे लड़ने<br>लगे। हनुमान्, अंगद, कुमुद, नील, नल, शरभ, मैन्द,<br>द्विविद, जाम्बवान्, दधिमुख, केसरी, तार तथा<br>अन्य समस्त बलवान् वानर और यूथपतियोंने उछल-<br>उछलकर लंकाके सब द्वारोंको चारों ओरसे घेर<br>लिया। तब ये महाकाय वानरगण वृक्ष, पर्वतशिखर<br>और नख तथा दाँतोंसे अति वेगपूर्वक उन राक्षसोंको<br>मारने लगे।<br><br>तब, महाभयानक और बड़े-बड़े डीलवाले महा-<br>बली राक्षसगण भी अति रोषपूर्वक सब द्वारोंसे<br>निकलकर भिन्दिपाल, खड्ग, शूल और परशु आदि<br>विविध अस्त्र-शस्त्रोंसे वानर-सेनापर प्रहार करने लगे<br>॥ ५३-५८ ॥ इसी प्रकार विजयी वानरवीर<br>भी राक्षसोंको मारने लगे। उस समय वहाँ राक्षसों<br>और वानरोंका बड़ा विचित्र युद्ध छिड़ गया, जिससे<br>उस रणभूमिमें रक्त और मांसकी कीच हो गयी। वीर<br>राक्षसकेसरी घोड़ों, हाथियों और सुवर्णमय रथोंपर चढ़-<br>कर अपने शब्दसे दशों दिशाओंको गुञ्जायमान करते हुए<br>लड़ रहे थे, और राक्षस तथा वानर दोनों ही परस्पर एक<br>दूसरेको जीतना चाहते थे ॥ ५९-६१ ॥ वानरगण<br>राक्षसोंको और राक्षसलोग वानरोंको मारने लगे।<br>विष्णुरूप भगवान् रामकी दृष्टि पड़नेसे देवताओंके अंश-<br>से उत्पन्न हुए वानरगण बड़े प्रबल हो गये; और मानो<br>अमृतपान कर अति हर्षसे उत्साहपूर्वक, सीताजीको<br>(हरण करते समय) स्पर्श करनेके कारण महापापी<br>रावणसे पालित निस्तेज और बलहीन राक्षसोंको<br>मारने लगे। धीरे-धीरे राक्षसोंकी सेना नष्ट होकर केवल<br>एक चौथाई रह गयी ॥ ६२-६४॥<br><br>अपनी सेनाको नष्ट हुई देख ब्रह्माजीके वरसे<br>श्रीसम्पन्न हुआ दुष्टबुद्धि राक्षस मेघनाद अन्तर्धान हो<br>गया ॥६५॥ वह दैत्य सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र चलानेमें |
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- २५८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ५ ---|---|---
मूल संस्कृत श्लोक:
सर्वास्त्रकुशलो व्योम्नि ब्रह्मास्त्रेण समन्ततः ।
नानाविधानि शस्त्राणि वानरानीकमर्दयन् ॥ ६६ ॥
ववर्ष शरजालानि तदद्भुतमिवाभवत् ।
रामोऽपि मानयन्ब्राह्ममस्त्रमस्त्रविदां वरः ॥ ६७ ॥
क्षणं तूष्णीमुवासाथ ददर्श पतितं बलम् ।
वानराणां रघुश्रेष्ठश्चुकोपानलसन्निभः ॥ ६८ ॥
चापमानय सौमित्रे ब्रह्मास्त्रेणासुरं क्षणात् ।
भस्मीकरोमि मे पश्य बलमद्य रघूत्तम ॥ ६९ ॥
मेघनादोऽपि तच्छ्रुत्वा रामवाक्यमतन्द्रितः ।
तूर्णं जगाम नगरं मायया मायिकोऽसुरः ॥ ७० ॥
पतितं वानरानीकं दृष्ट्वा रामोऽतिदुःखितः ।
उवाच मारुतिं शीघ्रं गत्वा क्षीरमहोदधिम् ॥ ७१ ॥
तत्र द्रोणगिरिर्नाम दिव्यौषधिसमुद्भवः ।
तमानय द्रुतं गत्वा सञ्जीवय महामते ॥ ७२ ॥
वानरौघान्महासत्त्वान्कीर्तिस्ते सुस्थिरा भवेत् ।
आज्ञाप्रमाणमित्युक्त्वा जगामानिलनन्दनः ॥ ७३ ॥
आनीय च गिरिं सर्वान्वानरान्वानरर्षभः ।
जीवयित्वा पुनस्तत्र स्थापयित्वाऽऽययौ द्रुतम् ॥ ७४ ॥
पूर्ववच्चोद्भरं नादं वानराणां बलौघतः ।
श्रुत्वा विस्मयमापन्नो रावणो वाक्यमब्रवीत् ॥ ७५ ॥
राघवो मे महान् शत्रुः प्राप्तो देवविनिर्मितः ।
हन्तुं तं समरे शीघ्रं गच्छन्तु मम यूथपाः ॥ ७६ ॥
मन्त्रिणो बान्धवाः शूरा ये च मत्प्रियकाङ्क्षिणः ।
सर्वे गच्छन्तु युद्धाय त्वरितं मम शासनात् ॥ ७७ ॥
ये न गच्छन्ति युद्धाय भीरवः प्राणविप्लवात् ।
तान्हनिष्याम्यहं सर्वान्मच्छासनपराङ्मुखान् ॥ ७८ ॥
तच्छ्रुत्वा भयसन्त्रस्ता निर्जग्मू रणकोविदाः । -
हिन्दी अनुवाद:
कुशल था। अतः वह आकाशमें चढ़कर ब्रह्मास्त्रद्वारा वानर-सेनाको दलित करता हुआ सब ओर नाना प्रकारके शस्त्र और बाणसमूह बरसाने लगा। यह बड़ा आश्चर्य-सा होने लगा। अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान् राम भी ब्रह्मास्त्रका मान रखनेके लिये एक क्षणतक चुपचाप वानर-सेनाका पतन देखते रहे। अन्तमें वे रघुश्रेष्ठ क्रोधसे अग्निके समान प्रज्वलित हो उठे ॥ ६६-६८ ॥ और बोले— "लक्ष्मण! मेरा धनुष तो लाओ, मैं एक क्षणमें ही इस दुष्ट दानवको ब्रह्मास्त्रसे भस्म कर डालूँगा। हे रघूश्रेष्ठ! आज तुम मेरा पराक्रम देखना" ॥ ६९ ॥
मेघनाद भी बहुत सावधान था; रामचन्द्रजीके ये वाक्य सुनते ही वह मायामयी दैत्य मायापूर्वक तुरन्त अपने नगरको चला गया ॥ ७० ॥
वानर-सेनाको नष्ट हुई देख श्रीरामचन्द्रजी अति दुःखित होकर हनुमान्जीसे बोले— "हनुमान् ! तुम तुरन्त ही क्षीर-सागरपर जाओ। वहाँ द्रोणाचल नामक पर्वत है, जिसपर नाना प्रकारकी दिव्य ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं। हे महामते ! तुम झटपट जाकर उस पर्वतको ले आओ और इन महापराक्रमी वानरयूथोंको जीवित करो। इससे तुम्हारी कीर्ति अविचल हो जायगी।" यह सुनकर पवन-कुमार 'जो आज्ञा' ऐसा कहकर चल दिये ॥ ७१-७३ ॥
और तुरन्त ही उस पर्वतको लाकर (उसकी ओषधियों-से) समस्त वानरोंको जीवित कर उसे फिर वहीं रख आये ॥ ७४ ॥
तब वानर-सेनाका फिर पूर्ववत् भयानक शब्द सुनकर रावण अति विस्मित होकर कहने लगा—॥ ७५ ॥
"देवताओंका प्रकट किया हुआ यह राम मेरा महान् शत्रु आया है। इसे युद्धमें मारनेके लिये मेरे सेनापति, मन्त्री, बन्धु-बान्धव तथा और भी जो शूरवीर मेरा हित चाहते हों, वे सब मेरी आज्ञा मानकर तुरन्त जायँ ॥ ७६-७७ ॥
जो डरपोक अपने प्राणोंके भयसे युद्ध करने नहीं जायेंगे, अपनी आज्ञा न मानने-वाले उन सबको मैं मार डालूँगा" ॥ ७८ ॥
रावणकी यह आज्ञा सुनकर अतिकाय, प्रहस्त, महानाद, महोदर,
सर्ग ६ ] युद्धकाण्ड २५९
अतिकायः प्रहस्तश्च महानादमहोदरौ ॥७९॥ देवशत्रुर्निकुम्भश्च देवान्तकनरान्तकौ । अपरे बलिनः सर्वे ययुर्युद्धाय वानरैः ॥८०॥ एते चान्ये च बहवः शूराः शतसहस्रशः । प्रविश्य वानरं सैन्यं ममन्थुर्गलदर्पिताः ॥८१॥ भुशुण्डीभिन्दिपालैश्च बाणैः खड्गैः परश्वधैः । अन्यैश्च विविधैरस्त्रैर्निजघ्नुर्हरियूथपान् ॥८२॥ ते पादपैः पर्वतशृंगैर्नखदंष्ट्रैश्च मुष्टिभिः । प्राणैर्विमोचयामासुः सर्वराक्षसयूथपान् ॥८३॥ रामेण निहताः केचित्सुग्रीवेण तथाऽपरे । हनूमता चाङ्गदेन लक्ष्मणेन महात्मना । यूथपैर्वानराणां ते निहताः सर्वराक्षसाः ॥८४॥ रामतेजः समाविश्य वानरा बलिनोऽभवन् । रामशक्तिविहीनानामेवं शक्तिः कुतो भवेत् ॥८५॥ सर्वेश्वरः सर्वमयो विधाता मायामनुष्यत्वविडम्बनेन । सदा चिदानन्दमयोऽपि रामो युद्धादिलीलां वितनोति मायाम् ॥८६॥
देवशत्रु, निकुम्भ, देवान्तक और नरान्तक आदि रणकुशल वीर तथा और भी समस्त बलवान् योद्धा भयभीत होकर वानरोंके साथ युद्ध करनेके लिये चले ॥७९-८०॥ ये तथा और भी बहुत-से सैकड़ों-सहस्रों शूरवीर अपने-अपने बलके गर्वसे उन्मत्त हो वानर-सेनामें घुसकर उसे दलित करने लगे ॥ ८१ ॥ वे भुशुण्डी, भिन्दिपाल, बाण, खड्ग, परशु तथा और भी नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे वानर-यूथपतियोंपर प्रहार करने लगे ॥ ८२ ॥
इधर, वानरवीर भी वृक्षों, पर्वतशिखरों, नखों, दाढ़ों और मुष्टियोंसे समस्त राक्षस-यूथपोंको निष्प्राण करने लगे ॥ ८३ ॥ उन राक्षसोंमेंसे कोई श्रीरामके हाथसे, कोई सुग्रीवके द्वारा, कोई हनुमान् और अंगदके द्वारा, कोई महात्मा लक्ष्मणजीके हाथसे और कोई अन्यान्य वानर-यूथपोंके द्वारा मारे गये । इस प्रकार उन समस्त राक्षसोंका अन्त हो गया ॥ ८४ ॥ राम-तेजके समावेश-से वानरगण अत्यन्त प्रबल हो रहे थे । राम-शक्तिसे शून्य होनेपर उनमें इतनी सामर्थ्य कैसे हो सकती थी ? ॥ ८५ ॥ भगवान् राम सर्वेश्वर, सर्वमय, सबके नियन्ता और सर्वदा चिदानन्दमय हैं, तथापि मायासे मानव-चरित्रका अनुकरण करते हुए युद्धादि लीलाका विस्तार करते हैं ॥ ८६ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे युद्धकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥
षष्ठ सर्ग
लक्ष्मण-मूर्च्छा, राम-रावण-संग्राम, हनुमानजीका ओषधि लेने जाना और रावण-कालनेमि-संवाद ।
श्रीमहादेव उवाच श्रुत्वा युद्धे बलं नष्टमतिकायमुखं महत् । रावणो दुःखसन्तप्तः क्रोधेन महताऽऽवृतः ॥ १ ॥ निधायेन्द्रजितं लङ्कारक्षणार्थं महाद्युतिः । स्वयं जगाम युद्धाय रामेण सह राक्षसः ॥ २ ॥
**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! युद्धमें अतिकाय आदि राक्षसोंकी महती सेनाको नष्ट हुई सुन रावण अति दुःखार्तुर हो महान् क्रोधसे भर गया ॥ १ ॥ और वह महातेजस्वी राक्षस लङ्काकी रक्षाके लिये इन्द्रजीतको नियुक्त कर स्वयं रघुनाथजीसे लड़नेके लिये चला ॥ २ ॥ महाबली राक्षसराज समस्त शस्त्रास्त्र-
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दिव्यं स्यन्दनमारुह्य सर्वशस्त्रास्त्रसंयुतम् ।
राममेवाभिदुद्राव राक्षसेन्द्रो महाबलः ॥ ३ ॥
वानरान्बहुशो हत्वा बाणैराशीविषोपमैः ।
पातयामास सुग्रीवप्रमुखान्यूथनायकान् ॥ ४ ॥
गदापाणिं महासत्त्वं तत्र दृष्ट्वा विभीषणम् ।
उत्ससर्ज महाशक्तिं मयदत्तां विभीषणे ॥ ५ ॥
तामापतन्तीमालोक्य विभीषणविघातिनीम् ।
दत्ताभयोऽयं रामेण वधार्हो नायमासुरः ॥ ६ ॥
इत्युक्त्वा लक्ष्मणो भीमं चापमादाय वीर्यवान् ।
विभीषणस्य पुरतः स्थितोऽकम्प इवाचलः ॥ ७ ॥
सा शक्तिर्लक्ष्मणतनुं विवेशामोघशक्तितः ।
यावन्त्यः शक्तयो लोके मायायाः सम्भवन्ति हि ॥ ८ ॥
तासामाधारभूतस्य लक्ष्मणस्य महात्मनः ।
मायाशक्त्या भवेत्किं वा शेषांशस्य हरेस्तनोः ॥ ९ ॥
तथापि मानुषं भावमापन्नस्तदनुव्रतः ।
मूर्च्छितः पतितो भूमौ तमादातुं दशाननः ॥ १० ॥
हस्तैस्तोलयितुं शक्तो न बभूवातिविस्मितः ।
सर्वस्य जगतः सारं विराजं परमेश्वरम् ॥ ११ ॥
कथं लोकाश्रयं विष्णुं तोलयेल्लघुराक्षसः ।
ग्रहीतुकामं सौमित्रिं रावणं वीक्ष्य मारुतिः ॥ १२ ॥
आजघानोरसि क्रुद्धो वज्रकल्पेन मुष्टिना ।
तेन मुष्टिप्रहारेण जानुभ्यामपतद्भुवि ॥ १३ ॥
आस्यैश्च नेत्रश्रवणैरूद्वमन् रुधिरं बहु ।
वेघूर्णमाननयनो रथोपस्थ उपाविशत् ॥ १४ ॥
अथ लक्ष्मणमादाय हनूमान् रावणार्दितम् ।
से सुसज्जित एक दिव्य रथपर आरूढ़ हो श्रीरामचन्द्रजी-की ओर ही दौड़ा ॥ ३ ॥ उसने अपने सर्पके समान उग्र बाणोंसे बहुत-से वानरोंको मारकर सुग्रीव आदि यूथपतियोंको भी पृथिवीपर गिरा दिया ॥ ४ ॥ फिर महापराक्रमी विभीषणको वहाँ गदा लिये खड़ा देख उसने उसकी ओर मयदानवकी दी हुई महान् शक्ति छोड़ी ॥ ५ ॥ उस शक्तिको विभीषणका नाश करनेके लिये बढ़ती देख 'रामने इसे अभय दिया है, यह असुरकुमार वध किये जानेयोग्य नहीं है' ऐसा कहते हुए महावीर्यवान् लक्ष्मणजी अपना प्रचण्ड धनुष लेकर विभीषणके आगे पर्वतके समान अचल होकर खड़े हो गये ॥ ६-७ ॥
उस शक्तिकी सामर्थ्य अमोघ (कभी व्यर्थ न जानेवाली) थी, अतः वह लक्ष्मणजीके शरीरमें घुस गयी। संसारमें मायासे जितनी शक्तियाँ उत्पन्न होतीं हैं महात्मा लक्ष्मणजी, उन सबके आधार भगवान् विष्णुके स्वरूप भूत शेषनागके अंशावतार हैं। उनका उस मायाशक्तिसे क्या बिगड़ सकता था ? ॥ ८-९ ॥ तथापि इस समय मनुष्यभाव अंगीकार करनेसे उसका अनुकरण करते हुए वे मूर्च्छित होकर पृथिवीपर गिर पड़े। लक्ष्मणजीको ले जानेके लिये रावण उन्हें अपने हाथोंसे उठानेमें सफल न हुआ, अतः उसे बड़ा ही विस्मय हुआ। भला, जो सम्पूर्ण जगत्का सार परमेश्वर विराट् पुरुष है, उस निखिल लोकाधार विष्णुको एक क्षुद्र राक्षस कैसे उठा सकता था ?
जब हनुमान्जीने देखा कि रावण लक्ष्मणजीको ले जाना चाहता है तो उन्होंने अति क्रुद्ध होकर उसकी छातीमें एक वज्र-सदृश घूँसा मारा। उस घूँसेके आघातसे रावण घुटनोंके बल पृथिवीपर गिर पड़ा ॥ १०-१३ ॥ और अपने मुख, नेत्र और कानोंसे बहुत-सा रुधिर वमन करता हुआ घूमती हुई आँखोंसे रथके पिछले भागमें बैठ गया ॥ १४ ॥ तदनन्तर हनुमान्जी रावणद्वारा आहत लक्ष्मणजीको अपनी भुजाओंपर उठाकर श्रीरामचन्द्रजी-
सर्ग ६] युद्धकाण्ड २६१
आनयद्रामसामीप्यं बाहुभ्यां परिगृह्य तम् ॥१५॥ हनूमतः सुहृत्त्वेन भक्त्या च परमेश्वरः । लघुत्वमगमद्देवो गुरूणां गुरुरप्यजः ॥१६॥ सा शक्तिरपि तं त्यक्त्वा ज्ञात्वा नारायणांशजम् । रावणस्य रथं प्रागाद्रावणोऽपि शनैस्ततः ॥१७॥ संज्ञामवाप्य जग्राह चापासनमथो रुषा । राममेवाभिदुद्राव दृष्ट्वा रामोऽपि तं क्रुधा ॥१८॥ आरुह्य जगतां नाथो हनूमन्तं महाबलम् । रथस्थं रावणं दृष्ट्वा अभिदुद्राव राघवः ॥१९॥ ज्याशब्दमकरोत्तीव्रं वज्रनिष्पेषनिष्ठुरम् । रामो गम्भीरया वाचा राक्षसेन्द्रमुवाच ह ॥२०॥ राक्षसाधम तिष्ठाद्य क्व गमिष्यसि मे पुरः । कृत्वाऽपराधमेवं मे सर्वत्र समदर्शिनः ॥२१॥ येन बाणेन निहता राक्षसास्ते जनालये । तेनैव त्वां हनिष्यामि तिष्ठाद्य मम गोचरे ॥२२॥
श्रीरामस्य वचः श्रुत्वा रावणो मारुतात्मजम् । वहन्तं राघवं संख्ये शरैस्तीक्ष्णैरताडयत् ॥२३॥ हतस्यापि शरैस्तीक्ष्णैर्वायुसूनोः स्वतेजसा । व्यवधंत पुनस्तेजो ननर्द च महाकपिः ॥२४॥ ततो दृष्ट्वा हनूमन्तं सव्रणं रघूसत्तमः । क्रोधमाहारयामास कालरुद्र इवापरः ॥२५॥ साश्वं रथं ध्वजं सूतं शस्त्राैधं धनुरञ्जसा । छत्रं पताकां तरसा चिच्छेद शितसायकैः ॥२६॥ ततो महाशरेणाशु रावणं रघूसत्तमः । विव्याध वज्रकल्पेन पाकारिरिव पर्वतम् ॥२७॥ रामबाणहतो वीरश्चचाल च मुमोह च ।
के पास ले आये ॥ १५ ॥ हनुमान्जीके लिये, उनके सौहार्द और भक्तिभावके कारण वे अजन्मा और प्रकाश-स्वरूप परमेश्वर (लक्ष्मणजी) भारी-से-भारी होनेपर भी अत्यन्त लघु (हल्के) हो गये ॥ १६ ॥ श्रीलक्ष्मण-जीको साक्षात् नारायणका अंश जानकर वह शक्ति भी उन्हें छोड़कर फिर रावणके रथपर चली गयी । इधर, रावणको भी जब धीरे-धीरे कुछ चेत हुआ तो उसने अत्यन्त क्रोधसे अपना धनुष उठाया और रामचन्द्रजीकी ओर दौड़ा । उसे (अपनी ओर आता) देख जगत्पति भगवान् राम अति क्रुद्ध होकर महाबली हनुमान्जीके कन्धेपर चढ़े और रावणको रथमें बैठा देख उसकी ओर दौड़े ॥ १७-१९॥ भगवान् रामने अपने धनुषकी प्रत्यञ्चाका ऐसा कठोर शब्द किया जो मानो वज्र-को भी चूर्ण करनेवाला था, और फिर अति गम्भीर वाणीसे राक्षसराज रावणसे ऐसा कहा- ॥ २० ॥ "अरे राक्षसा-धम ! जरा ठहर तो, मुझ सर्वत्र समदर्शीका ऐसा अपराध करके तू कहाँ जा सकता है ? ॥ २१ ॥ अरे ! तू तनिक मेरे सामने खड़ा रह, जिस बाणसे मैंने जन-स्थानमें (खर-दूषणादिसे युद्ध करते समय) तेरे राक्षसोंको मारा था आज उसीसे तुझे भी मार डालूँगा" ॥ २२ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके ये वचन सुनकर रावणने उन्हें वहन करनेवाले हनुमान्जीके बड़े तीखे बाण मारे ॥ २३ ॥ किन्तु उन तीक्ष्ण बाणोंके लगनेपर भी पवन-पुत्रका तेज अपने प्रभावसे बराबर बढ़ता ही गया और वे महान् कपीश्वर बड़े जोरसे गर्जने लगे ॥ २४ ॥ जब रघुनाथजीने हनुमान्जीको क्षत-विक्षत देखा तो दूसरे कालरुद्रके समान बड़ा भयंकर क्रोध धारण किया ॥ २५ ॥ और अपने तीक्ष्ण बाणोंसे बड़ी फुर्तीके साथ सुगमतासे ही रावणके घोड़ेसहित रथ, ध्वजा, सारथी, शस्त्रसमूह, धनुष, छत्र और पताका आदि काट डाले ॥ २६ ॥ फिर इन्द्रने जैसे पर्वतोंपर आक्रमण किया था वैसे ही उन्होंने एक वज्रतुल्य महाबाणसे रावणको वेध डाला ॥ २७ ॥ भगवान् रामका बाण लगने-से वह वीर विचलित हो गया, उसे मूर्च्छा आ गयी और उसके हाथसे धनुष छूट गया ।